स्ट्रेस में सिगरेट पीने से सेक्सुअल हेल्थ पर क्या असर पड़ता है? डॉक्टर ने बताए निकोटिन के नुकसान

Smoking Side Effects: आज के समय में स्ट्रेस एक बड़ी समस्या में से एक है. लेकिन बहुत से युवा स्ट्रेस को कम करने के लिए स्मोकिंग करना पसंद करते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इससे स्ट्रेस कम होने की जगह बढ़ सकता है. इस आर्टिकल में जानें डॉक्टर की सलाह.

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Smoking Side Effects: सिगरेट पीने के नुकसान.

स्मोकिंग को अक्सर लोग सिर्फ फेफड़ों या कैंसर के खतरे से जोड़कर देखते हैं, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि निकोटिन की लत मानसिक और यौन स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डाल सकती है. तनाव, चिंता और स्मोकिंग के बीच बनने वाला एक ‘Mental-Sexual Cycle' कई लोगों के लिए गंभीर समस्या बनता जा रहा है, खासकर युवाओं और कामकाजी पुरुषों में. विशेषज्ञों के अनुसार, कई लोग तनाव या मानसिक दबाव से राहत पाने के लिए स्मोकिंग शुरू करते हैं. शुरुआत में सिगरेट या निकोटिन से कुछ समय के लिए राहत महसूस हो सकती है, लेकिन लंबे समय में यही आदत तनाव और यौन समस्याओं को और बढ़ा सकती है. 

डॉ. विनीत मल्होत्रा, सीनियर कंसल्टेंट यूरोलॉजी एवं एंड्रोलॉजी, वीएनए हॉस्पिटल कहते हैं, निकोटिन एक addictive substance है जो दिमाग के reward system को प्रभावित करता है. स्मोकिंग करने पर कुछ समय के लिए डोपामाइन रिलीज होता है, जिससे व्यक्ति को आराम या प्लेजर महसूस होता है. लेकिन यह असर अस्थायी होता है और धीरे-धीरे शरीर निकोटिन पर निर्भर होने लगता है.

स्ट्रेस और स्मोकिंग का बनता चक्र- 

डॉक्टर के अनुसार, स्ट्रेस और स्मोकिंग का रिश्ता अक्सर एक vicious cycle की तरह काम करता है. जब व्यक्ति स्ट्रेस महसूस करता है, वह स्मोकिंग करता है. निकोटिन का असर खत्म होने पर withdrawal symptoms शुरू होते हैं, जिससे बेचैनी, चिड़चिड़ापन और तनाव फिर बढ़ सकता है. इसके बाद व्यक्ति दोबारा सिगरेट की ओर लौटता है.

डॉ. मल्होत्रा बताते हैं, कई स्मोकर्स को लगता है कि सिगरेट उनका स्ट्रेस कम कर रही है, जबकि वास्तविकता यह है कि निकोटिन खुद तनाव और एंजाइटी को बनाए रखने का काम कर सकती है. व्यक्ति धीरे-धीरे इमोशनल रेगुलेशन के लिए स्मोकिंग पर निर्भर हो जाता है. मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक स्मोकिंग करने वाले लोगों में एंजाइटी और डिप्रेशन के लक्षण अधिक देखे जा सकते हैं. हालांकि हर स्मोर्स में ऐसा हो, यह जरूरी नहीं है, लेकिन निकोटिन और मूड चेंज के बीच संबंध को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. 

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सेक्सुअल हेल्थ पर क्या असर पड़ता है? 

स्मोकिंग का असर सिर्फ दिमाग तक सीमित नहीं रहता. निकोटिन और तंबाकू में मौजूद हानिकारक केमिकल ब्लड वेसेल्स को नुकसान पहुंचा सकते हैं, जिससे शरीर में ब्लड सर्कुलेशन प्रभावित होता है. यही कारण है कि स्मोकिंग को erectile dysfunction और सेक्सुअल परफॉर्मन्स से जुड़ी समस्याओं के साथ भी जोड़ा जाता है. 

डॉ. विनीत मल्होत्रा कहते हैं, सेक्सुअल फंक्शन सिर्फ हार्मोंस पर निर्भर नहीं करता, बल्कि मानसिक स्थिति और स्वस्थ ब्लड फ्लो भी उतने ही जरूरी हैं. स्मोकिंग इन दोनों को प्रभावित कर सकती है. लगातार स्ट्रेस और निकोटिन एडिक्शन के साथ सेक्सुअल प्रॉब्लम्स का खतरा बढ़ सकता है. विशेषज्ञों के मुताबिक, तनाव और सेक्सुअल समस्या कई बार एक-दूसरे को और बढ़ा देते हैं. यदि किसी व्यक्ति को परफॉर्मन्स एंजाइटी होती है, तो वह तनाव कम करने के लिए स्मोकिंग का सहारा ले सकता है.

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दूसरी ओर स्मोकिंग से सर्कुलेशन और मानसिक स्थिति प्रभावित होने पर समस्या और गंभीर हो सकती है. युवा आबादी में बढ़ती चिंता आजकल युवाओं में वेपिंग और स्मोकिंग को स्ट्रेस मैनेजमेंट या सोशल हैबिट के रूप में देखा जा रहा है. हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि निकोटिन किसी भी रूप में addiction पैदा कर सकता है और लंबे समय में मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों को प्रभावित कर सकता है. डॉ. मल्होत्रा कहते हैं, लोगों को यह समझना जरूरी है कि स्मोकिंग तनाव का समाधान नहीं है. यदि कोई व्यक्ति बार-बार स्ट्रेस या इमोशनल समस्या के दौरान स्मोकिंग कर रहा है, तो यह dependence का संकेत हो सकता है. 

मदद कैसे मिल सकती है?

विशेषज्ञों का कहना है कि स्मोकिंग छोड़ना आसान नहीं होता, क्योंकि इसमें physical और psychological दोनों तरह की dependence शामिल होती है. लेकिन काउंसलिंग, थेरेपी, परिवार का सहयोग और डॉक्टर की सलाह इस प्रक्रिया को आसान बना सकती है. 

डॉ. विनीत मल्होत्रा सलाह देते हैं, “अगर स्मोकिंग मानसिक तनाव या सेक्युअल हेल्थ को प्रभावित कर रही है, तो शर्म या झिझक की वजह से मदद लेने में देरी नहीं करनी चाहिए. सही गाइडेंस और स्पोर्ट के साथ निकोटिन एडिक्शन से बाहर निकलना संभव है. विशेषज्ञों का मानना है कि तनाव, स्मोकिंग और सेक्युअल हेल्थ के बीच मौजूद इस कनेक्शन को समझना जरूरी है, ताकि लोग अस्थायी राहत के बजाय स्वस्थ और टिकाऊ समाधान चुन सकें.

(डॉ. विनीत मल्होत्रा, सीनियर कंसल्टेंट यूरोलॉजी एवं एंड्रोलॉजी, वीएनए हॉस्पिटल)

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