- इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के घर से भारी नकदी बरामदगी के बाद जांच समिति गठित की गई थी
- लोकसभा अध्यक्ष ने जज के खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया को स्वीकार किया लेकिन इस्तीफे के बाद प्रक्रिया समाप्त होगी
- कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार इस्तीफा देने वाले न्यायाधीश को सेवानिवृत्ति पेंशन और अन्य लाभ मिलेंगे
पिछले साल इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के घर से भारी मात्रा में नकदी बरामद होने के बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा गठित एक समिति इसकी जांच कर रही थी. उन्होंने दोषी पाए जाने पर न्यायाधीश को पद से हटाने की महाभियोग प्रक्रिया को भी स्वीकार कर लिया था. हालांकि, लोकसभा सचिवालय के सूत्रों के अनुसार, कल न्यायाधीश यशवंत वर्मा के इस्तीफे के साथ ही यह प्रक्रिया समाप्त हो जाएगी.
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि उनका इस्तीफा स्वीकार होने के बाद न्यायमूर्ति वर्मा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को सेवानिवृत्ति पर मिलने वाली पेंशन और अन्य लाभों के हकदार होंगे. संसद द्वारा पद से हटाए जाने पर वे इन लाभों से वंचित रह जाते.
सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट आकांक्षा राय ने एनडीटीवी को बताया कि देश के कई उच्च न्यायालयों का मानना है कि हाईकोर्ट के जज का 'इस्तीफा' उच्च न्यायालय न्यायाधीश (वेतन और सेवा शर्तें) अधिनियम 1954 के तहत 'सेवानिवृत्ति' माना जाता है.
उन्होंने कहा कि इसलिए, सेवा से इस्तीफा देने वाले न्यायाधीश भी सेवानिवृत्त न्यायाधीश के समान पेंशन लाभों के हकदार होंगे. राय ने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इसकी पुष्टि की है.
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14 मार्च, 2025 को लुटियंस दिल्ली स्थित जज यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास से भारी मात्रा में नकदी बरामद होने के बाद से न्यायाधीश आलोचनाओं के घेरे में थे. उस समय वे दिल्ली हाईकोर्ट में न्यायाधीश के पद पर कार्यरत थे. आरोप है कि नकदी नौकरों के क्वार्टर के पास स्थित एक भंडारगृह में मिली थी. न्यायाधीश ने इस बात से इनकार किया था कि उन्होंने या उनके परिवार के किसी सदस्य ने कभी वहां नकदी रखी थी.
सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायमूर्ति वर्मा से दिल्ली उच्च न्यायालय का न्यायिक कार्यभार वापस ले लिया था. उन्हें उनके मूल न्यायालय इलाहाबाद उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया गया था और वहां के मुख्य न्यायाधीश को निर्देश दिया गया था कि उन्हें कोई भी न्यायिक कार्य न सौंपा जाए.
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