LPG-PNG के नियमों में बदलाव के बाद अब केंद्र सरकार ने बिजली से जुड़े नियमों (Electricity Rules) में बड़े बदलावों (संशोधन) की घोषणा की है. इन नियमों से प्रभावित होने वाले लोगों, कंपनियों और अन्य स्टेकहोल्डर्स के साथ विचार-विमर्श के बाद ये बदलाव किए गए हैं. इन बदलावों से राहत मिलने की उम्मीद है. बिजली मंत्रालय (Ministry of Power) का कहना है कि इन बदलावों से सिस्टम की दक्षता बढ़ेगी, नुकसान में कमी आएगी और ग्रिड ज्यादा मजबूत होगा. ये कदम देश के ऊर्जा परिवर्तन (Energy Transition) लक्ष्यों के अनुरूप है.
बिजली मंत्रालय ने बताया कि इन संशोधनों को सभी संबंधित पक्षों (स्टेकहोल्डर्स) के साथ व्यापक विचार-विमर्श के बाद अंतिम रूप दिया गया है.
...ताकि व्यापार करना आसान हो
'बिजली (संशोधन) नियम, 2026' को अधिसूचित कर दिया गया है ताकि नियमों को समझने में कोई भ्रम न रहे, उद्योगों के लिए व्यापार करना आसान हो (Ease of doing business) और औद्योगिक विकास को बढ़ावा मिले. मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि जहां बिजली की खपत हो रही है, उसके पास ही बिजली पैदा करने से ट्रांसमिशन (बिजली भेजने) के दौरान होने वाले नुकसान में कमी आएगी, सिस्टम की दक्षता बढ़ेगी और ग्रिड अधिक मजबूत होगा.
6 बड़े बदलाव और उनके फायदे
- नियमों को आसान किया गया: सरकार ने अनुपालन (Compliance) को आसान बनाने के लिए कई प्रावधानों को सरल कर दिया है. मालिकाना हक और 'ग्रुप कैप्टिव' व्यवस्था के नियमों को स्पष्ट किया गया है ताकि कानूनी विवाद कम हों.
- अतिरिक्त शुल्क से राहत: एक नया प्रावधान जोड़ा गया है ताकि जब तक किसी प्लांट के कैप्टिव स्टेटस की जांच चल रही हो, तब तक बिजली वितरण कंपनियां (डिस्कॉम) उन पर भारी चार्ज न लगा सकें.
- कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर को मान्यता: अब मालिकाना हक की परिभाषा में सहायक कंपनियों (Subsidiaries) और होल्डिंग कंपनियों को भी शामिल किया गया है. इसका मतलब है कि अगर कोई कंपनी अपनी किसी दूसरी शाखा या स्पेशल व्हीकल (SPV) के जरिए बिजली प्लांट लगाती है, तो उसे 'कैप्टिव स्टेटस' से मना नहीं किया जाएगा.
- सरचार्ज में छूट: नए नियमों के अनुसार, यदि कैप्टिव उपयोगकर्ता निर्धारित प्रक्रिया के तहत घोषणा पत्र (Declaration) जमा करते हैं, तो उन पर क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज (CSS) और एडिशनल सरचार्ज (AS) नहीं लगाया जाएगा.
- फेल होने पर जुर्माना: यदि जांच में कोई प्लांट 'कैप्टिव प्लांट' की शर्तों को पूरा करने में विफल रहता है, तो उसे वह सारा सरचार्ज ब्याज (Carrying cost) के साथ चुकाना होगा.
- कामकाज में लचीलापन: 'असोसिएशन ऑफ पर्सन्स' (AoP) के माध्यम से चलने वाले ग्रुप कैप्टिव प्रोजेक्ट्स को अब अधिक लचीलापन दिया गया है. कंपनियां अपनी जरूरत के हिसाब से बिजली ले सकेंगी, बस उन्हें मालिकाना हक और खपत की कानूनी शर्तों को पूरा करना होगा.
मंत्रालय का कहना है कि भारतीय उद्योग अब टिकाऊ विकास (Sustainability) और लागत कम करने के लिए गैर-जीवाश्म ईंधन (जैसे सौर या पवन ऊर्जा) की ओर बढ़ रहे हैं. ऐसे में कैप्टिव बिजली उत्पादन के लिए एक स्पष्ट और भरोसेमंद नियम होना उद्योगों की प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ाने और देश की आर्थिक ग्रोथ के लिए बहुत जरूरी था.














