- पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के विधायक संख्या में भारी गिरावट आई है, वर्तमान में उसके पास अस्सी विधायक हैं
- ममता बनर्जी की भवानीपुर सीट हारना तृणमूल कांग्रेस के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है
- पार्टी के कई वरिष्ठ नेता चुनाव हार चुके हैं और संगठनात्मक कमजोरी के संकेत भी सामने आए हैं
पश्चिम बंगाल में विधानसभा का चुनाव हारने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही पूछा जा रहा है कि तृणमूल कांग्रेस का क्या होगा? क्या पार्टी बचेगी या उसका भी वही हाल होगा जो बंगाल में पहले कांग्रेस और फिर लेफ्ट के साथ हुआ?
आजादी के बाद से लेकर 1977 तक पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का शासन रहा और सिद्धार्थ शंकर रे कांग्रेस के अंतिम मुख्यमंत्री थे. 1977 में जब कांग्रेस को हरा कर ज्योति बसु की सरकार आई तब से कांग्रेस का पतन होता गया और वो शून्य पर आ गई. इस बार भी उसके केवल दो विधायक हैं. यही हाल वाममोर्चा का रहा. 1977 से 2011 तक सत्ता में रहने के बावजूद आज लेफ्ट के केवल दो ही विधायक हैं. यही वजह है कि अब सबके दिमाग में यह आ रहा है कि 2011 से लेकर 2026 तक सत्ता में रहने के बाद तृणमूल कांग्रेस का क्या होगा?
हालांकि अभी उसके पास 80 विधायक हैं जबकि पिछली विधानसभा में उसके पास 215 विधायक थे. बीजेपी 77 से 207 पर पहुंच गई है. तृणमूल कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका ममता बनर्जी का खुद की सीट भवानीपुर का हारना है. 1977 में कांग्रेस को 20 और 1982 में 49 सीट मिली थी जो 2021 में शून्य हो गई. उसी तरह 2011 में जब लेफ्ट फ्रंट सत्ता से गई तब उनके पास 62 सीटें थीं जो 2021 में शून्य था. कहने का मतलब है कि बंगाल में लेफ्ट जैसी कैडर और विचारधारा से मजबूत पार्टी भी जब सत्ता से बाहर गई तो खत्म हो गई, शून्य पर आ गई तो तृणमूल कांग्रेस के साथ भी ऐसा हो सकता है.
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तृणमूल का क्या होगा?
ये पश्चिम बंगाल का इतिहास रहा है तो सवाल वही उठता है कि कहीं ऐसा तृणमूल कांग्रेस के साथ तो नहीं हो जाएगा? हो सकता है. जरूर हो सकता है मगर इतनी जल्दी नहीं. अभी भी तृणमूल कांग्रेस के पास 80 विधायक, लोकसभा में 29 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं और खुद ममता बनर्जी भी हैं भले ही वो अपनी सीट हार गईं हों.
तृणमूल कांग्रेस का पतन इतनी जल्दी नहीं होगा खासकर ममता बनर्जी के रहते हुए क्योंकि वो एक फाइटर हैं और संघर्ष ही उनका जीवन रहा है और सड़क उनका कर्मभूमि. उन्होंने बहुत उतार-चढ़ाव देखे हैं मगर ममता बनर्जी के बाद क्या? इस चुनाव में ममता बनर्जी के सारे सिपहसलार शशि पांजा, अरूप विश्वास, सुजीत बोस, ब्रात्या बसु, चंद्रिमा भट्टाचार्य चुनाव हार चुके हैं. तृणमूल कांग्रेस को बनाने वाले मुकुल रॉय रहे नहीं तो पार्थ चटर्जी पार्टी से निष्कासित हैं. ममता बनर्जी ने जब पहली बार विधायक दल की बैठक बुलाई उसमें भी दस विधायक मौजूद नहीं थे. कहने का मतलब है कि तृणमूल कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है.
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ममता के बाद कौन?
सवाल वही है ममता बनर्जी के बाद कौन है? अभिषेक बनर्जी उत्तराधिकारी हैं मगर क्या वो पार्टी को संभाल सकते हैं? क्योंकि तृणमूल कांग्रेस की कोई राजनीतिक विचारधारा नहीं है वह सत्ता के लिए पहले से ही कांग्रेस और बीजेपी के बीच डोलती रही है. यह पार्टी ममता बनर्जी के सड़क पर संघर्ष करने वाले एक नेता ने बनाई थी जो वाममोर्चा की सरकार को उखाड़ फेकने आई थी. वो जब 15 साल तक सत्ता में रहीं तब भी केंद्र को लेकर उनकी भूमिका विपक्ष की ही रही और वो केंद्र का विरोध करके ही सत्ता में आती रहीं.
अब चुनौती अभिषेक बनर्जी के लिए है. तृणमूल कांग्रेस के एक नेता ने नाम ना छापने की शर्त पर कहा कि “अभिषेक बनर्जी पर तो भ्रष्टाचार के आरोप हैं. उनकी तुलना ममता बनर्जी से करना गलत होगा. अभिषेक बनर्जी ने पार्टी संगठन को तबाह करके आईपैक पर भरोसा किया और उसे अपने ही नेताओं के जासूसी के लिए इस्तेमाल किया. अभिषेक का बीजेपी से लड़ना मुश्किल होगा. हां वो तभी संभव है यदि वो सड़कों पर उतर कर लाठी खाने के लिए तैयार हैं.”
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अभिषेक के सामने कई चुनौतियां
आईपैक को लेकर तृणमूल कांग्रेस के सांसद कल्याण बनर्जी ने भी काफी भला बुरा कहा है. उनका कहना है कि आईपैक पर अतिनिर्भरता ने पार्टी को खत्म कर दिया. कल्याण बनर्जी ने इसके लिए अभिषेक को दोषी ठहराया है. वहीं तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित प्रवक्ता रिजु दत्ता ने कहा है कि आईपैक ही पार्टी चला रही थी और इसकी जिम्मेवारी ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की बनती है.
ऐसे हालात में अभिषेक बनर्जी के सामने चुनौती बड़ी है. वो सांसद हैं और पहले उनको अपनी पार्टी को नीचे से ऊपर तक टूटने से बचाना है. फिर पार्टी को अपने पैरों पर खड़ा करना भी है. लेकिन क्या वो यह सब कर पाएंगे क्योंकि अब ममता बनर्जी को तय करना है कि अभिषेक बनर्जी दिल्ली की राजनीति करते हैं या बंगाल की?
तृणमूल कांग्रेस के लिए राहत की बात है कि अभी भी उसके पास 40 फीसदी वोट हैं मगर इस चुनाव ने यह भी संकेत दे दिया है उसके मुस्लिम वोट में कांग्रेस और वामपंथी सेंध लगा रहे हैं. ममता बनर्जी की अब पहली प्राथमिकता 2027 और 2028 में होने वाले नगर निकाय और पंचायत चुनाव होने चाहिए, जहां उनके संगठन और नेतृत्व की एक बार फिर परीक्षा होगी.
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