यह ख़बर 28 अप्रैल, 2012 को प्रकाशित हुई थी

संरक्षणवाद से बचे अमेरिका : राव

खास बातें

  • अमेरिका में भारत की राजदूत निरूपमा राव ने अमेरिकी विद्यार्थियों को संरक्षणवाद के कुप्रभावों के प्रति सतर्क रहने को कहा है, क्योंकि इससे वैश्वीकरण के इस युग में आर्थिक वृद्धि और विकास में रुकावट आती है।
वाशिंगटन:

अमेरिका में भारत की राजदूत निरूपमा राव ने अमेरिकी विद्यार्थियों को संरक्षणवाद के कुप्रभावों के प्रति सतर्क रहने को कहा है, क्योंकि इससे वैश्वीकरण के इस युग में आर्थिक वृद्धि और विकास में रुकावट आती है।

राव ने यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा, गैंसविले के दीक्षांत समारोह में अपने सम्बोधन में शुक्रवार को कहा, "देशों की सीमाएं लगातार लचीली हो रही हैं, और एक समय में वे बिल्कुल अप्रासंगिक हो जाएंगी, क्योंकि लोगों को व्यापार व कारोबार के लिए मुक्त आवागमन और बिना बाधा के यात्रा की छूट होगी।"

राव ने कहा, "ऐसी स्थिति में संरक्षणवाद आर्थिक वृद्धि और विकास के लिए बाधा बन जाता है, क्योंकि यह लोगों, वस्तु एवं सेवाओं, विचारों और प्रौद्योगिकियों के प्रवाह के रास्ते में बाधा बनता है। यह दीवारें खड़ी करता है और यह अधोगामी है।"

राव ने कहा, "हमें इसके घातक प्रभावों के प्रति हरहाल में सचेत रहना चाहिए। वैश्वीकरण कई मामलों में आज दुनिया को जोड़ता है, लेकिन यह असंतोष भी फैलाता है।"

राव ने विद्यार्थियों से कहा कि उन्हें अपनी शिक्षा के उपयोग के जरिए दुनिया को एक बेहतर स्थान बनाना चाहिए। उन्होंने आशा जाहिर की कि ये विद्यार्थी "दोनों लोकतंत्रों, भारत और अमेरिका के बीच एक बेहतर और उच्च परिणामकारी साझेदारी के निर्माता बनेंगे।"

राव ने कहा, "जिस तरह से हम देखते हैं कि कई भारतीय विद्यार्थी इस देश के विश्वविद्यालयों में पढ़ाई करने आ रहे हैं, उसी तरह मैं आशा करती हूं कि अधिक से अधिक अमेरिकी युवा भारत जाएं और भारत के बारे में गम्भीर और व्यापक अध्ययन करें।"
यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा में फिलहाल 1100 से अधिक भारतीय विद्यार्थी हैं।

राव ने कहा, "कई भारतीय अकादमिक संस्थानों के साथ सम्पर्क एवं साझेदारी के जरिए यह विश्वविद्यालय भारतीय और अमेरिकी लोगों के बीच अधिक से अधिक आपसी समझ को बढ़ावा देने में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।"

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राव ने कहा कि हाल ही में युनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा के नेतृत्व में एक अनुसंधान दल को स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योकियों के विकास पर एक पांच वर्षीय 12.50 करोड़ डॉलर की परियोजना में हिस्सा लेने के लिए चुना गया था। जिसमें भारतीय व अमेरिकी अनुसंधान संस्थान, विश्वविद्यालय और उद्योग शामिल थे।