कोल गैसीफिकेशन क्या है? कैसे कोयला बनता है ‘सिनगैस’, और क्यों इस पर दांव लगा रही सरकार

कोल गैसीफिकेशन तकनीक में कोयले को सीमित ऑक्सीजन में गर्म कर सिनगैस बनाया जाता है, जिससे गैस, केमिकल और ईंधन तैयार होते हैं. इससे आयात पर निर्भरता घटेगी और देश ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में लगातार आगे बढ़ेगा.

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नई दिल्ली:

केंद्र सरकार ने कोयला और लिग्नाइट गैसीफिकेशन को बढ़ावा देने के लिए 37,500 करोड़ रुपये की बड़ी योजना को मंजूरी दी है. केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बुधवार को इसकी जानकारी देते हुए कहा कि यह पहल स्वच्छ कोयला उपयोग, ऊर्जा सुरक्षा और आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में अहम कदम है. सरकार का लक्ष्य करीब 75 मिलियन टन कोयला और लिग्नाइट का गैसीफिकेशन करना है. इसके जरिए पूरी वैल्यू चेन में लगभग 3 लाख करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित होने की उम्मीद जताई गई है.

क्या है कोल गैसीफिकेशन?

कोल गैसीफिकेशन एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें कोयले या लिग्नाइट को सीधे जलाने के बजाय उसे रासायनिक प्रक्रिया के जरिए 'सिनगैस' (Syngas) में बदला जाता है. इस गैस में मुख्य रूप से हाइड्रोजन और कार्बन मोनोऑक्साइड होती है. इसका इस्तेमाल कई औद्योगिक क्षेत्रों में किया जा सकता है.

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कैसे काम करती है यह तकनीक?

इस प्रक्रिया में कोयले को बहुत अधिक तापमान पर सीमित ऑक्सीजन और भाप के साथ रिएक्टर में डाला जाता है. वहां कोयला पूरी तरह जलता नहीं, बल्कि गैस में बदल जाता है.

प्रक्रिया को ऐसे समझा जा सकता है:

कोयला + सीमित ऑक्सीजन + भाप = सिनगैस

यानी यहां कोयले को सीधे जलाने के बजाय उपयोगी गैस में बदला जाता है.

सिनगैस का इस्तेमाल कहां होगा?

सरकार के मुताबिक, इस गैस का इस्तेमाल कई क्षेत्रों में किया जा सकेगा, जैसे बिजली उत्पादन, उर्वरक (फर्टिलाइजर), रसायन उद्योग, सिंथेटिक ईंधन, मेथनॉल और अमोनिया उत्पादन. इससे आयातित गैस और पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है.

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सरकार क्यों दे रही जोर?

भारत के पास दुनिया के सबसे बड़े कोयला और लिग्नाइट भंडार में से एक है. सरकार अब इन संसाधनों का इस्तेमाल केवल थर्मल पावर तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि उन्हें केमिकल और ऊर्जा क्षेत्र में भी उपयोग करना चाहती है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत के पास करीब 401 अरब टन कोयला भंडार और लगभग 47 अरब टन लिग्नाइट भंडार हैं. फिलहाल देश की कुल ऊर्जा खपत में कोयले की हिस्सेदारी 55 प्रतिशत से अधिक है.

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गैस के लिए दूसरे देशों पर कम होगी निर्भरता

अश्विनी वैष्णव के मुताबिक इस प्रोजेक्ट से करीब 50000 लोगों को रोजगार मिलेगा. फिलहाल भारत को अपनी एलएनजी आवश्यकता का करीब 50 फीसदी, यूरिया का 20 फीसदी, अमोनिया का करीब 100 फीसदी जबकि मेथनॉल का करीब 90 फीसदी आयात करना पड़ता है. देश में फर्टिलाइजर के उत्पादन के लिए इन सभी चीजों की जरूरत पड़ती है. कोयला से गैस बनाने के प्रोजेक्ट से इन सभी चीजों के आयात को कम करने में मदद मिलेगी और गैस के लिए आयात पर निर्भरता काफी हद तक कम हो जाएगी.

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25 संयंत्र लगाने की योजना को मंजूरी

सरकार ने इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में 25 संयंत्र लगाने की योजना को मंजूरी दी है. योजना के तहत कोयला से गैस बनाने का संयंत्र लगाने वाली कंपनी या संस्था को आर्थिक सहायता देने का फैसला किया गया है. इसके तहत संयंत्र लगाने का कुल 20 फीसदी खर्च सरकार सहायता के रूप में देगी. लक्ष्य रखा गया है कि अगले 4-5 सालों में कोयले से गैस का उत्पादन शुरू कर दिया जाए. पूरी योजना के लिए सरकार ने 37500 करोड़ रुपए खर्च करने का निर्णय लिया है. फैसले की जानकारी देते हुए केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि योजना में 3 लाख करोड़ रुपये के निवेश की संभावना है.

क्या हैं चुनौतियां?

हालांकि कोल गैसीफिकेशन को पारंपरिक कोयला जलाने की तुलना में अप्राकृत साफ तकनीक माना जाता है, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियां भी हैं. गैसीफिकेशन प्लांट लगाने में भारी लागत आती है. प्रक्रिया में काफी पानी की जरूरत होती है. कार्बन उत्सर्जन पूरी तरह खत्म नहीं होता. तकनीक जटिल और रखरखाव महंगा होता है. इसके बावजूद सरकार इसे ऊर्जा सुरक्षा और ‘कोल टू केमिकल्स' रणनीति का बड़ा हिस्सा मान रही है.

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