DSB School : मुंबई की भागदौड़ भरी जिंदगी में साल 1960 में एक ऐसी कहानी शुरू हुई, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. कुछ जर्मन परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई को लेकर परेशान थे, क्योंकि शहर में जर्मन भाषा में शिक्षा का कोई इंतजाम नहीं था. तब उन्होंने खुद ही रास्ता निकाला और एक छोटे से घर में स्कूल शुरू कर दिया. शुरुआत सिर्फ कुछ बच्चों से हुई, लेकिन यही छोटा कदम आगे चलकर मुंबई के पहले इंटरनेशनल स्कूल की नींव बन गया. ये कहानी दिखाती है कि कैसे एक जरूरत कभी-कभी बड़ी पहचान बन जाती है.
IIT से जुड़ा रिश्ता और स्कूल की शुरुआतभारत और जर्मनी के रिश्ते पहले से मजबूत हो रहे थे. 1958 में जर्मनी ने IIT मद्रास बनाने में मदद की, जिससे दोनों देशों के बीच भरोसा बढ़ा. इसी दौरान मुंबई में रह रहे जर्मन लोगों ने सोचा कि उनके बच्चों के लिए भी कुछ किया जाए. 1960 में जर्मन स्कूल एसोसिएशन बनी और मालाबार हिल के एक घर से पढ़ाई शुरू हो गई. उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा था कि ये छोटा सा स्कूल इतना आगे जाएगा.
मुश्किलें आईं, लेकिन हार नहीं मानीसमय के साथ स्कूल बड़ा हुआ और नई जगहों पर फैलने लगा. लेकिन 1990 का दौर इस स्कूल के लिए आसान नहीं था. छात्रों की संख्या कम हो गई और पैसों की कमी भी होने लगी. हालत ये हो गई कि एक समय स्कूल में सिर्फ 21 बच्चे ही बचे थे. लेकिन यहां से कहानी ने नया मोड़ लिया. स्कूल ने इंग्लिश मीडियम शुरू किया और दूसरे देशों के बच्चों के लिए भी दरवाजे खोल दिए.
आज बना अलग पहचान वाला स्कूलआज ये स्कूल DSB इंटरनेशनल स्कूल के नाम से जाना जाता है और यहां जर्मन के साथ-साथ इंग्लैंड का करिकुलम भी पढ़ाया जाता है. अब ये सिर्फ जर्मन बच्चों का स्कूल नहीं, बल्कि कई देशों के बच्चों का मीटिंग स्पॉट बन चुका है. ये कहानी साफ बताती है कि देशों के रिश्ते सिर्फ राजनीति से नहीं, बल्कि लोगों और शिक्षा से भी बनते हैं.
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