शायर और गीतकार निदा फाजली पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘मैं निदा' को 72वें नेशनल अवॉर्ड समारोह में बेस्ट आर्ट/कल्चर अवॉर्ड से नवाजा गया. इस डॉक्यूमेंट्री का निर्देशन किया है अतुल पांडे ने और बतौर निर्देशक यह इनकी पहली फिल्म है, लेकिन फिल्म जगत में अतुल बतौर निर्माता काफी सालों से सक्रिय हैं और ‘समर ऑफ 2007' जैसी फिल्मों का निर्माण कर चुके हैं. ‘मैं निदा' के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने पर अतुल पांडे ने खुशी जाहिर की और एनडीटीवी से खास बातचीत में इस डॉक्यूमेंट्री और निदा फाजली के करियर पर प्रकाश डाला, पेश हैं इंटरव्यू के कुछ अंश.
सवाल: क्या आपको उम्मीद थी कि ‘मैं निदा' को नेशनल अवॉर्ड मिलेगा?
जवाब: देखिए, मैं 37-38 साल से फिल्म प्रोडक्शन में हूं. डॉक्यूमेंट्री का निर्देशन करना मेरे लिए पहली बार था. एक पहला काम होता है, उसमें आप अपनी जिंदगी भर की जो लर्निंग है, उसका इस्तेमाल करते हैं. फिल्म बनाने में काफी मेहनत लगी. कविता और भाषा से मेरा लगाव रहा है और निदा फाजली साहब में ये दोनों चीजें थीं. पहली बार जब फिल्म पूरी हुई और हमने देखी तो अच्छी लगी. मालती जी, निदा साहब की पत्नी, उन्होंने जब पहली बार ट्रायल देखा तो रो पड़ीं. उससे मुझे विश्वास हुआ कि फिल्म कुछ अच्छा कर रही है.
सवाल: डॉक्यूमेंट्री बनाने के दौरान किस तरह की मुश्किलें आईं?
जवाब: दिल्ली एक अजीब जगह है. इतनी बड़ी-बड़ी संस्थाएं हैं, लेकिन टैलेंट टिकता नहीं है. डॉक्यूमेंट्री एक आदमी की विजन होती है. आपको तथ्यों और फुटेज से एक नैरेटिव बनाना होता है और फिर उन लोगों से उसको वैलिडेट करवाना होता है, जो उस आदमी से जुड़े रहे हैं.
टेक्नीशियन भी दिल्ली में नहीं थे. हमारे एडिटर ग्वालियर में थे. वह रेलवे में इंजीनियर हैं और शौक के तौर पर रील्स बनाते थे. यह उनका पहला एडिटिंग प्रोजेक्ट था. इसलिए मुझे दिल्ली से ग्वालियर जाना पड़ता था और होटल में बैठकर एडिटिंग करनी पड़ती थी. यह फिल्म शू-स्ट्रिंग बजट में बनी है. हमारे पास कैमरामैन नहीं था. कैमरा अटेंडेंट्स के साथ काम किया. बतौर फर्स्ट टाइम डायरेक्टर अचानक मुझे कैमरा भी संभालना पड़ा, क्योंकि अटेंडेंट्स वह काम नहीं कर पा रहे थे.
सवाल: आप उत्तर प्रदेश से हैं और फिल्म जगत में उत्तर प्रदेश से कई बड़े नाम निकले हैं. ऐसे में आपको राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना आपके लिए और आपके राज्य के लिए कितना महत्व रखता है, खासकर ऐसे समय में जब उत्तर प्रदेश में भी फिल्म इंडस्ट्री को बढ़ावा देने की दिशा में काम हो रहा है?
जवाब: मैं उत्तर प्रदेश में पैदा हुआ और पला-बढ़ा हूं. इस बार नेशनल अवॉर्ड में मैं यूपी से हूं, तो गर्व और संतोष की बात है. जिस प्रदेश को फिल्म इंडस्ट्री से जोड़ा जा रहा है, वहां से एक छोटे से कोने में यूपी के एक अतुल पांडे का नाम आएगा कि उसने कुछ किया था, छोटा-मोटा यूपी के लिए, तो यह मेरे लिए बड़ी बात है.
सवाल: आप निदा फाजली से कभी मिले नहीं थे, फिर भी उन पर डॉक्यूमेंट्री बनाने का विचार कैसे आया?
जवाब: मैं निदा साहब से कभी मिला नहीं था. उनकी टाइमलेस पोएट्री जानता था. उनकी कई कविताएं और गाने ऐसे थे, जिन्हें मैंने सालों से सुना था, लेकिन यह नहीं पता था कि वह निदा फाजली के हैं. जब मैंने उनकी बायोग्राफी पढ़ी और लोगों से बात की तो मुझे पता चला कि इतना बड़ा आदमी है और हम जानते ही नहीं हैं.
मुझे गुस्सा आया कि इतना बड़ा आदमी लोगों को पता नहीं है. मैंने सोचा कि उन्हें सही तरह से दिखाना चाहिए. निदा साहब पांच भाषाएं जानते थे, पढ़ते और लिखते थे—हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी और अरबी. आज लोग आधी भाषा जानते हैं और बड़े-बड़े दावे करते हैं. वह बहुत बेबाक थे. दिल में जो होता था, बोल देते थे. वह पॉलिटिकली करेक्ट नहीं थे, लेकिन कभी नीचे से वार नहीं किया और शब्द की गरिमा को कभी नहीं गिराया.
