टाटा ग्रुप में मची उठापटक और उथलपुथल आखिर है किसलिए. विशेषज्ञ बता रहे हैं...

टाटा ग्रुप में मची उठापटक और उथलपुथल आखिर है किसलिए. विशेषज्ञ बता रहे हैं...

टाटा ग्रुप में मची उठापटक और उथलपुथल आखिर है किसलिए... पढ़ें आर्टिकल

खास बातें

  • शेषज्ञों की मानें तो यह सारी कवायद ग्रुप की वैश्विक छवि को बचाने के लिए
  • साइरस के फैसलों और कदमों से खुश नहीं थे टाटा
  • मार्च में समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में टाटा ग्रुप का रेवन्यू 4.6% घट गया थ
नई दिल्ली:

अपने अब तक के इतिहास में टाटा ग्रुप उठापटक के ऐसे दौर का साक्षी नहीं रहा होगा जिसे अब साइरस मिस्त्री को हटाए जाने के बाद यह ग्रुप फटी आंखों से देख रहा है. विशेषज्ञों की मानें तो यह सारी कवायद ग्रुप की वैश्विक छवि को बचाने के लिए है.

नाटकीय घटनाक्रम में रतन टाटा ने पारिवारिक कारोबार की पतवार संभाल ली. साइरस मिस्त्री जिस दिशा में लड़खड़ाते हुए ग्रुप को ले जा रहे थे, उससे वह खुश नहीं थे. 148 साल पुराने संस्थान के सीईओ साइरस मिस्त्री को हटा देने के बाद ग्रुप के अंदर तनातनी भी सामने आ गई और इसके अंदर की फूट भी हाई लाइट हो गई, वह भी ऐसे समय में जब कंपनी भारी वित्तीय चुनौतियों का सामना कर रही है.

मुंबई की इक्विनॉमिक्स रिसर्च ऐंड अडवायजरी प्राइवेट के एमडी जी चोकालिगम ने न्यूज एजेंसी एएफपी से कहा- टाटा समूह आर्थिक संकट से गुजर रहा है और इसके ज्यादातर कारोबार अच्छा परफॉर्म कर रहे हैं या नहीं.

मार्च में समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में टाटा ग्रुप का रेवन्यू 4.6 फीसदी घट गया. यह घटकर 103 बिलियर डॉलर रह गया. सबसे बुरा परफॉर्म कर रही है टाटा स्टील,  पिछले महीने घोषित हुए तिमाही नतीजों में इसका नेट लॉस करीब 3200 करोड़ रुपए यानी 475 मिलियन अमेरिकी डॉलर बताया गया था. कंपनी ने इस साल की शुरुआत में ऐलान किया था कि वह अपनी ब्रिटिश परिसंपत्तियों को बेच रही है जो स्टील की ओवर-सप्लाई, यूरोप में चीन से किए जा रहे सस्ते आयात, महंगी लागत और मुद्रा की अस्थिरता के चलते घाटे में हैं.

चीन की अर्थव्यस्था के हिलने के चलते जगुआर लैंड रोवर (जेएलआर) की बिक्री में कमी के चलते टाटा मोटर्स का प्रॉफिट भी घटा. वहीं, आईटी जगत की दिग्गज कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेस (टीसीएस) इसलिए लड़खड़ा रही है क्योंकि इसके क्लाइंट वैश्विक आर्थिक परिप्रेक्ष्य के मद्देनजर फूंक फूंककर कदम रख रहे हैं.

विदेशों में टाटा की छवि को डोकोमो डील से भी नुकसान पहुंचा है. जापान की एनटीटी डोकोमो को करीब 1.2 बिलियन डॉलर की बड़ी रकम की पेमेंट के चलते वैश्विक स्तर पर ग्रुप की इमेज को धक्का लगा है. कॉरपोरेट अडवायजरी फर्म सिंघी अडवायजर्स के महेश सिंघी ने एएफपी से कहा- टाटा ग्रुप की इमेज को बनाए रखने और चीजों को काबू में करने के लिए किसी भी नए नेतृत्व को 10 साल तक का समय लग सकता है.

रतन टाटा ने ग्रुप को बेहतरीन समय दिखाया है. 6 अरब डॉलर से 100 अरब डॉलर तक कंपनी को पहुंचाया है. उन्होंने दुनियाभर से अधिग्रहण कर कंपनियों को ग्रुप में मिलाया. जेएलआर खरीदी, ब्रिटेन की टेटली टी खऱीदी, एंग्लो-डच स्टील कंपनी कोरस खरीदी. जबकि, मिस्त्री ने ग्रुप के 30 बिलियन डॉलर के कर्ज को कम करने में फोकस किया और इसके लिए परिसंपत्तियों को बेचने और लोन रीफाइनेंस जैसे फैसले लिए.

कहा जाता है कि रतन टाटा मिस्त्री के विनिवेश पर फोकस किए जाने से लगातार फ्रस्ट्रेट हो रहे थे. उनका विश्वास था कि ग्रुप को अपनी परिसंपत्तियों को लंबे समय तक होल्ड करना चाहिए और इनकी वैश्विक पहुंच को कम नहीं करना चाहिए. लेकिन कुछ विशेषज्ञों द्वारा इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि ऐसा नहीं है कि साइरस द्वारा अपनाया गया थोड़ा अधिक सतर्कतापूर्ण रूख पूरी तरह से दरकिनार कर दिया जाएगा, क्योंकि टाटा के पास  बैलेंसशीट का 'बैलेंस' बरकरार रखने के लिए कंपनियों का 'साइज' कम करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.

साइरस ने दिसंबर 2012 में रतन टाटा के हाथों चेयरमैन पद लिया था. उन्हें यह पद सौंपने के लिए पूरी तैयारी की गई थी और यह कोई अचानक हुई घटना नहीं थी. करीब साल भर पहले ही उन्हें रतन टाटा के उत्तराधिकारी के तौर पर घोषित कर दिया गया था. वह समूह के छठे चेयरमैन थे. 1868 में बनाए गए इस ग्रुप के चेयरमैन साइरस मिस्त्री को जिस तरह से हटाया गया है वह समूह के अंदर की घबराहट और बैचेनी को परिलक्षित करता है.

यह नेतृत्व के स्तर पर खालीपन को उजागर करता है- इनगवर्न रिसर्च सर्विसेस के एक्सपर्ट श्रीराम सुब्रमण्यम ने एएफपी से यह बात कही. चार महीने बाद रतन टाटा की जगह जो भी इस पद पर आएगा उसे टाटा ग्रुप की वैश्विक छवि को बचाने में पूरे जोर से जुटना होगा जहां 15 हजार नौकरियों पर जोखिम है.


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