- अजित पवार का निधन महाराष्ट्र के लिए एक बड़ा सदमा साबित हुआ, लोगों में शोक की लहर है
- अजित पवार अपने काम के प्रति अत्यंत समर्पित थे और अंतिम समय तक योजनाओं को पूरा करने में लगे रहे
- अजित पवार हर अधिकारी और कार्यकर्ता के बीच काम के प्रति सजगता और समझदारी के लिए जाने जाते थे
हादसे की दर्दनाक सुबह के बाद जब मौके की तस्वीरें सामने आईं, तो पूरे महाराष्ट्र का दिल एकबारगी थम सा गया. वहां फैले कागज़, बिखरी हुई फाइलें और टूटी पड़ी वस्तुएं किसी मूक गवाह की तरह खड़ी थीं. जैसे कह रही हों कि अजित दादा आखिरी सांस तक सिर्फ अपने काम में डूबे हुए थे. वो चले गए… लेकिन मैदान में बिखरे ये दस्तावेज़ बता रहे हैं कि अंतिम क्षणों तक उनके मन में न सत्ता थी, न शोहरत बस था तो काम का जुनून, काम को पूरा करने की बेचैनी, लोगों तक योजनाएं पहुंचाने की ललक.
अजीत पवार के बारे में यह बात हर अधिकारी, हर सहयोगी और हर कार्यकर्ता मानता था कि वे काम को लेकर बेहद सजग रहते थे. चाहे विधानसभा का सत्र हो, प्रशासनिक बैठक या किसी जिले का विकास कार्य. वे हर कागज़, हर फाइल, हर योजना को इतनी गहराई से समझते थे कि अधिकारी भी दंग रह जाते थे. उन्हें किसी भी मुद्दे का सार, उसकी पेचीदगी और उसका समाधान तुरंत पता होता था.
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कहते हैं कि मुख्यमंत्री बदल सकते हैं, मंत्रिमंडल बदल सकता है, लेकिन अजित दादा की कार्यशैली नहीं बदलती थी. वे हर सुबह मीटिंग लेते, हर शाम रिपोर्ट मांगते और हर काम को तय समय में पूरा करने के लिए प्रशासन पर सकारात्मक दबाव बनाते थे.
अजित पवार सिर्फ एक प्रशासक नहीं थे वे एक बेहतरीन संगठनकर्ता भी थे. राजनीतिक हलकों में माना जाता था कि जिस दिन कोई संकट आता, दादा सबसे पहले स्थिति को संभालने के लिए खड़े मिलते. उनकी टीम पर पकड़, उनके कार्यकर्ताओं से जुड़ाव और ज़मीनी समझ उन्हें बाकी नेताओं से अलग बनाती थी.
सरकार की पेचीदगियों को समझना, विभागों के बीच तालमेल बैठाना, मुश्किल फैसले लेना दादा अजित इन सबमें बेमिसाल थे. अधिकारियों के बीच भी उनकी विशेष पकड़ रही. वे सीधे, स्पष्ट नेता थे. जिसका असर उनके काम में साफ दिखता था.
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