रात 3 बजे ट्रॉमा सेंटर में दहशत, रेबीज ने शख्स को बना दिया हिंसक, जिंदगी और मौत की जंग

Rabies Attack: इलाज के दौरान मरीज ने अचानक रस्सी तोड़ दी और जोरदार हंगामा करने लगा. वह चिल्ला रहा था, बेड के लोहे के पाइप पर दांत गड़ा रहा था और आसपास मौजूद लोगों को डराने लगा.

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Rabies Attack: स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अस्पताल स्टाफ ने एहतियातन मरीज को एक कमरे में सीमित किया.

Rabies Turns Man Violent: रेबीज एक ऐसा रोग है, जिसका नाम सुनते ही डर पैदा हो जाता है. यह बीमारी जितनी खतरनाक है, उतनी ही तेजी से जानलेवा साबित होती है. हाल ही में बनास जनरल, पालनपुर के सिविल ट्रॉमा सेंटर में जो घटना सामने आई, उसने एक बार फिर साबित कर दिया कि रेबीज सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि एक भयानक आपात स्थिति है, जिसमें मरीज, परिवार और अस्पताल स्टाफ सभी की सुरक्षा दांव पर लग जाती है.

रात 3 बजे ट्रॉमा सेंटर में हड़कंप

रेबीज ग्रस्त कुत्ते के काटने से पीड़ित एक मरीज को उसके परिजन रात करीब 3 बजे ट्रॉमा सेंटर लेकर पहुंचे. मरीज की हालत बेहद गंभीर और असामान्य थी. परिवारजन उसे रस्सी से बांधकर लाए थे, क्योंकि वह लगातार हिंसक व्यवहार कर रहा था. इलाज के दौरान मरीज ने अचानक रस्सी तोड़ दी और जोरदार हंगामा करने लगा. वह चिल्ला रहा था, बेड के लोहे के पाइप पर दांत गड़ा रहा था और आसपास मौजूद लोगों को डराने लगा.

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अस्पताल स्टाफ ने एहतियातन मरीज को एक कमरे में सीमित किया. तुरंत डीन पी.एन. चौधरी को सूचना दी गई, जिन्होंने पुलिस अधीक्षक (SP) और कलेक्टर को भी मामले से अवगत कराया. मरीज को काबू में करने के लिए फॉरेस्ट विभाग को भी सूचित किया गया और मछली पकड़ने की जाली मंगाने की व्यवस्था की गई.

काबू पाने की चुनौती और इलाज

यह बड़ा सवाल था कि मरीज को बेहोश करने का इंजेक्शन दिया जाए या नहीं, क्योंकि वह खुले में घूमते हुए अन्य मरीजों और स्टाफ के लिए खतरा बन सकता था. आखिरकार, परिवारजनों की मदद से मरीज को चारपाई से मजबूती से बांधा गया. इसके बाद उसे इंजेक्शन देकर बेहोश किया गया, बेड पर लिटाया गया और हाथ-पैर सुरक्षित तरीके से बांधे गए. इसके बाद ड्रिप, दवाइयां और जरूरी इलाज शुरू किया गया. मरीज के ब्लड सैंपल भी लिए गए और फिलहाल उसका इलाज जारी है.

रेबीज क्यों है इतना खतरनाक?

रेबीज एक वायरल रोग है, जो सीधे नर्वस सिस्टम पर हमला करता है और दिमाग में गंभीर क्षति पहुंचाता है. इस बीमारी में दिमाग में नेग्री बॉडी बनती है. मरीज को पानी से डर लगने लगता है, जिसे हाइड्रोफोबिया कहा जाता है. मरीज बहुत ज्यादा आक्रामक हो जाता है और किसी को भी काट सकता है. उसकी लार में रेबीज वायरस मौजूद होता है, जिससे वह दूसरों को भी संक्रमित कर सकता है.

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सबसे डरावनी बात यह है कि एक बार रेबीज के लक्षण दिखाई देने लगें, तो मरीज के बचने की संभावना लगभग शून्य हो जाती है. आज तक मेडिकल साइंस में ऐसे मामलों में बचाव के बहुत ही दुर्लभ उदाहरण हैं.

बचाव ही एकमात्र इलाज

रेबीज का कोई इलाज नहीं है, केवल समय पर बचाव ही जीवन बचा सकता है. इसलिए यह सभी के लिए सख्त चेतावनी है:

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  • चाहे कुत्ता पालतू हो या स्ट्रीट डॉग.
  • काटते ही तुरंत अस्पताल जाएं.
  • बिना देरी के एंटी-रेबीज वैक्सीन लगवाएं.

रेबीज प्रोटेक्शन का टीकाकरण 0, 3, 7 और 28 दिन के तय शेड्यूल के अनुसार पूरा करना बेहद जरूरी है.

बनास सिविल ट्रॉमा सेंटर की यह घटना रेबीज की भयावहता का जीता-जागता उदाहरण है. जागरूकता, सतर्कता और समय पर टीकाकरण ही इस जानलेवा बीमारी से बचने का एकमात्र रास्ता है. लापरवाही की कीमत यहां जिंदगी हो सकती है

(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

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