Amoeba in Water: जलवायु में हो रहे लगातार बदलाव का असर सिर्फ मौसम, खेती या तापमान तक सीमित नहीं है. वैज्ञानिकों की एक नई चेतावनी के अनुसार, मिट्टी और पानी में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीव फ्री-लिविंग अमीबा अब ग्लोबल हेल्थ के लिए एक नया खतरा बनते जा रहे हैं. ये इतने छोटे होते हैं कि आंखों से दिखाई नहीं देते, लेकिन इनके असर बेहद गंभीर हो सकते हैं. रिसर्चर्स का कहना है कि बढ़ता तापमान, बदलता मौसम और पुराने होते वाटर सप्लाई सिस्टम इन अमीबाओं के पनपने के लिए अनुकूल माहौल बना रहे हैं. आमतौर पर ये अमीबा नुकसानदेह नहीं होते, लेकिन कुछ प्रजातियां इंसानों के लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं. भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि केरल जैसे राज्यों में इससे जुड़ी घातक बीमारियों के मामले सामने आ चुके हैं.
फ्री-लिविंग अमीबा क्या होते हैं और क्यों हैं खतरनाक?
फ्री-लिविंग अमीबा (FLAs) एक कोशिका वाले जीव होते हैं, जो मिट्टी, झीलों, नदियों, तालाबों और गर्म पानी के स्रोतों में पाए जाते हैं. इन्हें जीवित रहने के लिए किसी इंसान या जानवर के शरीर की जरूरत नहीं होती. लेकिन, खास परिस्थितियों में यही अमीबा इंसानों में संक्रमण फैला सकते हैं.
इनमें सबसे बड़ा नाम है नेगलेरिया फाउलेरी (Naegleria fowleri), जिसे आम भाषा में दिमाग खाने वाला अमीबा कहा जाता है. यह अमीबा प्राइमरी अमीबिक मेनिन्जोएन्सेफलाइटिस (PAM) नाम की बीमारी का कारण बनता है, जो बेहद दुर्लभ लेकिन लगभग हमेशा जानलेवा होती है.
यह संक्रमण तब होता है जब गर्म और दूषित पानी नाक के रास्ते शरीर में चला जाता है, जैसे तैराकी या नहाने के दौरान. वहां से यह अमीबा नसों के जरिए सीधे दिमाग तक पहुंच जाता है और ब्रेन टिश्यू को नुकसान पहुंचाता है.
जलवायु में बदलाव और पानी की व्यवस्था से बढ़ता खतरा
वैज्ञानिकों के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग और बढ़ता तापमान इन अमीबाओं के फैलाव की बड़ी वजह है. गर्म पानी और लंबा गर्मी का मौसम इनके लिए आदर्श स्थिति बनाता है. पहले जहां ठंडे इलाकों में ये नहीं पनप पाते थे, अब वहां भी इनकी मौजूदगी बढ़ रही है.
एक और बड़ी समस्या है कि ये अमीबा क्लोरीन जैसे सामान्य डिसइंफेक्टेड से भी बच निकलते हैं. यानी पानी को साफ करने की मौजूदा तकनीकें भी इन्हें पूरी तरह खत्म नहीं कर पा रही हैं. पुराने पाइप, खराब वाटर सप्लाई सिस्टम और कमजोर निगरानी इस खतरे को और बढ़ा देते हैं.
ट्रोजन हॉर्स जैसा खतरनाक बिहेवियर
फ्री-लिविंग अमीबा सिर्फ खुद ही खतरनाक नहीं हैं, बल्कि ये अन्य खतरनाक बैक्टीरिया और वायरस को अपने अंदर छिपाकर भी रख सकते हैं. वैज्ञानिक इसे ट्रोजन हॉर्स इफेक्ट कहते हैं.
उदाहरण के लिए लीजियोनेला बैक्टीरिया, जो लीजियोनेयर्स डिजीज का कारण बनता है, अमीबा के अंदर सुरक्षित रह सकता है. इसी तरह कुछ वायरस भी अमीबा के भीतर छिपकर पानी की सफाई प्रक्रिया से बच जाते हैं और बाद में इंसानों को संक्रमित कर सकते हैं.
पब्लिक हेल्थ के लिए क्या करना जरूरी है?
विशेषज्ञों का कहना है कि अब समय आ गया है कि पानी का रेगुलर और एडवांस टेस्ट किया जाए. ऐसे टेस्ट विकसित हों जो अमीबा को जल्दी पहचान सकें. एक हेल्थ अप्रोच अपनाया जाए, जिसमें पर्यावरण, वाटर मैनेजमेंट और हेल्थ डिपार्टमेंट मिलकर काम करें.
आज की वाटर क्वालिटी टेस्ट में अक्सर इन सूक्ष्म जीवों को नजरअंदाज कर दिया जाता है, जिससे खतरा तब सामने आता है जब नुकसान हो चुका होता है.
फ्री-लिविंग अमीबा यह दिखाते हैं कि जलवायु में बदलाव, पानी की सुरक्षा और स्वास्थ्य आपस में कितने गहराई से जुड़े हैं. ये जीव खराब से खराब कंडीशन में भी जीवित रह सकते हैं, पानी की सफाई प्रक्रिया से बच सकते हैं और दूसरे खतरनाक रोगाणुओं को भी संरक्षण दे सकते हैं.
अगर समय रहते निगरानी, तकनीक और नीतियों में सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले सालों में ये अमीबा एक अनदेखा लेकिन बड़ा वैश्विक स्वास्थ्य संकट बन सकते हैं. इसलिए बचाव, जागरूकता और वैज्ञानिक तैयारी ही इस खतरे से निपटने का सबसे मजबूत रास्ता है.
(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)














