RTE का 25% कोटा SOP से नहीं, कानून से लागू होगा: सुप्रीम कोर्ट

कोर्ट ने कहा कि निजी स्कूलों में 25% सीटें गरीब और वंचित बच्चों के लिए आरक्षित करने का प्रावधान केवल SOP के भरोसे छोड़ देने से व्यवस्था विफल हो गई है और इससे बच्चों के शिक्षा के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हो रहा है.

विज्ञापन
Read Time: 3 mins
फटाफट पढ़ें
Summary is AI-generated, newsroom-reviewed
  • सुप्रीम कोर्ट ने निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में 25% आरक्षण के लिए सरकारी SOP को पर्याप्त नहीं माना है.
  • अदालत ने राज्यों को RTE एक्ट की धारा 38 के तहत बाध्यकारी नियम बनाने का निर्देश दिया है.
  • SOP को कानून का दर्जा नहीं मिलने के कारण उन दिशानिर्देशों का कानूनी बल और जवाबदेही नहीं होती है.
क्या हमारी AI समरी आपके लिए उपयोगी रही?
हमें बताएं।
नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में कमजोर वर्ग और वंचित समूह के बच्चों के लिए 25% आरक्षण केवल सरकारी SOP (Standard Operating Procedures) के आधार पर लागू नहीं किया जा सकता. इसके लिए राज्यों को बाध्यकारी नियम बनाने होंगे.

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने दिनेश बिवाजी अष्टिकर बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में कहा कि बाल अधिकार संस्थाओं द्वारा जारी SOP को कानून का दर्जा प्राप्त नहीं है और वे RTE Act की धारा 38 के तहत बनाए जाने वाले नियमों का विकल्प नहीं हो सकते. 

इन दिशानिर्देशों का कोई कानूनी बल नहीं है. इनके उल्लंघन पर कोई जवाबदेही तय नहीं होती. यदि बाध्यकारी नियम नहीं बनाए गए, तो अनुच्छेद 21A और RTE Act की धारा 12(1)(c) मृत अक्षर बनकर रह जाएगी.

कोर्ट ने कहा कि निजी स्कूलों में 25% सीटें गरीब और वंचित बच्चों के लिए आरक्षित करने का प्रावधान केवल SOP के भरोसे छोड़ देने से व्यवस्था विफल हो गई है और इससे बच्चों के शिक्षा के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हो रहा है.

इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे RTE Act की धारा 38 के तहत स्पष्ट, बाध्यकारी और लागू किए जा सकने वाले नियम बनाएं . इन नियमों को बाल अधिकार संस्थाओं से परामर्श के बाद अधिसूचित किया जाना होगा.  

यह मामला महाराष्ट्र के एक गरीब परिवार से जुड़ा था, जिनके बच्चों को उनके पड़ोस के निजी स्कूल में 25% RTE कोटे के तहत प्रवेश नहीं दिया गया, जबकि RTI से यह सामने आया था कि सीटें खाली थीं. स्कूल द्वारा प्रवेश देने से इनकार करने पर परिवार ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया, लेकिन हाईकोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि आवेदक ने ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया का पालन नहीं किया.  

Advertisement

यह तब भी हुआ जब जिला शिक्षा अधिकारी ने स्कूल को बच्चों को दाखिला देने का निर्देश दिया था और 648 सीटें खाली पाई गई थीं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि, 'ऑनलाइन-केवल एडमिशन सिस्टम, डिजिटल अशिक्षा, भाषा की समस्या, हेल्प-डेस्क का अभाव, सीटों की पारदर्शी जानकारी न होना. ये सभी मिलकर गरीब बच्चों को शिक्षा से बाहर कर रहे हैं.

प्राथमिक शिक्षा एक सकारात्मक मौलिक अधिकार है, जो सरकार, स्कूल, स्थानीय निकाय और समाज सभी पर कर्तव्य डालता है. कोर्ट ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) को इस मामले में पक्षकार बनाते हुए नियमों के अनुपालन और निगरानी की जिम्मेदारी भी सौंपी है. मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल को होगी.
 

Advertisement
Featured Video Of The Day
Lucknow Blue Drum Horror: पढ़ाई पर कसाई बने अक्षत पर हैरान करने वाले खुलासे | UP News | CM Yogi
Topics mentioned in this article