गाजा संघर्ष पर आधारित एक अंतरराष्ट्रीय फिल्म को लेकर भारत में नया विवाद खड़ा हो गया है. ‘The Voice of Hind Rajab' नाम की इस फिल्म को लेकर दावा किया जा रहा है कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ने बिना कोई लिखित आदेश जारी किए इसे सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया है. इस मामले को गंभीर बताते हुए कई सांसदों ने केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव को पत्र लिखकर तुरंत हस्तक्षेप की मांग की है. सांसदों का कहना है कि यह मामला केवल एक फिल्म का नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतांत्रिक मूल्यों से भी जुड़ा हुआ है.
सांसदों ने उठाए पारदर्शिता और प्रक्रिया पर सवाल
विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े सांसदों- जयराम रमेश, जॉन ब्रिटास, राम गोपाल यादव, मनोज कुमार झा समेत अन्य ने अपने पत्र में कहा कि बिना लिखित आदेश के फिल्म को सर्टिफिकेशन से वंचित करना नियमों के खिलाफ है. उन्होंने याद दिलाया कि सिनेमैटोग्राफ एक्ट, 1952 के तहत हर फैसले को स्पष्ट और लिखित रूप दिया जाना जरूरी है. सांसदों का कहना है कि इस तरह की प्रक्रिया न सिर्फ पारदर्शिता पर सवाल उठाती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि कहीं कोई अनौपचारिक या गैर-कानूनी दबाव तो नहीं डाला जा रहा. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ऐसे फैसले जारी रहे तो इससे संस्थाओं की विश्वसनीयता पर असर पड़ेगा.
‘कलात्मक अभिव्यक्ति पर रोक नहीं लगनी चाहिए'
सांसद जॉन ब्रिटास ने साफ कहा कि किसी भी तरह की “अस्पष्ट या अनौपचारिक सेंसरशिप” लोकतंत्र के लिए खतरनाक है. उनका मानना है कि भारत की ताकत उसकी विविधता और अलग-अलग विचारों को स्वीकार करने की क्षमता है. सांसदों ने यह भी कहा कि फिल्म का विषय संवेदनशील जरूर है, लेकिन यह सार्वजनिक चर्चा और कला के दायरे में आता है. उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अगर भू-राजनीतिक कारणों से फिल्मों पर रोक लगाई गई तो यह एक गलत मिसाल बन सकती है.
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फिलहाल सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन इस विवाद ने एक बार फिर सेंसरशिप और अभिव्यक्ति की आजादी पर बहस तेज कर दी है.
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