Som Pradosh Vrat 2026: आज शाम प्रदोष काल में करें ये उपाय, भगवान शिव होंगे प्रसन्न, पूरी होंगी सभी मनोकामनाएं

Pradosh Vrat: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रदोष काल भगवान शिव की उपासना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है. इस समय श्रद्धा और भक्ति के साथ शिव चालीसा का पाठ करने से भोलेनाथ शीघ्र प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं.

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सोम प्रदोष व्रत 2026

Som Pradosh Vrat: आज यानी 30 मार्च को शिवभक्तों द्वारा सोम प्रदोष व्रत श्रद्धा और भक्ति के साथ रखा गया है. प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है और इसे विशेष रूप से प्रदोष काल में करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है. मान्यता है कि सोम प्रदोष व्रत के दिन विधि‑विधान से भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने से सभी कष्ट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूरी होती हैं. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, आज शाम प्रदोष काल में कुछ विशेष उपाय करने से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों को सुख‑समृद्धि तथा सफलता का आशीर्वाद प्रदान करते हैं.

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प्रदोष काल में करें यह उपाय

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रदोष काल भगवान शिव की उपासना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है. इस समय श्रद्धा और भक्ति के साथ शिव चालीसा का पाठ करने से भोलेनाथ शीघ्र प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं. मान्यता है कि प्रदोष काल में की गई पूजा का फल कई गुना बढ़ जाता है और जीवन में सुख‑समृद्धि, शांति और सौभाग्य की प्राप्ति होती है. पंचांग के अनुसार, आज प्रदोष काल की शुरुआत शाम 6 बजकर 38 मिनट से हो रही है, जबकि इसका समापन रात 8 बजकर 57 मिनट पर होगा. इस शुभ अवधि में विधि‑विधान से भगवान शिव की पूजा, जलाभिषेक, शिव चालीसा का पाठ करना विशेष फलदायी माना गया है.

यहां पढ़ें शिव चालीसा का पाठ

॥ दोहा ॥

जय गणेश गिरिजा सुवन,
मंगल मूल सुजान ।
कहत अयोध्यादास तुम,
देहु अभय वरदान ॥

॥ चौपाई ॥

जय गिरिजा पति दीन दयाला ।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥

भाल चन्द्रमा सोहत नीके ।
कानन कुण्डल नागफनी के ॥

अंग गौर शिर गंग बहाये ।
मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे ।
छवि को देखि नाग मन मोहे ॥

मैना मातु की हवे दुलारी ।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी ।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे ।
सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥

कार्तिक श्याम और गणराऊ ।
या छवि को कहि जात न काऊ ॥

देवन जबहीं जाय पुकारा ।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥

किया उपद्रव तारक भारी ।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥

तुरत षडानन आप पठायउ ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥

आप जलंधर असुर संहारा ।
सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई ।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥

किया तपहिं भागीरथ भारी ।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं ।
सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥

वेद नाम महिमा तव गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला ।
जरत सुरासुर भए विहाला ॥

कीन्ही दया तहं करी सहाई ।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा ।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥

सहस कमल में हो रहे धारी ।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥

एक कमल प्रभु राखेउ जोई ।
कमल नयन पूजन चहं सोई ॥

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर ।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥

जय जय जय अनन्त अविनाशी ।
करत कृपा सब के घटवासी ॥

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै ।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो ।
येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो ।
संकट से मोहि आन उबारो ॥

मात-पिता भ्राता सब होई ।
संकट में पूछत नहिं कोई ॥

स्वामी एक है आस तुम्हारी ।
आय हरहु मम संकट भारी ॥

धन निर्धन को देत सदा हीं ।
जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी ।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥

शंकर हो संकट के नाशन ।
मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं ।
शारद नारद शीश नवावैं ॥

नमो नमो जय नमः शिवाय ।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥

जो यह पाठ करे मन लाई ।
ता पर होत है शम्भु सहाई ॥

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी ।
पाठ करे सो पावन हारी ॥

पुत्र हीन कर इच्छा जोई ।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥

पण्डित त्रयोदशी को लावे ।
ध्यान पूर्वक होम करावे ॥

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा ।
ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे ।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥

जन्म जन्म के पाप नसावे ।
अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी ।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥

॥ दोहा ॥

नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा ।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश ॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान ।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण ॥

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