पोते-पोतियों के संग खेलने और देखभाल करने से बुज़ुर्गों का दिमाग होता है तेज़, रिसर्च में बात आई सामने

Taking care of grandchildren boosts brain power and memory in adults: तेज़ रफ्तार ज़िंदगी और न्यूक्लियर फैमिली के बढ़ते चलन के बीच अक्सर बुजुर्गों को यह महसूस होता है कि उनकी भूमिका सीमित होती जा रही है. लेकिन हालिया वैज्ञानिक शोध यह साबित करता है कि बुजुर्गों की सक्रिय पारिवारिक भागीदारी सिर्फ भावनात्मक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक सेहत के लिए भी बेहद लाभकारी है. जानिए और क्या-क्या बातें निकलकर आईं सामने शोध में.

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Taking care of grandchildren boosts brain power in adults
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Taking care of grandchildren boosts brain power and memory in adults: तेज़ रफ्तार ज़िंदगी और न्यूक्लियर फैमिली के बढ़ते चलन के बीच अक्सर बुजुर्गों को यह महसूस होता है कि उनकी भूमिका सीमित होती जा रही है. लेकिन हालिया वैज्ञानिक शोध यह साबित करता है कि बुजुर्गों की सक्रिय पारिवारिक भागीदारी सिर्फ भावनात्मक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक सेहत के लिए भी बेहद लाभकारी है. खासतौर पर पोते-पोतियों या नाती-नातिन की देखभाल बुजुर्गों के दिमाग को लंबे समय तक सक्रिय और तेज बनाए रखने में मदद करती है. यह अध्ययन पारिवारिक रिश्तों के महत्व को नए सिरे से रेखांकित करता है.

कहां प्रकाशित हुआ यह शोध?

यह अहम शोध प्रतिष्ठित जर्नल Psychology and Aging में प्रकाशित हुआ है. अध्ययन की प्रमुख लेखिका फ्लाविया चेरेचेश हैं. इस रिसर्च में यह समझने की कोशिश की गई कि बच्चों की देखभाल बुजुर्गों की मानसिक क्षमताओं पर किस तरह असर डालती है और क्या इससे उम्र के साथ आने वाली मानसिक गिरावट को धीमा किया जा सकता है.

कितने बुजुर्ग हुए शामिल?

इस अध्ययन में कुल 2,887 दादा-दादी और नाना-नानी को शामिल किया गया, जिनकी उम्र 50 साल से अधिक थी. प्रतिभागियों की औसत आयु लगभग 67 वर्ष रही. शोधकर्ताओं ने वर्ष 2016 से 2022 के बीच इन बुजुर्गों के आंकड़ों और मानसिक परीक्षणों का विश्लेषण किया. इसमें याददाश्त, शब्दों के प्रयोग और भाषा कौशल जैसी क्षमताओं पर विशेष ध्यान दिया गया.

बुजुर्गों की मेमोरी और भाषा कौशल में आता है सुधार

शोध के नतीजों में सामने आया कि जो बुजुर्ग अपने पोते-पोतियों की देखभाल करते थे, उन्होंने मेमोरी और वर्बल स्किल्स से जुड़े परीक्षणों में बेहतर प्रदर्शन किया. उनकी तुलना में वे बुजुर्ग जो बच्चों की देखभाल में शामिल नहीं थे, अपेक्षाकृत कमजोर पाए गए. यह संकेत देता है कि बच्चों के साथ समय बिताना दिमाग के लिए एक तरह का प्राकृतिक व्यायाम है.

देखभाल कितनी बार होती है, यह जरूरी नहीं

इस अध्ययन की सबसे दिलचस्प बात यह रही कि मानसिक लाभ इस पर निर्भर नहीं करते थे कि बुजुर्ग कितनी बार बच्चों की देखभाल करते हैं. चाहे देखभाल रोजाना हो या कभी-कभार, और चाहे वह पढ़ाने, खेलने या सामान्य निगरानी तक सीमित हो, दिमागी फायदे लगभग समान पाए गए. इससे यह स्पष्ट हुआ कि असली असर देखभाल की भूमिका में सक्रिय रूप से शामिल होने से पड़ता है.

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बच्चों के साथ समय क्यों रखता है दिमाग को एक्टिव?

शोधकर्ताओं का मानना है कि बच्चों के साथ बातचीत, उनके सवालों के जवाब देना, कहानियां सुनाना और खेलना बुजुर्गों के दिमाग को लगातार सक्रिय रखता है. बच्चों की जिज्ञासा और ऊर्जा बुजुर्गों को सोचने, प्रतिक्रिया देने और नए शब्दों का इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करती है. इससे मानसिक सतर्कता बनी रहती है.

बुजुर्गों में पनपता है उद्देश्य और जिम्मेदारी का भाव

पोते-पोतियों की देखभाल बुजुर्गों के जीवन में उद्देश्य और जिम्मेदारी का भाव भी पैदा करती है. इससे अकेलापन कम होता है और सामाजिक जुड़ाव बढ़ता है. भावनात्मक संतोष के साथ-साथ यह मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत करने में भी मदद करता है, जो बढ़ती उम्र में बेहद जरूरी माना जाता है.

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बुजुर्गों के लिए क्या है सीख?

अध्ययन यह बताता है कि उम्र के साथ मानसिक गिरावट को पूरी तरह रोकना भले संभव न हो, लेकिन सक्रिय जीवनशैली और पारिवारिक जिम्मेदारियां इसे काफी हद तक धीमा कर सकती हैं. परिवार के भीतर अगली पीढ़ी से जुड़ाव बुजुर्गों के लिए मानसिक रूप से संजीवनी की तरह काम करता है.

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(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

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