- पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण के बाद कुल मतदाताओं की संख्या 7 करोड़ से नीचे आ गई है.
- करीब 60 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं, जिनमें केवल 55% मामलों में नाम वापस जोड़े गए हैं.
- तृणमूल कांग्रेस कटे हुए नामों को दोबारा जोड़वाने के लिए ट्रिब्यूनल और चुनाव आयोग पर जोर दे रही है.
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) ने विधानसभा चुनाव से पहले सियासी तापमान बढ़ा दिया है. ताजा आंकड़ों का निचोड़ यह बताता है कि राज्य में इस वक्त कुल 7 करोड़ 4 लाख 59 हजार 284 मतदाता दर्ज हैं, जबकि इससे पहले यह संख्या लगभग 7 करोड़ 66 लाख के आसपास थी. यानी लाखों नाम मतदाता सूची से हट चुके हैं.
2024 के लोकसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच 42 लाख वोटों का अंतर रहा था. ऐसे में मतदाता सूची से कटे नामों का असर इस बार चुनावी नतीजों पर निर्णायक माना जा रहा है. यही वजह है कि तृणमूल कांग्रेस की पूरी जद्दोजहद अब कटे हुए नामों को दोबारा जुड़वाने पर केंद्रित हो गई है.
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कोलकाता में बेचैनी
सुप्रीम कोर्ट में पश्चिम बंगाल की ओर से पेश वकील श्याम दीवान ने कहा कि करीब 60 लाख लोगों के नाम काटे गए हैं. इनमें से 44 लाख मामलों का डेटा उपलब्ध है. नाम शामिल करने की दर 55 फीसदी, जबकि 45 फीसदी मामलों में अस्वीकृति हुई है. न्यायिक सुरक्षा उपायों के बावजूद यह दर काफी अधिक है.
दीवान के मुताबिक, हटाए गए मतदाताओं के 20 लाख प्रकाशित मामलों में से 7 लाख अपीलें पहले ही दायर हो चुकी हैं और कई अपीलें प्रक्रिया में हैं. अदालत ने 10 मार्च को अपीलीय ट्रिब्यूनल को सूचित कर दिया था, लेकिन ट्रिब्यूनल अब तक काम शुरू नहीं कर पाया है.
इधर कोलकाता में तृणमूल के खेमे में यही सबसे बड़ी चिंता है कि जो वोट कट गए हैं, वे कैसे और कितनी संख्या में जुड़ पाएंगे. पार्टी के भीतर माना जा रहा है कि सारी कवायद का नतीजा ही चुनाव का रुख तय करेगा.
'EC जिम्मेदारी से पीछे न हटे'
एनडीटीवी से बातचीत में तृणमूल सरकार की मंत्री शशि पांजा ने कहा कि सिर्फ ट्रिब्यूनल पर सब कुछ छोड़ देना ठीक नहीं है. उनके शब्दों में, '60 लाख लोगों के नाम काट दिए जाना बहुत बड़ी बात है. अब सारा बोझ न्यायिक अधिकारियों पर डाल दिया गया है. यह व्यावहारिक रूप से कैसे मुमकिन होगा? चुनाव आयोग को अपनी जिम्मेदारी से नहीं भागना चाहिए.'
पांजा ने यह भी कहा कि बड़ी संख्या में लोग Exclude हो रहे हैं और समय भी बेहद कम बचा है. सोमवार को पहले चरण के नामांकन के साथ ही पहले चरण की मतदाता सूची फ्रीज़ हो गई. ऐसे में जिनके नाम रह गए, उनकी सुनवाई कैसे होगी और वे सूची में कैसे शामिल होंगे. यह बड़ा सवाल बना हुआ है.
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पैरा-मिलिट्री की तैनाती पर सियासत
चुनाव आयोग के बाद अब पैरा-मिलिट्री फोर्स भी तृणमूल के निशाने पर है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में पैरा-मिलिट्री की तैनाती को लेकर टिप्पणी की थी, जिस पर सियासी घमासान मचा. इस पर शशि पांजा ने सफाई देते हुए कहा कि सीएम के बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया. उनका कहना है कि चुनाव आयोग ने कहा है कि मतदाताओं के कागजात की जांच के बाद ही उन्हें बूथ में प्रवेश मिलेगा और मुख्यमंत्री सिर्फ लोगों की चिंता जाहिर कर रही थीं.
अधिकारियों के तबादले और मालदा हिंसा
चुनाव के दौरान देशभर में 506 अधिकारियों के तबादले किए गए, जिनमें से 483 अकेले पश्चिम बंगाल में हुए. बाकी चार राज्यों में केवल 23 तबादले हुए. इसे लेकर भी तृणमूल सवाल उठा रही है. मालदा में हुई हिंसा पर मंत्री का कहना है कि जब आधे नाम काट दिए जाएं, तो लोगों का चिंतित होना स्वाभाविक है. तृणमूल का आरोप है कि वहां लोगों को उकसाने में AIMIM की भूमिका रही. इस मामले में बंगाल सीआईडी ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है.
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नतीजा किस पर टिका?
फिलहाल तृणमूल कांग्रेस का पूरा फोकस इस बात पर है कि ट्रिब्यूनल के जरिए अंतिम समय तक कितने वोटरों के नाम जोड़वाए जा सकते हैं. पार्टी मान रही है कि पश्चिम बंगाल में इस बार का चुनाव इसी गणित- कटे और जुड़े नामों पर आकर टिक गया है.














