Justice Suryakant Comments on Registry: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की रजिस्ट्री के कामकाज के तरीके पर गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए बेहद सख्त टिप्पणी की है. एक मामले की सुनवाई के दौरान रजिस्ट्री की लापरवाही सामने आने पर CJI ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि रजिस्ट्री में बैठा हर व्यक्ति खुद को 'भारत का सुपर मुख्य न्यायाधीश' समझने लगा है. कोर्ट ने रजिस्ट्री की कार्यप्रणाली को "बेहद खराब" करार देते हुए सुधार करने के लिए कड़ी चेतावनी दी.
यह विवाद आयुषी मित्तल और अन्य की जमानत याचिका से जुड़ा है. आयुषी मित्तल, नोएडा के चर्चित 3,700 करोड़ रुपये के पोंजी घोटाले के मुख्य आरोपी अनुभव मित्तल की पत्नी हैं. अनुभव मित्तल 2017 से जेल में हैं. मार्च 2026 में इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया था और प्रवर्तन निदेशालय (ED) को एक पक्ष बनाने का निर्देश दिया था. साथ ही अदालत ने आदेश दिया था कि ED के निदेशक को नोटिस जारी कर यह पता लगाया जाए कि याचिकाकर्ता, उनके परिवार और करीबी रिश्तेदारों की संपत्तियां जब्त की गई हैं या नहीं. कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि जमानत पर विचार करने से पहले संपत्तियों का विवरण अनिवार्य है.
रजिस्ट्री की बड़ी लापरवाही पर CJI का गुस्सा
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद रजिस्ट्री ने ED निदेशक को नोटिस जारी नहीं किया. चौंकाने वाली बात यह रही कि रजिस्ट्री की ओर से यह तर्क दिया गया कि ऐसा कोई आदेश पारित ही नहीं हुआ था. इस पर नाराजगी जाहिर करते हुए CJI ने कहा कि हमारे आदेश के बावजूद रजिस्ट्री ने यह कहते हुए नोटिस नहीं भेजा कि आदेश हुआ ही नहीं. यह बहुत ही खराब रजिस्ट्री है. इन्हें लगता है कि यही भारत के 'सुपर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया' हैं.
फैक्ट फाइंडिंग इंक्वायरी के आदेश
रजिस्ट्री की इस मनमानी को गंभीरता से लेते हुए CJI ने रजिस्ट्रार (न्यायिक) को एक 'फैक्ट फाइंडिंग इंक्वायरी कमेटी' गठित करने का निर्देश दिया है. यह कमेटी इस बात की गहन जांच करेगी कि आखिर मार्च 2026 के अदालती आदेश की अनदेखी क्यों की गई और ED निदेशक को नोटिस भेजने में कोताही किस स्तर पर बरती गई.
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फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रशासनिक विफलता को दरकिनार करते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ED) को तत्काल नोटिस भेजने का पुनः आदेश दिया है. कोर्ट ने साफ कर दिया है कि पोंजी स्कीम जैसे गंभीर वित्तीय अपराधों में जब तक संपत्तियों का पूरा ब्यौरा सामने नहीं आता, तब तक जमानत की मांग पर विचार करना संभव नहीं होगा.
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