वात दोष बिगड़ने से भी होता है तनाव, जानें क्या कहता है आयुर्वेद और कैसे करें इसे कंट्रोल

तनाव के प्रमुख कारणों में हाई वात लेवल और शरीर से जमा टॉक्सिन्स का समय पर बाहर न निकलना शामिल हैं. जब व्यक्ति लगातार मानसिक दबाव में रहता है और अपने मन की बात किसी से शेयर नहीं करता, तो ये भावनाएं शरीर में गहराई से बैठ जाती हैं और तनाव का रूप ले लेती हैं.

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वात दोष वायु तत्व से संबंधित है और यह शरीर में गति, संचार और नर्व्स सिस्टम को कंट्रोल करता है.

आज की लाइफस्टाइल में तनाव एक आम समस्या बन गई है, जो न केवल हमारे मेंटल हेल्थ को प्रभावित करती है, बल्कि शारीरिक रूप से भी कई प्रकार की समस्याओं को जन्म देती है. भागदौड़ भरी दिनचर्या, प्रतिस्पर्धा, समय की कमी और भावनात्मक बोझ के कारण व्यक्ति अक्सर भीतर ही भीतर टूटता चला जाता है. आधुनिक चिकित्सा जहां तनाव को न्यूरोलॉजिकल और साइकोलॉजिकल दृष्टिकोण से देखती है, वहीं आयुर्वेद इसे शरीर और मन के बीच संतुलन के बिगड़ने के रूप में समझता है. आयुर्वेद के अनुसार, तनाव केवल मानसिक स्थिति नहीं है, बल्कि यह शरीर के वात दोष के असंतुलन का संकेत है.

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वात दोष असंतुलित होने पर क्या होता है?

कई आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है. चरक और सुश्रुत संहिता में इसको परिभाषित किया गया है. बताया गया है कि वात दोष वायु तत्व से संबंधित है और यह शरीर में गति, संचार और नर्व्स सिस्टम को कंट्रोल करता है. जब यह दोष असंतुलित होता है, तो व्यक्ति को मानसिक अस्थिरता, बेचैनी, अनिद्रा और शारीरिक जकड़न जैसे लक्षणों का अनुभव होता है. शरीर में यह असंतुलन सबसे पहले मांस और स्नायु (लिगामेंट) पर असर डालता है, जिससे व्यक्ति को गर्दन, पीठ या कंधों में दबाव महसूस होता है. सुबह के समय शरीर में जकड़न, थकान और नींद के दौरान दांत पीसने की आदतें इसके स्पष्ट संकेत हो सकते हैं.

वात बढ़ने से भी होता है तनाव

तनाव के प्रमुख कारणों में हाई वात लेवल और शरीर से जमा टॉक्सिन्स का समय पर बाहर न निकलना शामिल हैं. जब व्यक्ति लगातार मानसिक दबाव में रहता है और अपने मन की बात किसी से शेयर नहीं करता, तो ये भावनाएं शरीर में गहराई से बैठ जाती हैं और तनाव का रूप ले लेती हैं. यह धीरे-धीरे स्नायु तंत्र को प्रभावित करता है, जिससे शारीरिक तनाव के लक्षण प्रकट होने लगते हैं.

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वात को संतुलित करना जरूरी

आयुर्वेदिक उपचार में सबसे पहले वात को संतुलित करने की प्रक्रिया अपनाई जाती है. इसके लिए लाइफस्टाइल में रेगुलेशन, गर्म भोजन, पर्याप्त विश्राम और मालिश का महत्व होता है. तेल मालिश शरीर में वात को शांत करती है और मांसपेशियों को लचीलापन देती है.

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योग और प्राणायाम भी आयुर्वेद का ही हिस्सा माने जाते हैं, जो मन और शरीर के बीच संतुलन स्थापित करते हैं. खासकर अनुलोम-विलोम और श्वास पर कंट्रोल से वात दोष संतुलित होता है और मन को शांति मिलती है.

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(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

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