AIIMS दिल्ली में जल्द शुरू हो सकती है फेस ट्रांसप्लांट सर्जरी, कई मरीजों को मिलेगी नई सूरत, नई जिंदगी

AIIMS के प्लास्टिक, रिकंस्ट्रक्टिव और बर्न्स सर्जरी विभाग ने 11 से 15 फरवरी 2026 तक एक विशेष कैडेवरिक वर्कशॉप और अकादमिक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया है.

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AIIMS दिल्ली की यह पहल इंडियन मेडिकल जगत में एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकती है.

भारत के बड़े मेडिकल इंस्टिट्यूशन्स में से एक ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस दिल्ली (AIIMS दिल्ली) अब एक और ऐतिहासिक पहल की ओर बढ़ रहा है. संस्थान ने फेस ट्रांसप्लांट यानी चेहरे के ट्रांसप्लांट जैसी अत्याधुनिक और जटिल सर्जरी शुरू करने की तैयारी कर ली है. यह कदम उन मरीजों के लिए उम्मीद की नई किरण बन सकता है, जिनका चेहरा एसिड अटैक, गोली लगने, गंभीर जलन या दुर्घटनाओं के कारण बुरी तरह प्रभावित हो चुका है.

AIIMS के प्लास्टिक, रिकंस्ट्रक्टिव और बर्न्स सर्जरी विभाग ने 11 से 15 फरवरी 2026 तक एक विशेष कैडेवरिक वर्कशॉप और अकादमिक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया है. इस प्रशिक्षण का उद्देश्य डॉक्टरों को फेस ट्रांसप्लांट जैसी जटिल प्रक्रिया के लिए तकनीकी और व्यावहारिक रूप से तैयार करना है.

इंटरनेशनल एक्सपर्ट गाइडेंस:

इस एडवांस ट्रेनिंग प्रोग्राम का नेतृत्व करने के लिए AIIMS ने अमेरिका के ब्रिंघम एंड वूमन हॉस्पिटल से प्लास्टिक सर्जरी के एसोसिएट चीफ डॉ. इंद्रनील सिन्हा को आमंत्रित किया. यह अस्पताल हार्वर्ड मेडिकल स्कूल से संबद्ध है.

डॉ. सिन्हा कंपोजिट टिशू एलोट्रांसप्लांटेशन और फेस ट्रांसप्लांट सर्जरी के क्षेत्र में इंटरनेशनल लेवल पर मान्यता प्राप्त विशेषज्ञ हैं. उनका अनुभव भारतीय डॉक्टरों के लिए महत्वपूर्ण सीख और मार्गदर्शन प्रदान करेगा.

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फेस ट्रांसप्लांट क्यों है जरूरी?

AIIMS के प्लास्टिक सर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ. मनीष सिंघल के अनुसार, कई मरीज 10-12 सर्जरी के बाद भी सामान्य जीवन नहीं जी पाते. उनके चेहरे की संरचना इतनी क्षतिग्रस्त होती है कि पारंपरिक सर्जरी से पूरी बहाली संभव नहीं हो पाती.

फेस ट्रांसप्लांट ऐसे मामलों में एक विकल्प हो सकता है, जहां एसिड अटैक से गंभीर विकृति हो, गोली या विस्फोट से चेहरा क्षतिग्रस्त हो, बड़े हादसों में चेहरे की हड्डियां और त्वचा बुरी तरह प्रभावित हों.

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हर मरीज के लिए नहीं है यह सर्जरी:

एक्सपर्ट्स का कहना है कि फेस ट्रांसप्लांट हर किसी के लिए उपयुक्त नहीं होता. कुछ बातों का ध्यान रखा जाना जरूरी है:

  • मरीज मानसिक रूप से स्थिर और प्रेरित हो.
  • कोई एक्टिव इंफेक्शन या कैंसर न हो.
  • लंबे समय तक दवाएं लेने की क्षमता और अनुशासन हो.

सर्जरी के बाद मरीज को जीवनभर इम्यूनोसप्रेसिव दवाएं लेनी पड़ती हैं, ताकि शरीर नया चेहरा स्वीकार कर सके.

प्रयोग से जरूरत तक का सफर

डॉ. सिंघल का कहना है कि फेस ट्रांसप्लांट अब सिर्फ प्रयोगात्मक प्रक्रिया नहीं रही, बल्कि समय की जरूरत बन चुकी है. इससे मरीजों को न केवल सौंदर्य बल्कि कार्यात्मक पुनर्वास भी मिलता है जैसे बोलना, खाना और भावनाएं व्यक्त करना.

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AIIMS दिल्ली की यह पहल इंडियन मेडिकल जगत में एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकती है. अगर यह सुविधा सफलतापूर्वक शुरू होती है, तो देश के उन मरीजों को विदेश जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, जिनके पास अब तक सीमित विकल्प थे.

फेस ट्रांसप्लांट केवल सर्जरी नहीं, बल्कि किसी व्यक्ति को उसकी पहचान और आत्मविश्वास लौटाने की दिशा में एक संवेदनशील और मानवीय कदम है.

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(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

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