SIR विवाद + मतुआ वोटरों की चिंता… क्या BJP की ‘जयंती पॉलिटिक्स’ बंगाल में खेल बदल पाएगी?

मतुआ वोट बैंक, SIR प्रक्रिया और नदिया की सीटों पर भाजपा‑टीएमसी की रणनीतियां 2026 चुनाव को और दिलचस्प बना रही हैं.

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  • नदिया जिले में मतुआ समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका 2026 विधानसभा चुनाव के लिए निर्णायक मानी जा रही है
  • श्रीला भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर प्रभुपाद की जयंती में शाह की उपस्थिति को राजनीतिक संदेश माना जा रहा है
  • नदिया जिले की 7 विधानसभा सीटों पर सामाजिक, धार्मिक और मतुआ जनसंख्या के कारण मुकाबला कड़ा होने की संभावना है
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कोलकाता:

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव 2026 से पहले नदिया का नवद्वीप इस समय राजनीति का सबसे चर्चित केंद्र बन गया है. यहां मनाई गई श्रीला भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर प्रभुपाद की 152वीं जयंती न सिर्फ एक धार्मिक आयोजन है, बल्कि इसे बड़े स्तर पर सियासी संदेश देने की भी कोशिश है. कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की होने वाली मौजूदगी ने इसे सीधे चुनावी परिदृश्य से जोड़ दिया है. विशेषकर मतुआ समुदाय और नदिया जिले की सीटों से. यह आयोजन ऐसे समय होने जा रहा है जब नदिया और मतुआ वोट बैंक बंगाल की राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े हैं. विश्लेषकों का मानना है कि यह “धार्मिक मंच के बहाने राजनीतिक संदेश” का सीधा उदाहरण है, जिसमें BJP अपने प्रमुख समुदायों तक फिर से पहुँच बनाने की कोशिश कर रही है.

नदिया और मतुआ: क्यों महत्वपूर्ण है यह समीकरण?

नदिया जिले की सीटें नवद्वीप, नदिया उत्तर, नदिया दक्षिण और मतुआ प्रभावित उप‑क्षेत्र हमेशा चुनावी गणित तय करने में बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं. मतुआ समुदाय बंगाल में बसे बंगाली हिंदुओं का बड़ा और संगठित वोटर समूह है. इस समुदाय का राजनीतिक झुकाव सीधे चुनाव परिणाम पर असर डालता है. मतुआ समुदाय की धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों से भावनात्मक जुड़ाव बेहद गहरा है. ऐसे में अमित शाह का इस जयंती समारोह में आना राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है कि BJP इस समुदाय तक अपना संवाद और मजबूत करना चाहती है.

2026 विधानसभा चुनाव: नदिया में मुकाबला क्यों कड़ा है?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि 2026 के चुनाव में नदिया वह जिला होगा, जहां हर वोट और हर सीट निर्णायक होगी. यहां कुल 7 विधानसभा सीटें हैं, जिन पर:

  • सामाजिक समीकरण
  • धार्मिक पहचान
  • मतुआ जनसंख्या
  • और स्थानीय असंतोष

सब मिलकर चुनावी हवा का रुख बदल सकते हैं. BJP और TMC दोनों ही पार्टियां इस पूरे क्षेत्र पर फोकस बढ़ा चुकी हैं. BJP धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव के जरिए समुदाय को साधने की कोशिश कर रही है, जबकि TMC अपने स्थानीय संगठन और मौजूदा समर्थन के आधार का सहारा ले रही है.

SIR प्रक्रिया: मतुआ वोटरों में बढ़ी बेचैनी

राज्य में चल रही Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया ने मतुआ बहुल इलाकों में चिंता बढ़ा दी है. कई विधानसभा क्षेत्रों किशनगंज, रानाघाट उत्तर‑पूर्व, रानाघाट दक्षिण (SC), चकधर में: हजारों वोटर “अनमैप्ड” श्रेणी में आए,  कई नाम मतदाता सूची से हटे.  कुछ इलाकों में हटाए गए वोटरों की संख्या बेहद अधिक रही.  राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि इस SIR प्रक्रिया के कारण मतुआ वोटर प्रभावित हुए, तो इसका असर 45 से अधिक सीटों पर पड़ सकता है, जिससे बंगाल की राजनीति का संतुलन पूरी तरह बदल सकता है.

वोटिंग पैटर्न और दलों का क्या रहा है प्रभाव

पिछले चुनावों में BJP ने 2021 के विधानसभा चुनाव और 2019 तथा 2024 के लोकसभा चुनावों में बोंगा  और रानाघाट  विधानसभा क्षेत्रों में अच्छी पकड़ बनाई थी, खासकर मतुआ वोट बैंक के प्रभाव से.  तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने भी इन क्षेत्रों में अपने स्थानीय संगठन और सामाजिक समीकरणों के आधार पर मतदाता समर्थन बनाए रखा है. चुनावी नतीजों को अगर देखें तो यह स्थिर नहीं रहा है. जरूरी नहीं है कि 2026 में वही पैटर्न दोहराया जाएगा, SIR, SIR दस्तावेज़ तथा अन्य फैक्टर इसबार के वोटिंग पैटर्न को बदल सकते हैं.

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