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This Article is From Oct 30, 2018

कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक एक भाषा चाहते थे स्वामी दयानंद सरस्वती

आर्य समाज के संस्थापक और भारत के महान चिंतक स्वामी दयानंद सरस्वती की आज पुण्यतिथि है. स्वामी दयानंद का नाम मूलशंकर था. उनका जन्म 12 फरवरी 1824 को गुजरात के टंकारा में हुआ था.

कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक एक भाषा चाहते थे स्वामी दयानंद सरस्वती
Swami Dayanand Saraswati
  • स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी 1824 में हुआ था.
  • स्वामी दयानंद सरस्वती आर्य समाज के संस्थापक थे.
  • स्वामी दयानंद सरस्वती ने 'स्वराज' का नारा दिया था.
नई दिल्ली: आर्य समाज के संस्थापक और भारत के महान चिंतक स्वामी दयानंद सरस्वती (Swami Dayanand Saraswati) की आज पुण्यतिथि है. स्वामी दयानंद का नाम मूलशंकर था. उनका जन्म 12 फरवरी 1824 को गुजरात के टंकारा में हुआ था. आर्य समाज की स्थापना करने वाले स्वामी दयानंद सरस्वती ने बाल विवाह, सती प्रथा जैसी कुरीतियों को दूर करने में अपना खास योगदान दिया है. उन्होंने वेदों को सर्वोच्च माना और वेदों का प्रमाण देते हुए हिंदू समाज में फैली कुरीतियों का विरोध किया. स्वामी दयानंद सरस्वती निर्भय होकर समाज में व्यापत बुराईयों से लड़ते रहे और 'संन्यासी योद्धा' कहलाए.

स्वाजी (Swami Dayanand Saraswati) ने सिर्फ हिंदू ही नहीं बल्कि ईसाई और इस्लाम धर्म में फैली बुराइयों का कड़ा खण्डन किया. उन्होंने अपने महाग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में सभी मतों में व्याप्त बुराइयों का खण्डन किया है. उन्होंने वेदों का प्रचार करने और उनकी महत्ता लोगों को समझाने के लिए पूरे देश का दौरा किया. उनके आगे प्राचीन परंपरा के कई पंडितों और विद्वानों ने घुटने टेक दिए थे. वे हिंदी भाषा के प्रचारक थे. उनकी इच्छा थी कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक पूरे देश की एक भाषा हो.

उन्होंने 10 अप्रैल सन् 1875 ई. को मुम्बई के गिरगांव में आर्य समाज की  स्थापना की थी. आर्य समाज का आदर्श वाक्य है: कृण्वन्तो विश्वमार्यम्, जिसका अर्थ है - विश्व को आर्य बनाते चलो. आर्य समाज की स्थापना का मुख्य उद्देश्य शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति है. आर्य समाज ने कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पैदा किए थे. आजादी से पहले आर्य समाज को क्रांतिकारियों को अड्डा कहा जाता था.

स्वामी दयानंद सरस्वती ने दिया था  'स्वराज'  का नारा
स्वामी दयानंद सरस्वती ने  'स्वराज'  का नारा दिया था, जिसे बाद में लोकमान्य तिलक ने आगे बढ़ाया. स्वामी जी अपने उपदेशों के जरिए युवाओं में देश प्रेम और देश की स्वतंत्रता के लिए मर मिटने की भावना पैदा करते थे.

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