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'चलड़े छलड़े वाल' से लेकर रेशमा और नुसरत तक, सरहदों के पार Gen Z भारत-पाकिस्तान की सांस्कृतिक विरासत को कर रहे हैं पसंद  

पाकिस्तानी टीवी ड्रामा भारतीय युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय है. राजनीतिक तनाव के बावजूद, पंजाबी गाने और पाकिस्तानी संगीत को सीमा के पार भी खूब सुना जाता है.  भारतीय युवा जिस तरह से पाकिस्तानी पॉप कल्चर को खोज रहे हैं, वह काफी दिलचस्प है.

'चलड़े छलड़े वाल' से लेकर रेशमा और नुसरत तक, सरहदों के पार Gen Z भारत-पाकिस्तान की सांस्कृतिक विरासत को कर रहे हैं पसंद  
सरहदों के पार Gen Z भारत-पाकिस्तान की सांस्कृतिक विरासत को कर रहे हैं पसंद  
नई दिल्ली:

रेशमा और नुसरत फतेह अली खान से लेकर 'दर-ए-नजात', 'मिट्टी दे बावे' और पंजाबी इंडी म्यूजिक तक, दोनों देशों की एक नई पीढ़ी राजनीतिक दुश्मनी से परे सांस्कृतिक जुड़ाव खोज रही है. पाकिस्तानी टीवी ड्रामा भारतीय युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय है. राजनीतिक तनाव के बावजूद, पंजाबी गाने और पाकिस्तानी संगीत को सीमा के पार भी खूब सुना जाता है.  भारतीय युवा जिस तरह से पाकिस्तानी पॉप कल्चर को खोज रहे हैं, वह काफी दिलचस्प है. भले ही राजनीतिक रिश्ते तनावपूर्ण बने हुए हैं, लेकिन सीमा के दोनों ओर की 'जनरेशन Z' संगीत, टीवी, फैशन और सोशल मीडिया के जरिए एक-दूसरे से सांस्कृतिक रूप से जुड़ रही है. 'दर-ए-नजात' और 'मिट्टी दे बावे' जैसे पाकिस्तानी नाटकों की भारत में बढ़ती लोकप्रियता और साथ ही 'अल्फाज' और 'पार छनादे' जैसे गानों का खूब सुना जाना, यह दिखाता है कि कैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पाकिस्तानी मनोरंजन को भारतीय युवाओं की नई पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं. आजकल कई युवा फैंस, पारंपरिक माध्यमों से हटकर, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म, रील्स और ऑनलाइन बातचीत के जरिए एक-दूसरे की संस्कृति को जान और समझ रहे हैं.

रेशमा से लेकर राहत तक भारत में भी मशहूर 
यह सांस्कृतिक जुड़ाव कोई नई बात नहीं है. 1983 में, सुभाष घई की फिल्म 'हीरो' में रेशमा का गाया गाना 'लंबी जुदाई' भारत में विरह और तड़प का प्रतीक बन गया था. मेहंदी हसन की गजलें, गुलाम अली का 'चुपके चुपके रात दिन' और नुसरत फतेह अली खान की शानदार कव्वालियां सरहद पार कर भारत में भी खूब पसंद की गईं. बाद में आतिफ असलम और राहत फतेह अली खान ने बॉलीवुड में काम किया, जिनकी आवाजें हिंदी सिनेमा के रोमांटिक गानों का अहम हिस्सा बन गईं.  युद्धों, कूटनीतिक रिश्तों में खटास  और पाबंदियों के बावजूद, सीमा पार का संगीत समय समय पर देश में वायरल होते रहते हैं. इसकी एक वजह यह है कि उर्दू शायरी, पंजाबी लोक परंपराएं, सूफी संगीत और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का प्रभाव, एक ऐसी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं जो बंटवारे से भी पुरानी है. जो चीजें बदली हैं, वे हैं - माध्यम, दर्शक, और यह कि दर्शक किस तरह इस संगीत को पसंद करते हैं.

पाकिस्तानी ड्रामा, पंजाबी धुनें और Gen Z का जुड़ाव
पाकिस्तानी टेलीविजन को कभी 'जिंदगी' जैसे चैनलों के जरिए भारतीय दर्शक देखते थे. उसे अब डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एक नई जिंदगी मिली है. 'हमसफर' और 'जिंदगी गुलज़ार है' जैसी पुरानी सफलताओं ने युवा दर्शकों के बीच पाकिस्तानी टेलीविजन में फिर से दिलचस्पी जगाने का काम किया. 'दर-ए-नजात', जो आस्था, मुक्ति और सामाजिक विरोधाभासों को दिखाता है. वहीं  'मिट्टी दे बावे', जिसमें माहिरा खान और वहाज अली हैं.  जो वर्ग, प्रेम और बदले की कहानी पर आधारित है. ये शो अब सीमा पार भी लोगों का ध्यान खींच रहे हैं.  संगीत ने तो और भी तेजी से सरहदें पार की हैं. अली सेठी और शाए गिल का गाना 'पसूरी' सीमा के दोनों तरफ छा गया, जबकि अब्दुल हनान और हसन रहीम जैसे कलाकारों ने आज के पाकिस्तानी संगीत को एक नई पहचान दी है. 'अल्फाज' और 'पार छनादे' जैसे गाने पंजाबी गानों ने फैंस के  दिलों को छू लिया. 'जेन जी' के लिए किसी गाने की राष्ट्रीयता से कहीं ज्यादा मायने उसकी धुन, उसके बोल और उसका भावनात्मक असर है. कराची में बनी कोई 'रील' चंडीगढ़ में ट्रेंड बन सकती है. लाहौर के पंजाबी बोल लखनऊ में किसी की इंस्टाग्राम स्टोरी का हिस्सा बन सकते हैं. सोशल मीडिया ने  बिना किसी सहयोग और कॉन्सर्ट के संस्कृतियों को जानने और समझने का रास्ता खोल दिया है.
  
दशकों से भारत और पाकिस्तान ने एक-दूसरे को बंटवारे, युद्धों, क्रिकेट और राजनीतिक टकराव के नजरिए से देखा है. 'जेन जी' (Gen Z) सांस्कृतिक चीजों के जरिए इस रिश्ते के एक अलग पहलू को भी देख रही है. बंटवारे का दौर देखने वाली पीढ़ियों के उलट, आज के युवाओं को इसका सीधा आघात (trauma) नहीं मिला है, बल्कि उन्हें इसकी यादें विरासत में मिली हैं. उनकी सांस्कृतिक पसंद अब डिजिटल माध्यमों से नई चीजें खोजने और उस सामाजिक-राजनीतिक माहौल से तय होती है, जिसमें वे बड़े हुए हैं. 
 

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