जब पहाड़ में सूखते हैं नौले और भरते हैं स्विमिंग पूल... विश्व जल दिवस पर उत्तराखंड के बदलते पहाड़ की कहानी

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हिमांशु जोशी

विश्व जल दिवस (22 मार्च) पर पानी को लेकर चिंताएं दोहराई जा रही हैं, उत्तराखंड के पहाड़ों की तस्वीर भी कई सवाल खड़े करती है. कभी फल पट्टी के रूप में मशहूर रहे इलाकों में आज जमीन का कारोबार, बढ़ते रिसॉर्ट और सूखते जल स्रोत साथ-साथ दिखते हैं. जल संकट और बदलते सामाजिक रिश्तों के बीच सामाजिक कार्यकर्ता बची सिंह बिष्ट से हुई बातचीत पहाड़ के बदलते समाज की परतें खोलती है.

उत्तराखंड बनने के बाद की हकीकत

उत्तराखंड बनने के बाद लोगों के सपनों का उत्तराखंड वैसा नहीं बना जैसा उन्होंने सोचा था. यह बात पहाड़ के गांवों में साफ सुनाई देती है और सामाजिक कार्यकर्ता बची सिंह बिष्ट भी इसे बिना किसी लाग लपेट के कहते हैं कि राज्य बनने के बाद उम्मीद थी कि शिक्षा, पानी, जंगल और जमीन पर स्थानीय समाज की भूमिका मजबूत होगी, लेकिन हुआ कुछ और. मंडियां बड़ी मंडियों में बदलीं, पारंपरिक रिश्तों की जगह कमीशन एजेंटों का दौर आया और किसान अपने ही श्रम के बीच असुरक्षित महसूस करने लगे. बिष्ट बताते हैं कि किसान सिर पर फल और आलू उठाकर सड़क तक लाते थे और वहां उन्हें ओने पौने दाम मिलते थे, जबकि वही माल बड़े शहरों में कई गुना कीमत पर बिकता था. इस बदलाव ने धीरे धीरे किसानों के आत्मविश्वास और सामाजिक ढांचे को कमजोर किया और जमीन बेचने की प्रवृत्ति बढ़ती चली गई.

जनमैत्री संगठन की शुरुआत और सामाजिक यात्रा

बची सिंह बिष्ट बताते हैं कि वर्ष 1992 में उन्होंने अपने साथियों के साथ जनमैत्री संगठन की शुरुआत की. संपूर्ण क्रांति विद्यालय से लौटने के बाद उन्होंने महसूस किया कि गांवों में पानी की पहुंच असमान है, शौचालय नहीं हैं और जंगलों पर दबाव बढ़ रहा है. करीब चार सौ लोगों के साथ शुरू हुआ यह अभियान स्नेह, स्वावलंबन, लोकतंत्र और अहिंसा के सिद्धांतों पर आधारित था. शुरुआती दौर में नुक्कड़ नाटक, पद यात्राएं और गीतों के जरिए लोगों को जोड़ा गया. संगठन का उद्देश्य सिर्फ पर्यावरण बचाना नहीं बल्कि समाज को उसकी जिम्मेदारी याद दिलाना था. समय के साथ यह पहल जल संचय जीवन संचय अभियान और रामगढ़ नदी पुनर्जीवन जैसी पहलों में बदल गई, जिसमें लोगों ने अपने घरों में पानी बचाने के टैंक बनाए और पारंपरिक स्रोतों को फिर से जीवित करने की कोशिश की.

राज्य आंदोलन से राज्य बनने तक की बदलती उम्मीदें

बिष्ट कहते हैं कि 1993 और 1994 का दौर उत्तराखंड आंदोलन का चरम था. लोगों को लगता था कि अपना राज्य बनने से संसाधनों पर स्थानीय नियंत्रण होगा और शिक्षा तथा जड़ी बूटी जैसे क्षेत्रों में नई संभावनाएं खुलेंगी. लेकिन राज्य बनने के बाद आंदोलनकारी समाज धीरे धीरे पीछे हट गया और नीति निर्माण ऐसे लोगों के हाथ में चला गया जिन्हें स्थानीय समाज कम जानता था. गांवों के मुद्दे बदलने लगे और पानी जैसे मूल सवाल पंचायतों के एजेंडा से गायब होने लगे. उनके अनुसार, यह बदलाव केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक चेतना में आए परिवर्तन का भी संकेत था.

