अष्टधातु की दुर्लभ राम प्रतिमा, अदालत के मालखाने में खा रही धूल, मंदिर में विराजे जाने का इंतजार कब होगा खत्म

वर्षों की पुलिस जांच, कानूनी उलझनों और प्रशासनिक निर्णयों के बाद भी यह प्रतिमा अब तक किसी मंदिर में विराजमान नहीं हो सकी है.

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नई दिल्ली:

22 जनवरी 2024 अयोध्या में 500 वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद जब भगवान श्रीराम अपने धाम में विराजमान हुए, पूरे देश में उत्साह और श्रद्धा का वातावरण बन गया. लेकिन इसी भारत में एक ऐसी अद्वितीय बेशकीमती और ऐतिहासिक प्रतिमा है, जो वर्षों से मुक्ति और मंदिर में विराजमान होने की प्रतीक्षा कर रही है. यह दुर्लभ अष्टधातु की भगवान श्रीराम की प्रतिमा करीब 350 वर्ष पुरानी है, जिसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में करोड़ों रुपये कीमत के आकलन के साथ एक अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर माना जाता है. इस प्रतिमा का निर्माण काल इतना प्राचीन है कि इसमें भगवान के आयुध सोने से निर्मित थे और उनकी आंखों व तिलक में हीरे जड़े हुए थे, जो बाद में चोरों द्वारा निकाल लिए गए.

घटना का इतिहास 2007 की पुलिस कार्रवाई

साल 2007 में दिल्ली के सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट पुलिस के स्पेशल स्टाफ ने एक बड़ी कार्रवाई में इस प्रतिमा को बरामद किया था. मुखबिर की सूचना पर कालीबाड़ी मंदिर, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग के पास, कांस्टेबल सतबीर सिंह और उनकी टीम ने एक सेंट्रो कार को घेरकर दो व्यक्तियों अमन गुप्ता और रमाकांत शुक्ला को गिरफ्तार किया. पुलिस ने एएसआई राजबीर सिंह को नकली ग्राहक बनाकर भेजा, और जब ₹50 लाख में सौदे की बात तय हुई, तो कार्रवाई करते हुए प्रतिमा को सुरक्षित कर लिया गया. पूछताछ में पता चला कि यह प्रतिमा उन्हें संजय नामक व्यक्ति ने बेचने के लिए दी थी, जिसका बाद में पता नहीं चल सका.

मालखाने की कैद वारिस न आने पर कोर्ट के हवाले

बरामद होने के बाद प्रतिमा थाना कमला मार्किट के मालखाने में रखी गई. लेकिन 17 वर्षों तक इसका कोई वारिस या दावा करने वाला सामने नहीं आया. नतीजतन, इसे तीस हजारी कोर्ट के डिस्ट्रिक्ट नाजिर के मालखाने में भेज दिया गया, जहां यह वर्षों से धूल खा रही है.

2023 में प्रयास फिर भी अधूरी मुक्ति

साल 2023 में जब आईपीएस अधिकारी संजय कुमार सैन ने सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट के डीसीपी का पद संभाला, तो उनके संज्ञान में यह मामला आया. उन्होंने कमला मार्किट थाने के एसएचओ सुरेंद्र दलाल को प्रतिमा के बारे में सारी जानकारी जुटाने का निर्देश दिया.  जांच में पता चला कि यदि कोई धार्मिक या सांस्कृतिक संस्था इस प्रतिमा की संरक्षक बनने के लिए औपचारिक अनुरोध करे और कानूनी शर्तें पूरी करे, तो प्रतिमा उन्हें सौंपी जा सकती है. इस पर आसफ अली रोड स्थित श्री राम हनुमान वाटिका समिति ने आवेदन दिया, लेकिन तत्कालीन एसडीएम ने किसी कारणवश यह अनुरोध निरस्त कर दिया.

आज भी प्रतीक्षा में भगवान राम

वर्षों की पुलिस जांच, कानूनी उलझनों और प्रशासनिक निर्णयों के बाद भी यह प्रतिमा अब तक किसी मंदिर में विराजमान नहीं हो सकी है. यह स्थिति धर्म और संस्कृति के प्रति संवेदनशील लोगों के लिए चिंता का विषय है. इसे विराजमान करने के लिए अब धर्मालंबियों और सांस्कृतिक संगठनों से पहल की अपेक्षा है, ताकि यह दुर्लभ अष्टधातु प्रतिमा मालखाने की कैद से निकलकर भक्तों के दर्शन के लिए उपलब्ध हो सके.

क्या होगा इस मूर्ति का भविष्य ?

अब देश की नज़रों में यह सवाल है । क्या भगवान श्रीराम की 350 साल पुरानी यह प्रतिमा भी अयोध्या की तरह अपने मंदिर में विराजमान हो पाएगी? या यह धरोहर अदालत के मालखाने में इतिहास के साथ कैद रह जाएगी?

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