Ram Navami 2026: झारखंड की राजधानी रांची की रामनवमी आज सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा, संगठन और सांस्कृतिक एकता का जीवंत उदाहरण बन चुकी है. राजधानी की सड़कों पर जब महावीरी पताकाएं लहराती हैं और हजारों अखाड़ों की टोलियां उत्साह के साथ आगे बढ़ती हैं, तो यह दृश्य केवल वर्तमान का नहीं, बल्कि लगभग एक सदी पुराने इतिहास की गूंज भी साथ लेकर चलता है.
रांची में इस परंपरा की शुरुआत सन् 1929 में हुई, जब पहली बार रामनवमी की शोभायात्रा निकाली गई थी. वर्ष 1925 में हजारीबाग में गुरु सहाय ठाकुर द्वारा रामनवमी जुलूस की शुरुआत की गई थी. वर्ष 1927 में रांची के श्रीकृष्ण लाल साहू अपने ससुराल हजारीबाग गए और वहां इस जुलूस को देखा. यह आयोजन उन्हें इतना प्रभावित कर गया कि रांची लौटकर उन्होंने अपने साथियों को इसके बारे में बताया. इसके बाद 1928 में रांची के कुछ लोग स्वयं हजारीबाग जाकर इस आयोजन को देखने पहुंचे. यही वह क्षण था, जिसने रांची में एक नई परंपरा की नींव रखी. आखिरकार, 17 अप्रैल 1929 को रांची में पहली बार रामनवमी की शोभायात्रा निकाली गई.
1929 की पहली शोभायात्रा आज की भव्यता की तुलना में काफी साधारण थी. इसमें केवल दो महावीरी झंडे थे और गिने-चुने लोग ही शामिल हुए थे. इस आयोजन को सफल बनाने में श्रीकृष्ण लाल साहू के साथ उनके कुछ मित्र भी शामिल थे. हालांकि स्वरूप छोटा था, लेकिन आस्था और उत्साह में कोई कमी नहीं थी. यही वह बीज था, जिसने आगे चलकर एक विशाल परंपरा का रूप ले लिया.
1930 में शोभायात्रा का विस्तार हुआ और महावीरी झंडों की संख्या बढ़ने लगी. उस वर्ष रातू रोड स्थित ग्वाला टोली से नन्हू भगत के नेतृत्व में शोभायात्रा निकाली गई. धीरे-धीरे इसमें अखाड़ों की भागीदारी भी बढ़ने लगी. इस बढ़ती भागीदारी को व्यवस्थित स्वरूप देने के लिए 5 अप्रैल 1935 को अपर बाजार स्थित संतुलाल पुस्तकालय में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई. इसी बैठक में महावीर मंडल का गठन किया गया. महंत ज्ञान प्रकाश उर्फ नागा बाबा इसके प्रथम अध्यक्ष और डॉ. रामकृष्ण लाल महामंत्री बनाए गए. यहीं से रामनवमी शोभायात्रा को एक संगठित ढांचा मिला, जो आज तक कायम है.
समय के साथ रांची की रामनवमी शोभायात्रा का एक तय मार्ग और स्वरूप विकसित हुआ, जिसमें महावीर चौक से तपोवन मंदिर तक पताका पहुंचाने की परंपरा शुरू हुई. आज भी यह परंपरा उसी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है. महावीर चौक से जैसे ही शोभायात्रा आगे बढ़ती है, पूरा शहर आस्था में डूब जाता है. ड्रम, नगाड़े, पारंपरिक युद्धकला के प्रदर्शन और भगवा पताकाओं की कतारें मिलकर एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करती हैं.
महावीर चौक से शुरू होकर तपोवन मंदिर तक पताका पहुंचाना इस शोभायात्रा का चरम बिंदु होता है. मंदिर के सामने स्थित मैदान में सभी अखाड़े अपनी-अपनी पताकाएं खड़ी करते हैं. यह दृश्य अत्यंत भव्य और भावनात्मक होता है, जहां हजारों झंडे एक साथ लहराते हैं. यहां श्रद्धालु भगवान राम, सीता और हनुमान जी की पूजा-अर्चना करते हैं. इसके बाद शोभायात्रा का समापन होता है और लोग अपने-अपने घर लौट जाते हैं.














