AI बदल सकती है मेडिकल की दुनिया, 2026 होगा टर्निंग प्वाइंट

बीते कुछ सालों में महामारी, कैंसर, मोटापा और पुरानी बीमारियों ने पूरी दुनिया के हेल्थ सिस्टम को झकझोर दिया. इसी वजह से कई देशों ने मेडिकल रिसर्च को राष्ट्रीय प्राथमिकता बना लिया.

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mRNA Cancer Treatment: 2026 में सबसे ज्यादा उम्मीदें कैंसर उपचार से जुड़ी हैं.

साल 2026 को मेडिकल साइंस के लिए एक टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है. इलाज अब सिर्फ डॉक्टर, दवा और अस्पताल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जीन, डेटा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नई बायोटेक्नोलॉजी के मेल से स्वास्थ्य की परिभाषा ही बदल रही है. बीते कुछ सालों में महामारी, कैंसर, मोटापा और पुरानी बीमारियों ने पूरी दुनिया के हेल्थ सिस्टम को झकझोर दिया. इसी वजह से कई देशों ने मेडिकल रिसर्च को राष्ट्रीय प्राथमिकता बना लिया. इसका असर 2026 में साफ दिखाई देने वाला है, जब सालों की रिसर्च आम मरीजों तक पहुंचने के करीब होगी.

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कैंसर के इलाज में सबसे तेज प्रगति

2026 में सबसे ज्यादा उम्मीदें कैंसर उपचार से जुड़ी हैं. अमेरिका इस क्षेत्र में सबसे आगे माना जा रहा है. 2024–2025 के दौरान कई नई CAR-T सेल थेरेपी और टार्गेटेड ड्रग्स को यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन से मंजूरी मिली. 2026 में इनका दायरा और बढ़ने की उम्मीद है. खास बात यह है कि KRAS जीन को टार्गेट करने वाली दवाएं, जिन्हें पहले लगभग असंभव माना जाता था, अब अंतिम क्लिनिकल स्टेज में हैं. अमेरिका और जर्मनी की फार्मा कंपनियां फेफड़े और कोलोरेक्टल कैंसर के लिए नई उम्मीद बनकर उभर रही हैं.

mRNA तकनीक: वैक्सीन से आगे इलाज तक

कोविड वैक्सीन के बाद mRNA तकनीक सिर्फ संक्रमण तक सीमित नहीं रही. 2026 तक यह कैंसर और दुर्लभ बीमारियों के इलाज में बड़ी भूमिका निभा सकती है. जर्मनी की बायोटेक कंपनियां पर्सनलाइज्ड कैंसर वैक्सीन पर काम कर रही हैं, जहां हर मरीज के जीन के अनुसार वैक्सीन तैयार की जाती है.

अमेरिका और जापान mRNA तकनीक का उपयोग कैंसर की दोबारा वापसी रोकने और ऑटोइम्यून बीमारियों में कर रहे हैं. रूस ने भी mRNA आधारित कैंसर वैक्सीन विकसित करने का दावा किया है, जिसे 2026 तक लॉन्च करने की बात कही गई है। इस पर वैश्विक चिकित्सा समुदाय की नजर बनी हुई है.

AI और डिजिटल मेडिसिन का बढ़ता दखल

तीसरा बड़ा बदलाव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल मेडिसिन में दिख रहा है. अमेरिका, ब्रिटेन और चीन में AI बेस्ड डायग्नोसिस टूल्स अस्पतालों में इस्तेमाल हो रहे हैं. 2025-2026 में AI यह तय करने में मदद कर रहा है कि किस मरीज पर कौन-सी दवा ज्यादा असरदार होगी. चीन खासतौर पर AI-ड्रिवन रेडियोलॉजी और पैथोलॉजी सॉफ्टवेयर में आगे है, जिससे कैंसर और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों की पहचान पहले से ज्यादा तेज और सटीक हो रही है.

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लिक्विड बायोप्सी: बिना सर्जरी जांच

लिक्विड बायोप्सी 2026 की एक अहम तकनीक बन सकती है. इसमें सिर्फ खून की जांच से कैंसर की पहचान और निगरानी संभव होती है. अमेरिका और दक्षिण कोरिया में विकसित ये टेस्ट बिना सर्जरी के इलाज को आसान बना रहे हैं. सीमित संसाधनों वाले देशों के लिए यह तकनीक खासतौर पर फायदेमंद मानी जा रही है.

भारत की बढ़ती भूमिका

भारत 2026 तक किफायती दवाओं का बड़ा केंद्र बनकर उभर रहा है. बायोसिमिलर और सस्ती कैंसर दवाओं के जरिए भारतीय कंपनियां महंगे इलाज को आम लोगों की पहुंच में ला रही हैं. इससे विकासशील देशों में इलाज की उम्मीद बढ़ी है.

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मोटापे की दवाएं होंगी सस्ती

मोटापे की दवाओं को लेकर भी 2026 अहम है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार GLP-1 थेरेपी की मांग बहुत ज्यादा है, लेकिन उत्पादन सीमित. अच्छी खबर यह है कि कुछ बड़ी दवाओं के पेटेंट 2026 में खत्म हो रहे हैं, जिससे भारत, चीन, कनाडा जैसे देशों में सस्ते जेनेरिक विकल्प आने की संभावना है.

कुल मिलाकर 2026 चिकित्सा विज्ञान के लिए संभावनाओं का साल है. कैंसर, जीन-बेस्ड थेरेपी, mRNA तकनीक, AI-सपोर्टेड मेडिसिन और किफायती दवाएं भविष्य की दिशा तय कर रही हैं. अमेरिका, जर्मनी, चीन, जापान और भारत इस बदलाव के केंद्र में हैं. यही वजह है कि 2026 को वह साल माना जा रहा है, जब रिसर्च प्रयोगशालाओं से निकलकर आम मरीजों की जिंदगी बदलने के लिए तैयार खड़ी है.

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(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

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