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This Article is From Jul 08, 2024

फिल्मों में कमाया नाम, कहलाया क्लासिक फिल्म मेकर लेकिन पर्सनल लाइफ रही खराब, शराब और सिगरेट की लत की वजह से टूटी शादी

1945 में गुरु दत्त ने विश्राम बेडेकर की फिल्म लखरानी में अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत की और 1946 में पी.एल. संतोषी की फिल्म हम एक हैं में असिस्टेंट डायरेक्टर और कोरियोग्राफर के रूप में काम किया जो देव आनंद के एक्टिंग की शुरुआत थी.

फिल्मों में कमाया नाम, कहलाया क्लासिक फिल्म मेकर लेकिन पर्सनल लाइफ रही खराब, शराब और सिगरेट की लत की वजह से टूटी शादी
पर्सनल जिंदगी में ज्यादा कामयाब नहीं रहे गुरुदत्त
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नई दिल्ली:

गुरु दत्त जो हिंदी सिनेमा के महान और क्लासिक फिल्म मेकर्स में से एक थे, जो कैमरे के क्लोज-अप, लाइट टेक्नीक्स और फीलिंग्स के इमोशनल पिक्चराइजेशन के अपने अनूठे एक्सपेरिमेंट्स के लिए जाने जाते थे. उन्होंने 8 हिंदी फिल्मों को डायरेक्ट किया इनमें प्यासा (1957) भी शामिल है. जिसे टाइम्स मैग्जीन ने 100 महानतम फिल्मों में शामिल किया गया है. आज हम गुरु दत्त के भारत के महान फिल्म मेकर्स में से एक बनने के सफर और उन दुखद परिस्थितियों पर चर्चा करेंगे जिनके चलते उन्होंने अकेले जिंदगी बिताई और इस दुनिया से चले गए.

शुरुआती जिंदगी

वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोण का जन्म 9 जुलाई 1925 को भारत के कर्नाटक के पादुकोण नाम के शहर में चित्रपुर सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था. बचपन में हुई एक दुर्घटना के बाद उनका नाम बदलकर गुरुदत्त पादुकोण रख दिया गया जिसे एक शुभ विकल्प माना गया. उनके पिता शिवशंकर राव पादुकोण एक हेडमास्टर और बैंकर थे जबकि उनकी मां वसंती एक टीचर और राइटर थीं. गुरुदत्त के शुरुआती दिन भवानीपुर, कोलकाता में बीते जहां वे बड़े हुए और बंगाली में पारंगत हो गए. 

करियर

1942 में गुरु दत्त ने अल्मोड़ा में उदय शंकर के स्कूल ऑफ डांसिंग एंड कोरियोग्राफी में अपनी पढ़ाई शुरू की. हालांकि कंपनी की लीडिंग लेडी के साथ जुड़ाव के कारण उन्होंने 1944 में पढ़ाई छोड़ दी. इसके बाद उन्हें कोलकाता में लीवर ब्रदर्स फैक्ट्री में एक टेलीफोन ऑपरेटर के रूप में नौकरी मिल गई लेकिन जल्द ही उन्होंने नौकरी छोड़ दी. कुछ समय के लिए बॉम्बे लौटने के बाद गुरु दत्त के चाचा ने उन्हें तीन साल के कॉन्ट्रैक्ट के तहत पुणे में प्रभात फिल्म कंपनी में नौकरी दिलवाई. यहीं पर उनकी दोस्ती अभिनेता रहमान और देव आनंद से हुई.

1945 में गुरु दत्त ने विश्राम बेडेकर की फिल्म लखरानी में अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत की और 1946 में पी.एल. संतोषी की फिल्म हम एक हैं में असिस्टेंट डायरेक्टर और कोरियोग्राफर के रूप में काम किया जो देव आनंद के एक्टिंग की शुरुआत थी. बाद में वे देश के सबसे महान फिल्म मेकर्स में से एक बन गए. गुरु दत्त की कागज के फूल (1959), चौदहवीं का चांद (1960) और साहिब बीबी और गुलाम (1962) जैसी शानदार फिल्में भारतीय सिनेमा में क्लासिक मानी जाती हैं.

पर्सनल लाइफ

1953 में गुरु दत्त ने गीता रॉय चौधरी से शादी की जो एक मशहूर प्लेबैक सिंगर थीं. इनसे गुरुदत्त की मुलाकात बाजी (1951) की मेकिंग के दौरान हुई थी. परिवार के काफी विरोध का सामना करने के बावजूद उन्होंने शादी की. वे मुंबई के पाली हिल में एक बंगले में रहने लगे और उनके तीन बच्चे हुए: तरुण, अरुण और नीना. हालांकि उनकी शादी में परेशानियां थीं. गुरु दत्त की स्मोकिंग, शराब पीने और लाइफस्टाइल ने उनके रिश्ते को खराब कर दिया.

एक्ट्रेस वहीदा रहमान के साथ उनके अच्छे रिश्तों ने मामले को और जटिल बना दिया जिससे उनका अलगाव हो गया. गीता दत्त का 1972 में 41 वर्ष की आयु में ज्यादा शराब पीने से लीवर खराब होने के कारण निधन हो गया. गुरु और गीता की मृत्यु के बाद उनके बच्चों का पालन-पोषण गुरु के भाई आत्मा राम और गीता के भाई मुकुल रॉय ने किया.

दुनिया को अलविदा

10 अक्टूबर, 1964 को गुरु दत्त को बॉम्बे के पेडर रोड पर अपने किराए के अपार्टमेंट में अपने बिस्तर पर मृत पाया गया. रिपोर्टों से पता चला कि उन्होंने शराब में नींद की गोलियां मिला दी थीं जिससे पता चलता है कि उनकी मृत्यु ओवरडोज या जानबूझकर की गई सुसाइड की उनकी तीसरी कोशिश होगी. उनके बेटे अरुण का मानना ​​था कि मौत अचानक हुई थी. उन्होंने इसका कारण गुरु दत्त की नींद की बीमारी से चल रही लड़ाई को बताया. उस समय गुरु दत्त दो अन्य प्रोजेक्ट में भी शामिल थे. एक्ट्रेस साधना के साथ पिकनिक और डायरेक्टर के.आसिफ की महाकाव्य लव एंड गॉड, जिसे आखिर में एक अलग एक साथ रीशूट किया गया और फिर रिलीज किया गया.

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