Leprosy Day 2026: हर साल 30 जनवरी को विश्व कुष्ठ रोग दिवस मनाया जाता है. भारत में यह दिन और भी खास होता है, क्योंकि इसी दिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि भी होती है. गांधीजी ने कुष्ठ रोगियों के साथ रहकर उनके दर्द को समझा और समाज को यह सिखाया कि बीमारी नहीं, बल्कि सोच बदलने की जरूरत है. इस दिवस का मुख्य उद्देश्य कुष्ठ रोग से जुड़े डर, कलंक और भेदभाव को खत्म करना, लोगों को सही जानकारी देना और प्रभावित लोगों को सम्मान के साथ जीने का हक दिलाना है.
कुष्ठ रोग क्या है? | What is Leprosy?
कुष्ठ रोग एक संक्रामक बीमारी है, जो माइकोबैक्टीरियम लेप्री नामक बैक्टीरिया से होती है. हालांकि यह सुनने में डरावनी लगती है, लेकिन सच्चाई यह है कि कुष्ठ रोग पूरी तरह ठीक होने वाली बीमारी है. सरकार द्वारा दी जाने वाली मल्टी ड्रग थेरेपी (MDT) दवाएं मुफ्त मिलती हैं और कुछ महीनों के इलाज से मरीज पूरी तरह हेल्दी हो सकता है. अगर बीमारी की पहचान शुरुआती चरण में हो जाए, तो हाथ-पैर में सुन्नता या विकृति जैसी स्थायी समस्याएं भी नहीं होतीं और व्यक्ति सामान्य जीवन जी सकता है.
समस्या इलाज नहीं, बल्कि समाज में फैला कलंक
आज कुष्ठ रोग की सबसे बड़ी समस्या इलाज नहीं, बल्कि समाज में फैला कलंक है. कई लोग अब भी मानते हैं कि यह बीमारी बहुत तेजी से फैलती है, इसका कोई इलाज नहीं है या यह किसी पाप का परिणाम है. ये सभी बातें पूरी तरह गलत हैं. इन्हीं गलत धारणाओं की वजह से मरीजों को भेदभाव झेलना पड़ता है. कई बार उन्हें घर से निकाल दिया जाता है, पड़ोसी उनसे दूरी बना लेते हैं, नौकरी चली जाती है और बच्चे स्कूल जाना छोड़ देते हैं. धीरे-धीरे पूरा परिवार समाज से अलग-थलग पड़ जाता है.
क्या कहता है डब्ल्यूएचओ?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, कुष्ठ रोग से जुड़ा डर इतना गहरा है कि बहुत से लोग लक्षण दिखने के बावजूद डॉक्टर के पास नहीं जाते. उन्हें डर होता है कि अगर बीमारी का पता चल गया, तो समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा. इस डर के कारण बीमारी बढ़ती जाती है, जटिलताएं पैदा होती हैं और संक्रमण दूसरों तक भी पहुंच सकता है. इसलिए विशेषज्ञ साफ कहते हैं, कुष्ठ रोग का इलाज आसान है, असली लड़ाई समाज के कलंक के खिलाफ है."
कैसे फैलाई जाती है जागरूकता?
30 जनवरी को देशभर में इस बीमारी को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए कई कार्यक्रम होते हैं. गांवों में रैलियां, स्कूलों में सेमिनार, स्वास्थ्य शिविर और कुष्ठ रोगियों के साथ संवाद सत्र आयोजित किए जाते हैं. इन प्रयासों का मकसद यही होता है कि लोग समय पर जांच कराएं, इलाज से न डरें और मरीजों को इंसान की तरह सम्मान दें.
53 प्रतिशत मामले सिर्फ भारत में:
विशेषज्ञों के अनुसार, दुनियाभर में कुष्ठ रोग के लगभग 53 प्रतिशत मामले भारत में पाए जाते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन का लक्ष्य है कि साल 2030 तक लोकल लेवल पर कुष्ठ रोग को खत्म किया जाए, जबकि भारत सरकार ने 2027 तक कुष्ठ-फ्री भारत का लक्ष्य रखा है. यह लक्ष्य तभी पूरा हो सकता है, जब समाज मिलकर कलंक को तोड़े और हर मरीज को इलाज के साथ-साथ सम्मान भी दे.
(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)














