SC होना क्या अभिशाप है...ओडिशा में आंगनवाड़ी सहायिका ने गांववालों पर जातिगत भेदभाव का लगाया आरोप, जानिए पूरा मामला

ओडिशा के नवागांव में नियुक्त आंगनवाड़ी सहायिका शर्मिष्ठा सेठी ने आरोप लगाया कि उनकी जाति के कारण गांव वाले आंगनवाड़ी केंद्र का बहिष्कार कर रहे हैं. प्रशासन ने मामले की जांच शुरू करते हुए जल्द समाधान का आश्वासन दिया है.

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  • केंद्रपाड़ा जिले में शर्मिष्ठा सेठी की आंगनवाड़ी केंद्र में नियुक्ति के बाद गांव ने केंद्र का बहिष्कार किया है
  • शर्मिष्ठा सेठी का आरोप है कि गांव वाले जातिगत भेदभाव के कारण अपने बच्चों को आंगनवाड़ी केंद्र नहीं भेज रहे हैं
  • शर्मिष्ठा ने घर-घर जाकर बच्चों को आंगनवाड़ी भेजने की अपील की, लेकिन किसी ने उनकी बात नहीं मानी
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केंद्रपाड़ा:

ओडिशा के केंद्रपाड़ा जिले के राजनगर ब्लॉक में एक आंगनवाड़ी केंद्र को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है. 20 साल की शर्मिष्ठा सेठी का आरोप है कि उनकी नियुक्ति के बाद गांव वाले केंद्र का बहिष्कार कर रहे हैं. शर्मिष्ठा की पोस्टिंग नवागांव के आंगनवाड़ी केंद्र में 20 नवंबर 2025 को हुई थी. शर्मिष्ठा का कहना है कि जैसे ही उनकी नियुक्ति हुई, गांव वालों ने अपने बच्चों को आंगनवाड़ी भेजना बंद कर दिया. यहां तक कि वे बच्चों के लिए मिलने वाले मुफ्त सत्तू और अंडे भी लेने नहीं आ रहे हैं. उनका कहना है, “मेरे परिवार की हालत बहुत खराब है. बड़ी मुश्किल से मुझे यह नौकरी मिली है. मैं टीचर बनना चाहती हूँ, लेकिन मेरी बात कोई नहीं सुन रहा है.”

पीड़िता का क्या है आरोप?

उन्होंने आरोप लगाया कि गांव वाले सिर्फ इसलिए बच्चों को नहीं भेज रहे क्योंकि वह दलित समुदाय से आती हैं. शर्मिष्ठा कहती हैं, “समाज आगे बढ़ रहा है, लेकिन जातिगत भेदभाव अभी भी खत्म नहीं हुआ. अगर हम जाति में उलझे रहेंगे तो कभी आगे नहीं बढ़ पाएंगे.”

उन्होंने बताया कि उन्होंने खुद घर-घर जाकर लोगों से अपने बच्चों को भेजने की अपील की, लेकिन किसी ने उनकी बात नहीं मानी. इससे परेशान होकर उन्होंने सरकार और प्रशासन से न्याय की मांग की है. शर्मिष्ठा ने कहा, “क्या SC/ST होना कोई अभिशाप है? हमारे मुख्यमंत्री भी ST समुदाय से हैं. मैं उनसे भी न्याय की गुहार लगाती हूँ.”

प्रशासन कर रही है जांच

मामले की जानकारी मिलते ही स्थानीय प्रशासन ने जांच शुरू करने की बात कही है. अधिकारियों का कहना है कि जल्द ही इस मुद्दे को सुलझाने की कोशिश की जाएगी. वहीं, सामाजिक संगठन भी इसे गंभीर मामला मान रहे हैं और प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं. शर्मिष्ठा का कहना है कि उनकी लड़ाई सिर्फ नौकरी की नहीं, बल्कि सम्मान और बराबरी की है.

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