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फल पट्टी से जमीन बाजार बनने तक का सफर

रामगढ़ और मुक्तेश्वर कभी फल पट्टी के रूप में जाने जाते थे, जहां आड़ू, सेब और अन्य फल पहाड़ की पहचान थे. बिष्ट बताते हैं कि भूमि विकास बैंक के कर्ज और सामाजिक दबाव ने कई छोटे किसानों को जमीन बेचने के लिए मजबूर किया. मंडी व्यवस्था बदलने के साथ कमीशन एजेंटों का दौर शुरू हुआ और किसान अपनी ही उपज का सही मूल्य पाने से वंचित होने लगे. धीरे धीरे जमीन बेचना मजबूरी से चलन बन गया. जिन परिवारों ने शुरुआती दौर में जमीन बेची, उन्होंने कुछ समय तक ऐशो आराम किया लेकिन बाद में आर्थिक संकट और सामाजिक टूटन भी देखी गई. यह बदलाव केवल अर्थव्यवस्था नहीं बल्कि समाज के मनोविज्ञान को भी बदलने वाला था.

बाहरी निवेश और पर्यटन का नया दबाव

जैसे जैसे इस क्षेत्र में आवागमन बढ़ा, दिल्ली, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से निवेशकों का आना शुरू हुआ. बड़े पैसे और चमकदार सपनों के साथ आए लोगों ने स्थानीय युवाओं को जमीन दलाल के रूप में जोड़ा और धीरे धीरे पूरे इलाके की जमीनें खरीदनी शुरू कीं. होटल और रिसॉर्ट बने और वही युवा चौकीदार या केयरटेकर बनकर रह गए. बिष्ट के अनुसार, यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक भी था, जिसने पहाड़ के पारंपरिक जीवन को प्रभावित किया. उनका कहना है कि पहले बाहरी लोग भी आए लेकिन उन्होंने स्थानीय संस्कृति को सम्मान दिया, जबकि नए दौर में तेजी से बदलती पर्यटन संस्कृति ने पर्यावरण और समाज दोनों पर दबाव बढ़ाया.

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पर्यावरण, वन्यजीव और अनियंत्रित विकास

बिष्ट का मानना है कि अनियंत्रित पर्यटन और हेलीकॉप्टर सेवाओं ने वन्यजीवों के व्यवहार को प्रभावित किया है. उनका कहना है कि पहाड़ में आने वाली भीड़ प्रकृति के साथ रहने की संस्कृति नहीं समझती और इसके कारण जंगलों और वन्यजीवों पर दबाव बढ़ता है. वह बताते हैं कि रात दिन चलने वाली हेलीकॉप्टर सेवाओं से वन्यजीवों की नींद तक प्रभावित हो रही है और इससे उनका व्यवहार आक्रामक होता जा रहा है.

बची सिंह बिष्ट रामगढ़ नदी का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि कुछ साल पहले भारी बारिश में यह नदी अचानक आक्रामक हो गई और कई लोगों की जान चली गई. पुल टूटे, घर बह गए और बगीचे उजड़ गए. लेकिन कुछ ही समय बाद वही नदी लगभग सूख गई. उनके अनुसार, निर्माण कार्यों से निकला मलबा नालों में डालने और स्रोतों पर अवैध मोटर लगाने से नदी की प्राकृतिक संरचना टूट गई. गांवों के पास पानी की कमी है जबकि रिसॉर्ट्स में स्विमिंग पूल भरे रहते हैं. यह असमानता पहाड़ में पानी के बाजारीकरण की नई तस्वीर दिखाती है.

