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This Article is From Mar 28, 2025

Mahadevi Verma ki Kavitayen: जो तुम आ जाते एक बार...पढ़िए महदेवी वर्मा की दिल छू लेने वाली कविताएं

Mahadevi Verma Poem: कवियत्री महदेवी वर्मा को किसी परिचय का मोहताज नहीं. आज उनकी कविताएं चारों तरफ शोर मचाती हैं. पढ़िए उनकी कुछ दिल छू लेने वाली कविताएं.

Mahadevi Verma ki Kavitayen: जो तुम आ जाते एक बार...पढ़िए महदेवी वर्मा की दिल छू लेने वाली कविताएं
नई दिल्ली:

Mahadevi Verma ki Kavitayen: हिन्दी साहित्य की अनमोल मणियों में से एक कवियत्री महदेवी वर्मा की जयंती 26 मार्च को थी. महादेवी वर्मा जी को हिंदी साहित्य में ज्ञान पीठ पुरस्कार मिल चुका है. साहित्य में उनके अतुलनिय योगदान को नहीं भुलाया जा सकता. महादेवी वर्मा जी का जन्म 26 मार्च 1907 को उत्तर प्रदेश के फरुक्खाबाद में हुआ था.उन्होंने अपनी लेखनी से भारतीय समाज को महिला उत्थान की दिशा में प्रेरित किया. आज उनकी कविताएं चारों तरफ शोर मचाती हैं. पढ़िए उनकी कुछ दिल छू लेने वाली कविताएं.

जो तुम आ जाते एक बार

कितनी करूणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
गाता प्राणों का तार तार
अनुराग भरा उन्माद राग

आँसू लेते वे पथ पखार
जो तुम आ जाते एक बार

हँस उठते पल में आर्द्र नयन
धुल जाता होठों से विषाद
छा जाता जीवन में बसंत
लुट जाता चिर संचित विराग

आँखें देतीं सर्वस्व वार
जो तुम आ जाते एक बार


मैं नीर भरी दुख की बदली!

स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसा
क्रन्दन में आहत विश्व हँसा
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झारिणी मचली!

मेरा पग-पग संगीत भरा
श्वासों से स्वप्न-पराग झरा
नभ के नव रंग बुनते दुकूल
छाया में मलय-बयार पली।

मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल
चिन्ता का भार बनी अविरल
रज-कण पर जल-कण हो बरसी,
नव जीवन-अंकुर बन निकली!

पथ को न मलिन करता आना
पथ-चिह्न न दे जाता जाना;
सुधि मेरे आगन की जग में
सुख की सिहरन हो अन्त खिली!

विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना, इतिहास यही-
उमड़ी कल थी, मिट आज चली!


मै अनंत पथ में लिखती जो

मै अनंत पथ में लिखती जो
सस्मित सपनों की बाते
उनको कभी न धो पायेंगी
अपने आँसू से रातें!

उड़् उड़ कर जो धूल करेगी
मेघों का नभ में अभिषेक
अमिट रहेगी उसके अंचल-
में मेरी पीड़ा की रेख!

तारों में प्रतिबिम्बित हो
मुस्कायेंगी अनंत आँखें,
हो कर सीमाहीन, शून्य में
मँडरायेगी अभिलाषें!

वीणा होगी मूक बजाने-
वाला होगा अंतर्धान,
विस्मृति के चरणों पर आ कर
लौटेंगे सौ सौ निर्वाण!

जब असीम से हो जायेगा
मेरी लघु सीमा का मेल,
देखोगे तुम देव! अमरता
खेलेगी मिटने का खेल!

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