खास बातें
- डब्ल्यूएचओ ने चेतावनी दी है कि स्वास्थ्य क्षेत्र पर भारत सरकार द्वारा मात्र 32 डॉलर प्रति व्यक्ति का खर्च स्वास्थ्य सुविधा की दयनीय दशा को दर्शाता है।
जिनेवा: विश्व स्वास्थ्य संगठन (ब्ल्यूएचओ)ने चेतावनी दी है कि स्वास्थ्य क्षेत्र पर भारत सरकार द्वारा मात्र 32 डॉलर प्रति व्यक्ति का खर्च स्वास्थ्य सुविधा की दयनीय दशा को दर्शाता है जिसके कारण देश गरीब और समृद्ध, दोनों वर्ग के लोगों को होने वाली बीमारियों के दोहरे बोझ का सामना कर रहा है। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की जीवन प्रत्याशा वर्ष 2000 में 61 वर्ष की तुलना में 2009 में बढ़कर 65 वर्ष तक हो गयी है, जबकि 1990 में 64 वर्ष की वैश्विक जीवन प्रत्याशा दर की तुलना में यह 2009 में बढ़कर 68 वर्ष हो गई है। इसके अलावा, रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जहां भारत सहित गरीब देशों में स्वास्थ्य सुविधा पर किए जाने वाला खर्च 32 डॉलर प्रति व्यक्ति है, समृद्ध देशों में यह लगभग 4590 डॉलर (140 गुणा से अधिक) है। रिपोर्ट में कहा गया है कि उच्च आय वाले देशों में दस गुना चिकित्सक, 12 गुना नर्स और दवाइयां और 30 गुना दंत चिकित्सक हैं। आय में एक बड़े अंतर के अलावा भारत बीमारियों के दोहरे बोझ से जूझ रहा है। इनमें एक ओर गरीबों को होने वाली संक्रामक बीमारियां हैं तो दूसरी ओर तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण जीवन शैली से जुड़ी बीमारियां हैं। डब्ल्यूएचओ ने 64वें विश्व स्वास्थ्य सम्मेलन के यहां आयोजन से पूर्व जारी रिपोर्ट में कहा है, भारत में पुरूषों की औसत जीवन प्रत्याशा 63 वर्ष हो गयी है जबकि दशक भर पहले यह आयु 60 वर्ष थी। भारत में महिलाओं की जीवन प्रत्याशा 66 वर्ष है। डब्ल्यूएचओ में मृत्यु दर और रोगों का बोझ के समन्वयक कोलिन मेथर्स ने कहा, मां और शिशु की उच्च मृत्यु दर, आय में भारी अंतर और बढ़ते संक्रामक और गैर संचारी (दिल के रोग, स्ट्रोक, मधुमेह और कैंसर) रोगों के बावजूद भारतीय लोगों की जीवन प्रत्याशा और संपूर्ण स्वास्थ्य प्रभावशाली रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है, दूसरी ओर चीन में पिछले दस साल के दौरान जीवन प्रत्याशा में खासी बढ़ोतरी हुई है और यह 74 वर्ष हो गयी है। इसके अलावा, चीन ने स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च में बढ़ोतरी की है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में मातृत्व और शिशु मृत्यु दर का स्तर ज्यादा है, विशेष तौर पर गरीब लोगों में संक्रामक बीमारियों का बोझ बढ़ता जा रहा है और मध्यम वर्ग में गैर संचारी रोगों के मामले बढ़ रहे हैं।