बदलती प्राथमिकताओं के साथ खत्म होते नौले

बिष्ट कहते हैं कि गांवों की पंचायतों के एजेंडा में पानी का सवाल पीछे चला गया है. सड़क, सीसी मार्ग और अन्य निर्माण कार्य प्राथमिकता बन गए हैं जबकि जल स्रोतों के संरक्षण पर कम ध्यान दिया जाता है. उनके अनुसार, कानून का व्यवहार भी व्यक्ति की हैसियत के अनुसार बदलता दिखाई देता है, जिससे लोगों का विश्वास कमजोर होता है.

हिमालयी समाज में नौला केवल जल स्रोत नहीं बल्कि सांस्कृतिक व्यवस्था का हिस्सा था. बिष्ट बताते हैं कि नौला बनाने में पत्थर के शिल्पकार, पंचांग जानने वाले पंडित और पूरा गांव शामिल होता था. नौले को जीवंत तत्व माना जाता था और उसके निर्माण में दिशा, समय और प्राकृतिक संकेतों का ध्यान रखा जाता था. आज स्थिति यह है कि कई इंजीनियर भी नौला बनाने की तकनीक नहीं जानते. उन्होंने अपने अभियानों में पुराने नौलों को पुनर्जीवित करने की कोशिश की और बताया कि पारंपरिक ज्ञान के बिना जल संकट का समाधान संभव नहीं.

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जंगल, देवबन और लोक परंपराओं की भूमिका

बिष्ट बताते हैं कि जंगलों को बचाने के लिए लठ पंचायत और देवी पंचायत जैसी परंपराएं थीं. जब कटाई बढ़ जाती थी तो लोग देवी को चिट्ठी लिखकर जंगल को कुछ समय के लिए पवित्र घोषित कर देते थे. इससे लोगों में भय और सम्मान दोनों बना रहता था और जंगल सुरक्षित रहता था. देवबन परंपरा के तहत मंदिरों के आसपास के जंगलों को विशेष संरक्षण मिलता था और वहां से व्यक्तिगत उपयोग के लिए लकड़ी नहीं ली जाती थी.

पहाड़ के गांवों में लोहार, वैद्य और अन्य शिल्पकार सामाजिक ढांचे का हिस्सा थे. इनका सम्मान कम होने के साथ ही पारंपरिक ज्ञान भी कमजोर होता गया. बिष्ट कहते हैं कि यह केवल जातिगत संरचना नहीं बल्कि पारस्परिक निर्भरता का मॉडल था, जिसमें हर व्यक्ति समाज की जरूरत से जुड़ा था. जब यह ढांचा टूटा तो गांवों की सामूहिकता भी कमजोर हुई.

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सरकार, जल नीति और नागरिक जिम्मेदारी

जमीन पर पर्यावरण के लिए तीन दशकों से अधिक समय से काम करने वाले बची सिंह बिष्ट मानते हैं कि हर घर नल जैसी योजनाएं जरूरी हैं, लेकिन इसके साथ वर्षा जल संरक्षण और पारंपरिक स्रोतों की रक्षा भी जरूरी है. उनका सुझाव है कि हर परिवार कम से कम तीन महीने के उपयोग के लिए पानी खुद बचाए. व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर सख्त जल नीति लागू हो और उद्योगों में पानी के फिर से इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जाए. उनके अनुसार, जल संकट केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं बल्कि समाज की भी जिम्मेदारी है.

अंत में उन्होंने कहा कि हिमालय हमेशा सामूहिक प्रयासों की भूमि रहा है और जब भी संकट आया है, समाज ने रास्ता निकाला है. उनका विश्वास है कि अगर समुदाय अपने पानी, जंगल और परंपराओं के साथ रिश्ते को फिर से मजबूत करे तो हिमालय का भविष्य सुरक्षित हो सकता है. अगली पीढ़ियों को बेहतर हिमालय देना आज की पीढ़ी की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)