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खास बातें
- देश के 21 स्टील कंपनियों पर किए गए सर्वे में सीएसई ने पाया कि यह सभी कंपनियां जिस बड़े पैमाने पर ज़मीन, पानी, बिजली और कच्चे माल का इस्तेमाल करती हैं उसके हिसाब से उनका उत्पादन नहीं कर रही हैं।
नई दिल्ली: पांच मई को विश्व पर्यावरण दिवस है और इसके ठीक पहले सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायर्नमेंट ने अपना एक सर्वे रिलीज़ किया है। इस सर्वे में पाया गया है कि देश की स्टील कंपनियां भारी मात्रा में प्रदूषण फैला रही हैं। इसमें सोलिड वेस्ट के अलावा भारी मात्रा में हवा और पानी का प्रदूषण शामिल है।
देश के 21 स्टील कंपनियों पर किए गए सर्वे में सीएसई ने पाया कि यह सभी कंपनियां जिस बड़े पैमाने पर ज़मीन, पानी, बिजली और कच्चे माल का इस्तेमाल करती हैं उसके हिसाब से उनका उत्पादन नहीं कर रही हैं। मसलन देश के तमाम स्टील प्लांट्स के पास 75 हज़ार हेक्टेयर ज़मीन है जबकि इनका उत्पादन महज़ 75 मिलियन टन है। जबकि अंतरराष्ट्रीय मानक के हिसाब से 10 लाख या कहें एक मिलियन टन स्टील उत्पादन के लिए महज़ 200 हेक्टेयर ज़मीन की ज़रूरत होती है।
सीएसई की मानें तो 21 में 13 कंपनियों ने ही सर्वे में सहयोग किया जबकि सरकारी कंपनी सेल के राउरकेला प्लांट के अलावा कोई और प्लांट इस सर्वे के लिए तैयार ही नहीं हुआ। प्रदूषण फैलाने वाली कंपनियों में सरकारी कंपनी सेल सबसे ऊपर है। सीएसई के मुताबिक सेल के सिर्फ राउरकेला प्लांट ने ही इस सर्वे में हिस्सा लिया जबकि भिलाई, दुर्गापुर, बोकारो और बर्नपुर प्लांट्स ने सर्वे के लिए अपनी तरफ से कोई जानकारी नहीं दी। फिर भी सीएसई ने अपने तरीक़े से जो आंकड़े जुटाए उनके आधार पर यह पाया गया कि सेल के प्लांट्स पर्यावरण को सबसे ज़्यादा नुक्सान पहुंचा रहे हैं।
हैरत की बात है सेल को इन प्लांट्स को पर्यावरण संरक्षण के मानक पर महज़ 2 से 9 अंक तक मिले हैं। सीएसई की महानिदेशक सुनिता नारायण का कहना है कि सेल के पास बहुत सुविधाएं हैं जिनसे वह अच्छा बंदोबस्त कर सकते थे। सरकार को सोचना होगा कि आख़िर ये महारत्न कंपनी पर्यावरण की ख़ातिर कुछ क्यों नहीं कर रही।
सर्वे में महाराष्ट्र के रायगढ की इस्पात इंडस्ट्री को सबसे अच्छा माना गया है लेकिन यह भी 40 फीसदी नंबर ही हासिल कर पायी। सीएसई का दावा है कि नतीजे तक पहुंचने में दो साल लगे और हर प्लांट के खदान से लेकर इनवारनमेंटल मैनेजमेंट तक क़रीब 150 पैमानों पर जांच की गई।
अपने सर्वे और उसके नतीजे की विश्वसनीयता के बारे में सुनिता नारायण कहती हैं कि सर्वे में कंपनियों से मिली जानकारी और आंकड़ों को प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड से मिले आंकड़ों के साथ मिला कर देखा गया। इसके अलावा मौक़े पर जा कर भी जांच की गई और आसपास की आबादी से भी बात की गई। नतीजा जारी करने के पहले इसे संबंधित प्लांट्स को भी भेजा गया। एकाध प्लांट्स ने अपनी बात रखने की कोशिश की जबकि कुछ ने इसे मानने से इनकार कर दिया।
अब इन नतीजों के ज़रिए सीएसई सरकार पर यह दबाव बनाने की कोशिश करेगी कि वह स्टील प्लांट्स के लिए कड़े क़ायदे कानून बनाए ताकि पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।