फिल्मी गानों को लेकर अक्सर कहा जाता है कि इनमें लोगों के जज्बातों को छू लेने की ताकत होती है. लेकिन क्या कोई गाना किसी ऐसे बच्चे की आंखें भी खुलवा सकता है. जो 15 दिनों से कोमा में हो? सुनने में ये किसी फिल्म की कहानी लग सकती है, लेकिन मजरूह सुल्तानपुरी से जुड़ा एक किस्सा कुछ ऐसा ही है. बताया जाता है कि उनके लिखे एक गीत ने उस बच्चे में हलचल पैदा कर दी थी, जिसके लिए डॉक्टर भी उम्मीद छोड़ चुके थे. ये कहानी आज भी संगीत की ताकत का सबसे चर्चित किस्सा मानी जाती है.
डॉक्टरों ने कहा- अब सिर्फ दुआ ही बची है
इस किस्से का जिक्र खुद मजरूह सुल्तानपुरी ने एक इंटरव्यू में किया था. उनके एक दोस्त थे अहमद, जो उनके गानों के जबरदस्त फैन थे. घर में मजरूह के लिखे लगभग हर गाने का रिकॉर्ड रखा था. लेकिन उनके बेटे की जिंदगी एक ऐसी बीमारी से जूझ रही थी, जिसका इलाज किसी डॉक्टर के पास नहीं था. बच्चा न ठीक से बोल पाता था, न सुन पाता था. वो घंटों एक ही जगह बैठा रहता था.
हालांकि एक बात सभी को हैरान करती थी. जैसे ही मुकेश का कोई गाना बजता, वो अचानक खुश हो जाता, झूमने लगता और उसके चेहरे पर अलग ही चमक आ जाती. फिर एक दिन उसकी तबीयत इतनी बिगड़ी कि वो कोमा में चला गया. डॉक्टरों ने इलाज की हर कोशिश की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. आखिर में उन्होंने परिवार से साफ कह दिया कि अब दवा नहीं, सिर्फ दुआ ही काम आ सकती है. मजबूरी में अहमद अपने बेटे को घर ले आए.
गाना बजा...बच्चे ने खोल दी आंखें
घर पहुंचने के बाद अहमद ने एक फैसला किया. उन्होंने फिल्म 'साथी' के एल्बम का वो गीत चला दिया, जिसके बोल थे आंखें खुली थीं आए थे वो भी नजर मुझे.... कहा जाता है कि जैसे ही गाना बजा, 15 दिनों से कोमा में पड़ा बच्चा धीरे-धीरे आंखें खोलने लगा. ये देखकर घर के लोग हैरान रह गए. हालांकि ये खुशी ज्यादा देर तक नहीं रही.
बताया जाता है कि पूरा गाना सुनने के बाद बच्चे ने अंतिम सांस ले ली. लेकिन ये घटना हमेशा के लिए लोगों की यादों में दर्ज हो गई. जब मजरूह सुल्तानपुरी ने ये बात संगीतकार नौशाद को बताई, तो उन्होंने कहा कि ये सिर्फ धुन का नहीं, बल्कि मुकेश की आवाज, मजरूह के शब्द और संगीत की भावनाओं का असर था.
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