Atharva Chaturvedi Story: जबलपुर की एक शांत कॉलोनी में रहने वाला एक साधारण-सा लड़का… जिसे शाम को टीवी पर तारक मेहता का उल्टा चश्मा देखना पसंद है, जो क्रिकेट में बाएं हाथ से बल्ला थामता है और जो बारहवीं के बाद इंजीनियरिंग और मेडिकल दोनों में चयन पा सकता था उसने डॉक्टर बनने का सपना चुना, उसका नाम है अर्थव चतुर्वेदी. पर सपनों की राह हमेशा सीधी नहीं होती.
दिल छू लेने वाली है अथर्व की कहानी
अर्थव ने नीट परीक्षा दो बार उत्तीर्ण की, 530 अंक लाए. आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग ईडब्ल्यूएस के तहत उसका स्थान बनता था लेकिन जब निजी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश का समय आया तो पता चला कि राज्य सरकार ने निजी संस्थानों में ईडब्ल्यूएस आरक्षण लागू करने की स्पष्ट नीति ही नहीं बनाई है. अंक थे, योग्यता थी, पर दरवाजा बंद था. जिस लड़के ने किताबों में मानव शरीर के रहस्य पढ़े थे. उसे अब संविधान के अनुच्छेद पढ़ने पड़े.
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जब वह जबलपुर हाईकोर्ट में स्वयं अपनी बात रखने पहुंचा, तो अदालत ने उसकी दलीलें सुनकर मुस्कुराते हुए कहा “तुम्हें वकील बनना चाहिए, डॉक्टर नहीं. तुम गलत क्षेत्र में जा रहे हो.” यह वाक्य ताना था या प्रशंसा, कहना कठिन है. पर अर्थव के भीतर यह शब्द चुभ गए. उसे डॉक्टर ही बनना था.
जनवरी की एक ठंडी सुबह उसने सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट खोली. विशेष अनुमति याचिका एसएलपी का प्रारूप देखा.पुराने निर्णय पढ़े, खुद मसौदा तैयार किया. रजिस्ट्री ने त्रुटियां बताईं, सुधारा. 6 जनवरी को याचिका ऑनलाइन दाखिल कर दी.दिल्ली जाने का खर्च बचाने के लिए उसने ऑनलाइन ही अपनी पैरवी की.
फरवरी की एक शांत दोपहर थी.देश की सर्वोच्च अदालत में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ उठने को थी.तभी एक युवा स्वर ने विनम्र आग्रह किया “मुझे दस मिनट और दीजिए.” वह आवाज किसी वरिष्ठ अधिवक्ता की नहीं थी, न किसी संवैधानिक विशेषज्ञ की. वह जबलपुर के बारहवीं पास एक छात्र अर्थव चतुर्वेदी की थी, जो सिर्फ डॉक्टर बनना चाहता था.
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दस मिनट में बदल गया इतिहास
दस मिनट बाद इतिहास उसकी ओर झुक गया. संविधान के अनुच्छेद 142 की विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और मध्यप्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के नीट-उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को प्रोविजनल एमबीबीएस प्रवेश दिया जाए.अर्थव के लिए यह केवल कानूनी जीत नहीं थी यह उस सपने में फिर से सांस भरने जैसा था,जो लगभग घुट चुका था. एक साधारण परिवार के लिए यह आदेश किसी वरदान से कम नहीं था.
अर्थव के स्कूल महर्षि विद्यालय की दो शिक्षिकाओं का जिक्र उसके पिता गर्व से करते हैं. भारती मैडम और मित्रा मैडम.एक समय सेक्शन बदलने की बात आई थी, पर शिक्षिका ने समझाया कि वही कक्षा उसके लिए बेहतर होगी.अंग्रेजी में जो आत्मविश्वास आया,वही आगे चलकर अदालत में उसकी ताकत बना.
बारहवीं में उसने सबसे कठिन विषय चुने गणित, जीवविज्ञान, अंग्रेजी, कंप्यूटर. जीवविज्ञान की प्रायोगिक परीक्षा के बाद वह आईआईटी की परीक्षा देकर लौटा था. जबलपुर सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में चयन भी हुआ, पर उसने डॉक्टर बनने का रास्ता नहीं छोड़ा.
पिता को इस बात की है चिंता
आज भी लड़ाई पूरी तरह खत्म नहीं हुई.अदालत ने सात दिन में कॉलेज आवंटन का आदेश दिया है, पर निजी कॉलेजों में ईडब्ल्यूएस फीस संरचना स्पष्ट नहीं है. पिता की चिंता स्वाभाविक है “फीस कैसे तय होगी?” पर शायद यह कहानी फीस या प्रवेश से बड़ी है.
यह कहानी उस लड़के की है जिसने निराशा को याचिका में बदला.जिसने किताबों के बीच संविधान पढ़ा. जिसने अदालत के सामने खड़े होकर कहा “मेरे अंक हैं, मेरा हक है.” अर्थव न अभी काला कोट पहनता है, न सफेद एप्रन. वह दोनों के बीच खड़ा है एक ऐसा युवक जिसने व्यवस्था के सामने चुप रहने से इंकार किया. जिसने संविधान को उतनी ही गंभीरता से पढ़ा जितनी जीवविज्ञान को. जिसने अदालत में भावनाओं से नहीं, तथ्यों से बात की.