मैं भाषा का विद्यार्थी हूं. अपनी शब्दावली बढ़ाने की कोशिश करता हूं. शब्द सीखने में मुझे खुशी मिलती है और उसे सही तरीके से इस्तेमाल करने में भी. मुझे सीधे, साफ, अच्छे और समझदार लोग पसंद हैं, चाहे उनकी विचारधारा कुछ भी हो. निदा साहब ने मुझे बहुत प्रभावित किया.
सवाल: निदा फाजली को बॉलीवुड ने वह जगह क्यों नहीं दी, जिसके वह हकदार थे?
जवाब: निदा साहब का कद बहुत बड़ा था. उनके गाने और उनकी शायरी बहुत बड़ी चीज है, लेकिन आज भी बहुत लोगों को नहीं पता कि किसने लिखा है. जो जानते भी हैं, वह भी कई बार कन्फ्यूज रहते हैं.
वह अपने मन की बात कहते थे. कई बार उनको ब्लैकलिस्ट किया गया. पांच-दस साल तक उन्होंने फिल्मों में काम नहीं किया. प्रभावशाली लोगों के बारे में जो कहना होता था, वह कह देते थे. इसलिए उन्होंने मंच को अपना माध्यम बनाया. वह मुशायरों और स्टेज परफॉर्मेंस में जाते थे. अश्विनी चौधरी ने कहा है कि ‘वो मुशायरा म्यूट लेते थे.'
डेनिश ने बताया कि निदा साहब जब कोई शेर या ग़जल पढ़ते थे तो पहले उसका बैकग्राउंड बताते थे. पहले लोगों को संदर्भ समझाते थे और फिर शेर पढ़ते थे. इसलिए उनका असर बहुत अलग होता था.
सवाल: उनके आखिरी दिनों को आपने किस तरह देखा?
जवाब: मैं निदा साहब के घर कई बार गया हूं. मालती जी और उनकी बेटी से मुलाकात हुई. ऐसा नहीं था कि मुफलिसी थी, लेकिन जब आप देखते हैं कि उनसे कम जानकारी और कम काबिलियत वाले लोग आलीशान जिंदगी जी रहे हैं, तो तकलीफ होती है.
निदा साहब को पद्मश्री मिला था, लेकिन उनके घर में वह भी खूबसूरती से फ्रेम करके दीवार पर लगा हुआ नहीं था.
सवाल: इस नेशनल अवॉर्ड के बाद क्या आपको लगता है कि निदा फाजली की विरासत ज्यादा लोगों तक पहुंचेगी?
जवाब: जो लोग फिल्म से जुड़े हैं, उनके पास अब एक मौका है कि निदा साहब को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाएं. उनकी बेटी जेन जी की हैं. उन्हें भी शायद यह अंदाजा नहीं था कि उनके पिता कितने बड़े आदमी थे. आज की जेनरेशन के लिए किसी की सफलता को देखना भी जरूरी होता है.
निदा साहब आधुनिक समय के कबीर हैं. कबीर के 500 साल बाद भी हम उन्हें पढ़ रहे हैं. उसी तरह निदा साहब की विरासत भी आगे जानी चाहिए. मीडिया इसमें मदद कर सकता है.
ज्ञानपीठ पुरस्कार नहीं मिलने का दुख है, लेकिन कोई गिला-शिकवा नहीं
सवाल: राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बाद निदा फाजली के परिवार की क्या प्रतिक्रिया रही?
जवाब: हमारा संपर्क व्हाट्सऐप पर रहा है. फिल्म इंडियन पैनोरमा में गई थी. मालती जी और उनकी बेटी वहां थीं. मालती जी ने पहली ट्रायल में फिल्म देखकर रो दिया था. इससे बड़ा मेरे लिए कोई एंडोर्समेंट नहीं हो सकता.
एनएफडीसी और इफ्फी ने गोवा में मालती जी और उनकी बेटी को बुलाकर सम्मानित किया. मालती जी ने कहा कि कोई गिला-शिकवा नहीं है. बस एक इच्छा थी कि निदा साहब को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिल जाता. एक साहित्यिक व्यक्ति के लिए इससे बड़ा पुरस्कार क्या हो सकता है. वह हर साल इंतजार करती थीं कि शायद इस बार ज्ञानपीठ की घोषणा में उनका नाम आएगा. जब नहीं आया तो दुख हुआ, लेकिन कोई गिला-शिकवा नहीं था.
सवाल: आप अटल बिहारी वाजपेयी पर भी डॉक्यूमेंट्री बना रहे हैं. उस फिल्म को लेकर आपकी तैयारी किस तरह चल रही है?
जवाब: देखिये, एक डॉक्युमेंट्री बनाना एक लंबी और मेहनत वाली यात्रा है. अटल बिहारी वाजपेयी साहब पर काम करते-करते मुझे उनसे इश्क हो गया.
हम उनकी डॉक्यूमेंट्री की तैयारी पूरी तरह से कर रहे हैं. कोशिश है कि उनके व्यक्तित्व का हर पहलू सही तरीके से सामने आए. उनकी जिंदगी बहुत बड़ी है और उस पर काम करना बहुत बड़ी जिम्मेदारी है.
सवाल: हिंदी सिनेमा में डॉक्यूमेंट्री फिल्मों की स्थिति को आप किस तरह देखते हैं?
जवाब: डॉक्यूमेंट्री को कम आर्थिक सहयोग मिलता है और कमर्शियल सिनेमा की तुलना में उसे प्राथमिकता भी कम मिलती है. ओटीटी और स्टूडियोज को भी कमर्शियल रिस्क लगता है. हालांकि अब स्थिति थोड़ी बेहतर हुई है. दर्शक अच्छी और सच्ची कहानियां देखना चाहते हैं. उम्मीद है कि डॉक्यूमेंट्री कल्चर को आगे और बेहतर मौके मिलेंगे.
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