बजट 2023 से पहले वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने किया 'रेवड़ी' राजनीति पर हमला

यह मुद्दा नहीं है कि क्या दिया कैसे दिया. किस मद में खर्च किया गया. यह सब कागज पर लिखा जाना चाहिए.

बजट 2023 से पहले वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने किया 'रेवड़ी' राजनीति पर हमला

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण

नई दिल्ली:

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से पहले भी कई राज्यों में कई मुख्यमंत्री और विपक्षी दल सत्ता में आने के लिए चुनावी रेवड़ियों की घोषणा करते रहे हैं. लेकिन सीएम केजरीवाल इस रेस में सबसे आगे निकल गए हैं और उनकी राजनीति दिल्ली में इस दम पर चल रही है. इस मुद्दे पर देश के पीएम नरेंद्र मोदी ने गुजरात चुनाव से पहले अरविंद केजरीवाल के दिल्ली मॉडल पर हमला करते हुए रेवड़ी शब्द का इस्तेमाल किया. 

अब अन्य राज्य भी राज्य के लोगों को फ्री में कई सेवाएं देने को तैयार हैं. लेकिन सवाल उठता है और उठता रहेगा कि यह फ्री में देने का पैसा कहां से आता है और कैसे दिया जाता है. 

अब इस सवाल को एक बार वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के सामने एक एक कार्यक्रम में रखा गया. इस कार्यक्रम में फ्रीबीज के सवाल पर जवाब देते हुए कहा कि अधिकतर राज्य सरकार घोषणा करती हैं और फिर लागू भी कर देती हैं. लेकिन जब पैसे देने की बारी आती है तब पीएम मोदी की ओर इशारा कर देती हैं. यह प्रथा गलत है. उनका कहना है कि सवाल यह नहीं है कि Freebie क्या है? सवाल यह है कि चुनाव से पहले राजनीतिक दल जो वादा करता है, वह राज्य की वित्तीय स्थिति को देखते हुए पूरा किया जा सकता है क्या? राजनीतिक दलों को अपने बजट में उस Freebie के लिए आवंटन करना चाहिए जिसका वो वादा करते हैं.

सीतारमण ने कहा कि इस सारी योजना का विवरण बजट में दिखाना चाहिए. जो नहीं हो रहा है. क्या पैसा आ रहा है और क्या कहां खर्च हो रहा है यह पूरा विवरण बजट में किया जाना चाहिए. यह मुद्दा नहीं है कि क्या दिया कैसे दिया. किस मद में खर्च किया गया. यह सब कागज पर लिखा जाना चाहिए.

उन्होंने कहा कि वायदा करने के बाद जब पार्टी सत्ता में आई तब उसे राज्य की वित्त व्यवस्था देखने के बाद यह पूरा करना होता है. बजट का प्रयोग एसेट बनाने में होता लेकिन इस प्रकार के खर्चे के लिए नहीं होता है. लेकिन अगर कोई करता है, तो उस राज्य को यह व्यवस्था करनी चाहिए कि पैसा कहां से आएगा और कहां खर्चा होगा. दिक्कत यही है. बिजली कंपनी को यही दिक्कत आ रही है. कई बिजली कंपनियों का काफी बकाया हो गया है. कंपनियों को अपना काम करते रहने के लिए पैसा चाहिए और उनका बकाया राज्य पूरा नहीं कर रहे हैं. यही असली मुद्दा है कि आप वादा करते हैं जनता से, वोट ले रहे हैं, तो कंपनियों का पैसा समय पर पूरा करें.

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