Anicent Shiva Temple of Uttarakhand: देवभूमि उत्तराखंड में भगवान शिव के कई ऐसे प्रसिद्ध मंदिर हैं, जहां पूरे साल शिव भक्तों की भारी भीड़ दर्शन और पूजन के लिए पहुंचती है. भगवान शिव की आस्था से जुड़े इन पावन धाम में जागेश्वर को क्यों उत्तराखंड का पांचवां धाम माना जाता है? भगवान भोलेनाथ के भक्त आखिर क्यों उन्हें बाघेश्वर के रूप में पूजते हैं? मुक्तेश्वर पर की जाने वाली शिव साधना का क्या धार्मिक महत्व है? औघड़दानी शिव से जुड़े इन तीनों शिवालयों का आइए पौराणिक रहस्य और पूजा का महत्व विस्तार से जानते हैं.
महादेव का वो पावन धाम जहां से शुरु हुई शिवलिंग पूजने की परंपरा
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उत्तराखंड के अल्मोड़ा में स्थित भगवान शिव का एक ऐसा पावनधाम है, जिसके बारे में मान्यता है कि इसी स्थान पर पहली बार शिवलिंग की पूजा प्रारंभ हुई थी. महादेव के इस मंदिर का महत्व कुछ इस तरह से समझा जा सकता है कि लोग इसे उत्तराखंड का पांचवा धाम तक कहते हैं. जागेश्वर को योगेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से भी जाना जाता है. मान्यता है कि यह वही पावन स्थान है जहां देव के देव महादेव जागृत हुए थे. इसी कारण से इस स्थान का नाम जागेश्वर पड़ा.
जागेश्वर का यह मंदिर केदारनाथ मंदिर की तरह नजर आता है. इस पावन धाम में शिव समेत कई देवी देवताओं के मंदिर हैं. जागेश्वर धाम में कई मंदिर स्थित हैं, लेकिन जब आप मुख्य मंदिर पर पहुंचते हैं तो आपको वहां पर दो द्वारपाल की प्रतिमा के दर्शन होते हैं, जिनमें से एक नंदी और एक भृंगी हैं. मान्यता है कि इस क्षेत्र में कभी तांत्रिक पूजा का ज्यादा प्रभाव था, लेकिन जब आदि शंकराचार्य यहां पहुंचे तो उन्होंने एक बार फिर इस क्षेत्र में शिव की पूजा को पुन: स्थापित किया.
बागेश्वर धाम जहां शिव ने बाघ के रूप में दिये थे दर्शन
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उत्तराखंड में जागेश्वर की तरह बागेश्वर का भी बहुत ज्यादा धार्मिक महत्व माना गया है. हिंदू मान्यता के अनुसार यह वही दिव्य स्थान है जहां पर एक समय भगवान शिव व्याघ्र या फिर कहें बाघ के रूप में माता पार्वती गाय के रूप में निवास किया करती थीं. मान्यता यह भी है कि इसी पवित्र भूमि पर कभी मार्कण्डेय ऋषि ने देवों के देव महादेव की कृपा पाने के लिए कठिन तप किया था, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें बाघ के रूप में दर्शन दिए थे.
बागेश्वर जिले में स्थित बागनाथ मंदिर में स्थित दक्षिणमुखी शिवलिंग को 'व्याघ्रेश्वर' यानि बाघ के रूप में शिव को पूजने की परंपरा चली आ रही है. सरयू व गोमती नदी के संगम पर स्थित इस मंदिर को राजा लक्ष्मी चंद ने लगभग 1450 ई.पू. में बनाया था. महादेव के इस पावन धाम पर हर साल मकर संक्रांति पर उत्तरायणी का बड़ा मेला लगता है.
महाभारत काल में पांडवों ने की थी मुक्तेश्वर शिवलिंग की स्थापना
भगवान शिव को समर्पित मुक्तेश्वर मंदिर उत्तराखंड के नैनीताल जिले में मुक्तेश्वर नामक स्थान पर स्थित है. लोकमान्यता है कि कि पौराणिक काल में भगवान शिव ने एक राक्षस का वध करके उसे मुक्ति प्रदान की थी. तभी से इस पावन स्थान को मुक्तेश्वर के नाम से जाना जाता है. मंदिर में विभिन्न देवी-देवताओं के साथ सफेद संगमरमर के शिवलिंग के दर्शन होते हैं.
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सैकड़ों साल पुराने इस मंदिर के शिवलिंग को लेकर मान्यता है कि इसे पांडवों ने महाभारत काल में प्रतिष्ठित किया था. नैनीताल शहर से तकरीबन 50 किमी दूरी पर स्थित महादेव के इस महाधाम पर भक्तों को तकरीबन 100 सीढ़ियां चढ़कर जाना होता है. यहां से आप हिमालय की बर्फीली पर्वत श्रृंखला नंदाकोट, त्रिशूल और नंदा देवी को आसानी से देख सकते हैं.














