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लंबी फिल्मों का खेल: कम शो, महंगे टिकट…क्या बॉक्स ऑफिस पर पड़ रहा है सीधा असर?

जहां पहले ज्यादातर फिल्में 2 से 2.5 घंटे के बीच खत्म हो जाती थीं, वहीं अब कई बड़ी बजट की फिल्में तीन घंटे से भी ज्यादा लंबी बन रही हैं. लेकिन यहां मुद्दा सिर्फ फिल्म की लंबाई का नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर फिल्म की कमाई और सिनेमाघरों के कारोबार पर भी पड़ता है.

लंबी फिल्मों का खेल: कम शो, महंगे टिकट…क्या बॉक्स ऑफिस पर पड़ रहा है सीधा असर?
साढ़े 3 घंटे से ज्यादा लंबी फिल्म है धुरंधर 2

पिछले कुछ सालों में बॉलीवुड में लंबी अवधि वाली फिल्मों का एक नया चलन देखने को मिला है. जहां पहले ज्यादातर फिल्में 2 से 2.5 घंटे के बीच खत्म हो जाती थीं, वहीं अब कई बड़ी बजट की फिल्में तीन घंटे से भी ज्यादा लंबी बन रही हैं. ये ट्रेंड कहीं न कहीं पुराने दौर की याद भी दिलाता है, जब लंबी फिल्में आम बात हुआ करती थीं. हाल ही में रिलीज हुई धुरंधर: द रिवेंज की अवधि करीब 3 घंटे 49 मिनट है, जबकि इसके पहले भाग धुरंधर की लंबाई 3 घंटे 34 मिनट थी. इससे पहले आई फिल्म एनिमल भी करीब 3 घंटे 21 मिनट लंबी थी. वहीं अगर पिछली कुछ बड़ी फिल्मों की बात करें तो बाहुबली, केजीएफ और पुष्पा जैसी फिल्मों के दूसरे भाग भी काफी लंबे रहे हैं.

लेकिन यहां मुद्दा सिर्फ फिल्म की लंबाई का नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर फिल्म की कमाई और सिनेमाघरों के कारोबार पर भी पड़ता है. दरअसल, आम तौर पर 2 घंटे के आसपास की फिल्मों को मल्टीप्लेक्स में रोजाना करीब 20 से 22 शो मिल जाते हैं. लेकिन अगर हाल ही में रिलीज हुई धुरंधर: द रिवेंज के शो देखें, तो इसके करीब 12 से 15 शो ही रोजाना चल रहे हैं. सीधी सी बात है- कम शो मतलब कम दर्शक और कम कमाई. ऐसे में अगर फिल्म की अवधि थोड़ी कम होती, तो मौजूदा कमाई के आंकड़े और भी बड़े हो सकते थे.

सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों पर भी इसका असर साफ दिखता है. जहां आम तौर पर दिन में 4 शो चलते हैं, वहीं लंबी फिल्मों के चलते ये संख्या घटकर 3 रह जाती है. अगर 4 शो चलाने की कोशिश भी की जाए, तो कर्मचारियों को ज़्यादा देर तक काम करना पड़ता है, जिससे संचालन की दिक्कतें बढ़ती हैं. तीन घंटे से लंबी फिल्म होने पर शो के बीच सफाई और तैयारी के लिए समय निकालना पड़ता है, जिससे कुल शो घट जाते हैं. इसका सीधा असर टिकट बिक्री और कमाई पर पड़ता है. साथ ही, लंबे समय की फिल्मों के कारण समय तालमेल की दिक्कतें और खर्च भी बढ़ जाते हैं, जिससे सिनेमाघरों के लिए जोखिम बढ़ जाता है.

लंबी फिल्मों का सिनेमाघरों पर असर 

लंबी फिल्मों की वजह से सिनेमाघरों पर पड़ते असर पर फिल्म कारोबार विशेषज्ञ और जनता सिनेमा के संस्थापक यूसुफ शेख का कहना है, फिल्म ‘धुरंधर' की लंबाई लगभग 3 घंटे 50 मिनट (सटीक रूप से 229 मिनट) होने के बावजूद इसकी व्यावसायिक सफलता उल्लेखनीय है. हालांकि इतनी अधिक अवधि के कारण सिंगल स्क्रीन पर 1 शो और मल्टीप्लेक्स में लगभग 5 से 7 शो कम हो रहे हैं, जिससे राजस्व में करीब 20% की गिरावट की आशंका थी, लेकिन देशभर में टिकट की कीमतों में की गई 30% की बढ़ोतरी ने इस घाटे की पूरी तरह भरपाई कर दी है. आज यह फिल्म एक ‘इवेंट फिल्म' बन चुकी है, जिसे दर्शक किसी बड़े उत्सव या शादी की तरह देख रहे हैं और इसके लिए वे मानसिक रूप से 4 घंटे का समय देने को तैयार हैं. शानदार समीक्षाओं और जबरदस्त क्रेज के कारण फिल्म की लंबाई अब कोई बाधा नहीं रही है, बल्कि यह एक ‘मस्ट वॉच' फिल्म के रूप में अपनी सफल यात्रा पर निकल पड़ी है.

टिकट की कीमतों को बढ़ाकर होती है भरपाई 

इसके बाद जयपुर के सिनेमाघर मालिक और फिल्म वितरक राज बंसल का कहना है, जब ‘धुरंधर' जैसी बड़ी अवधि वाली फिल्में आती हैं, तो सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों में शोज की संख्या चार से घटकर तीन रह जाती है. यदि सुबह का शो (मॉर्निंग शो) चलाना हो, तो उसे जल्दी शुरू करना पड़ता है, जिससे उतनी रेवेन्यू नहीं मिल पाती जितनी मिलनी चाहिए. इस स्थिति में होने वाले लगभग 25% के नुकसान की भरपाई टिकट की कीमतों को बढ़ाकर की जाती है. मल्टीप्लेक्स में भी लगभग 20 से 25% शोज़ कम हो जाते हैं, जिन्हें वे ओवरलैपिंग के जरिए एडजस्ट करने की कोशिश करते हैं. वहाँ भी टिकट की दरें बढ़ाई जाती हैं, लेकिन यह तब तक ही संभव होता है जब तक सिनेमाघर हाउसफुल रहते हैं. वर्किंग डेज (weekdays) आने पर या फिल्म की लोकप्रियता कम होने पर रेट कम करने पड़ते हैं. कुल मिलाकर, बड़ी फिल्मों के कारण बढ़ने वाली लागत का सीधा भार दर्शकों की जेब पर ही पड़ता है.

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कुल मिलाकर, लंबी फिल्में जहां दर्शकों को एक बड़ा अनुभव देने की कोशिश करती हैं, वहीं दूसरी तरफ ये सिनेमाघरों और कमाई के गणित को भी प्रभावित कर रही हैं. ऐसे में आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि फिल्म निर्माता इस संतुलन को कैसे साधते हैं.

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