'जन्मपत्री उम्र का सबूत नहीं', दिल्ली हाईकोर्ट ने रेप के आरोपी को बरी करते हुए क्यों कहा ऐसा, जान लें

कोर्ट ने ये टिप्पणी 25 मार्च को सुनवाई के दौरान की है. इस मामले की सुनवाई जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की बेंच ने की है. मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि पॉक्सो एक्ट के तहत आने वाले मामलों में पीड़िता की उम्र ही सबसे अहम सवाल होती है.

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दिल्ली हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी
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  • दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि जन्मपत्री और वैक्सीनेशन कार्ड किसी की उम्र का प्रमाण नहीं माने जा सकते हैं
  • 16 वर्षीय लड़की के अपहरण और रेप के आरोपी को पॉक्सो एक्ट के तहत मुकदमा चलाने से कोर्ट ने इनकार किया
  • कोर्ट ने बताया कि पॉक्सो एक्ट में पीड़िता की सही उम्र सबसे अहम सवाल होती है, जिसे प्रमाणित करना जरूरी है
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नई दिल्ली:

दिल्ली हाईकोर्ट की एक टिप्पणी इन दिनों चर्चाओं में बनी हुई है. इस टिप्पणी में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी की जन्मपत्री उसके उम्र का सबूत नहीं है. आपको बता दें कि हाईकोर्ट ने ये टिप्पणी 16 साल की लड़की के अपहरण और बाद में उसके साथ रेप करने के आरोपी शख्स को बरी करने के फैसले को सही ठहराते हुए की है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि जन्मपत्री और वैक्शीनेशन कार्ड किसी के उम्र का सबूत नहीं माने जा सकते हैं. ऐसे में आरोपी पर पॉक्सो एक्ट के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता. 

कोर्ट ने ये टिप्पणी 25 मार्च को सुनवाई के दौरान की है. इस मामले की सुनवाई जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की बेंच ने की है. मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि पॉक्सो एक्ट के तहत आने वाले मामलों में पीड़िता की उम्र ही सबसे अहम सवाल होती है. खास बात ये है कि इस मामले में लड़की के मां-बाप न तो उसकी जन्म की तरीख बता पाए और न ही कोर्ट में उसका असली जन्म प्रमाण पत्र पेश कर पाए. 

आपको बता दें कि दिल्ली हाईकोर्ट ने पहले भी अलग-अलग मामलों में ऐसे टिप्पणी की थी जिसने सबका ध्यान खींचा था. कुछ समय पहले ही एक अलग मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने एक 81 साल की महिला की याचिका खारिज कर दी, जिसमें वह अपने पुराने वैवाहिक घर में दोबारा रहने की अनुमति चाहती थीं. कोर्ट ने साफ कहा था कि घरेलू हिंसा कानून (DV Act) किसी महिला को यह अधिकार नहीं देता कि वह हर हाल में पुराने घर में वापस रहने की मांग करे- खासकर जब उसके पास अच्छा वैकल्पिक रहने का इंतजाम मौजूद हो.

कोर्ट ने क्या कहा?

महिला पहले खुद अपनी मर्जी से अपने पति की दूसरी प्रॉपर्टी में जाकर रहने लगी थीं. वह 'छतहीन' नहीं हैं, यानी उनके पास रहने की जगह उपलब्ध है. उनका घर छोड़ना किसी हिंसा या मजबूरी की वजह से साबित नहीं हुआ. इसलिए पुराने घर में जबरन दोबारा एंट्री दिलाना सही नहीं होगा.

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क्या था मामला?

दरअसल 81 वर्षीय महिला ने दावा किया था कि वह लगभग 60 वर्षों से ग्रीन पार्क स्थित अपने घर में रहती थी. स्वास्थ्य कारणों से अप्रैल 2023 में वह अपनी दूसरे घर (जहां बेटी रहती थी) चली गई थीं. जुलाई 2023 में जब वह वापस लौटना चाहती थीं, तो कथित रूप से उन्हें भीतर प्रवेश नहीं दिया गया. महिला ने DV Act की धारा 19 व 23 के तहत residence order की मांग की थी.

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