बाहरी नेताओं पर मेहरबान क्यों है बीजेपी, मोदी-शाह की रणनीति क्या है

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Dharmendra Singh

बिहार में आरजेडी और जेडीयू से आए सम्राट चौधरी पर बीजेपी ने भरोसा जताया है. उन्हें प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया है, जबकि बरसों से पार्टी में जुड़े नेताओं को यह अहम जिम्मेदारी नहीं दी गई. इसी कारण यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि बीजेपी बाहरी नेताओं को इतनी महत्व क्यों दे रही है? दरअसल, बीजेपी की राजनीति को समझें तो लगता है कि पार्टी की मूल धारणा और मूल उद्देश्य देशभर में फैलाव करना और अपना राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करना रहा है. इस दृष्टिकोण के अनुसार पार्टी समय-समय पर अपने संगठनात्मक और रणनीतिक मॉडल में बदलाव करती रही है. कभी विचारधारात्मक विस्तार के रूप में, कभी गठबंधन के जरिए तो कभी सामाजिक समीकरणों के माध्यम से. हाल के वर्षों में दूसरी पार्टियों के धुर विरोधी नेताओं को पार्टी में शामिल करने की परंपरा और तेज हुई है.

बीजेपी का गठन और विस्तार

आरएसएस, जनसंघ और बीजेपी समय-समय पर प्रयोग करती रही है कि कैसे पार्टी मजबूत हो और देश में विस्तार हो. गौर करने की बात यह है कि अपेक्षा के मुताबिक भारतीय जनसंघ ज्यादा विस्तार वाली पार्टी नहीं बन पाई, तो 1977 में जनता पार्टी में विलय का फैसला लिया गया. इस प्रयोग में पहली बार केंद्र में जनसंघ के नेताओं को सत्ता का अनुभव मिला, हालांकि आरएसएस से जुड़ी दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर जनसंघ के नेताओं को जनता पार्टी से अलग होना पड़ा. फिर 1980 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का गठन हुआ. लेकिन 1984 के लोकसभा चुनाव में पार्टी महज दो सीटें ही जीत पाई. इंदिरा गांधी की हत्या से उभरी सहानूभूति की वजह से कांग्रेस की लहर थी, लेकिन इस नतीजे ने बीजेपी को मायूस किया. लेकिन उसने 1989 के चुनाव में 86 सीटें जीत लीं. बीजेपी के ही समर्थन से विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनी. हालांकि 1991 में मंडल कमीशन के मुद्दे पर पार्टी ने समर्थन वापस ले लिया. 

मंडल की राजनीति का मंदिर से मुकाबला

बीजेपी को शुरुआत में ब्राह्मण-बनिया की पार्टी कहा जाता था, लेकिन राम मंदिर आंदोलन और मंडल राजनीति के दौर में पार्टी ने समझा कि देश और राज्यों में सरकार बनाने के लिए सामाजिक आधार का विस्तार जरूरी है. इसी दौरान पिछड़ी जातियों के नेताओं को उभारने का काम शुरू हुआ. इसमें कल्याण सिंह, सुंदरलाव पटवा, विनय कटियार, सुशील मोदी, उमा भारती, शिवराज सिंह चौहान जैसे नेताओं को आगे बढ़ाया गया. इनमें से कई नेता मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री भी बने. इसके साथ ही गठबंधन की राजनीति और विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय समीकरणों के साथ तालमेल बनाकर पार्टी ने अपनी राष्ट्रीय उपस्थिति का विस्तार किया.

इसी का नतीजा रहा कि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र में तीन बार सरकार बनी, लेकिन पार्टी लंबे समय तक पूर्ण बहुमत से दूर रही. यह सवाल बीजेपी और आरएसएस के बड़े नेताओं को भी सालता रहा कि राम मंदिर आंदोलन, गठबंधन राजनीति और सामाजिक विस्तार के बावजूद पार्टी पूर्ण बहुमत क्यों हासिल नहीं कर पा रही थी.

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मोदी-शाह युग में बीजेपी का विस्तार मॉडल

2014 के चुनाव में बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया. सत्ता मिलने से पहले ही पार्टी में बड़े बदलाव दिखाई देने लगे क्योंकि कई राज्यों में संगठन कमजोर था और उम्मीदवारों की कमी थी. इसी दौरान उत्तर प्रदेश में अमित शाह को चुनाव प्रभारी बनाया गया. कई राज्यों में बीजेपी के पास मजबूत उम्मीदवारों की कमी थी. इसलिए रणनीति अपनाई गई कि विचारधारा से जुड़े लोगों, नामी व्यक्तियों और दूसरे दलों के नेताओं को टिकट दिया जाए.

उत्तर प्रदेश में वीके सिंह, सत्यपाल सिंह, जगदंबिका पाल, हेमा मालिनी जैसे कई चेहरों को मैदान में उतारा गया. यह प्रयोग केवल यूपी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बिहार, पूर्वोत्तर, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों में भी अपनाया गया. इसी कारण बीजेपी को 2014 में स्पष्ट बहुमत मिला. यह सिलसिला 2019 में भी जारी रहा और पार्टी का प्रदर्शन बेहतर हुआ, हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी बहुमत से दूर रही.

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केंद्र में अपने लक्ष्य को हासिल करने के बाद अगला पड़ाव राज्यों में विस्तार का था. कई जगहों पर पार्टी कमजोर थी या नेतृत्व की कमी थी. ऐसे में 'ऑपरेशन कमल' जैसी रणनीतियों का उपयोग हुआ. दूसरी पार्टियों के नेताओं को बीजेपी से जोड़ना, विधानसभा में बहुमत साबित करने में जोड़-तोड़ की राजनीति और राज्यसभा चुनावों में क्रॉस वोटिंग जैसी राजनीतिक स्थितियां देखने को मिलीं. इसी क्रम में दूसरे दलों के मजबूत नेताओं को शामिल करना तेज़ और प्रभावी तरीका साबित हुआ. इन नेताओं के पास पहले से जनाधार और संगठन होता है, जिससे पार्टी को नए क्षेत्रों में तेजी से विस्तार मिला.

बीजेपी में बाहरी नेताओं की बहार

असम में हिमंत बिस्व सरमा कांग्रेस से आए और बाद में मुख्यमंत्री बने. इसके पहले असम गण परिषद (एजीपी) से सर्बानंद सोनोवाल भी मुख्यमंत्री बने. बिहार में सम्राट चौधरी ताजा उदाहरण हैं. महज आठ साल पहले पार्टी में शामिल होकर अब वे मुख्यमंत्री हैं. इसके अलावा नित्यानंद राय और रामकृपाल यादव समेत कई नेता भी दूसरी पार्टी से आए हैं.

उत्तर प्रदेश में बसपा से आए ब्रजेश पाठक उपमुख्यमंत्री हैं. रीता बहुगुणा जोशी, आरपीएन सिंह, जितिन प्रसाद, स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान जैसे नेता भी पार्टी में शामिल हुए. कांग्रेस से आए ज्योतिरादित्य सिंधिया केंद्र सरकार में मंत्री हैं, सिंधिया मध्य प्रदेश से चुनाव जीते हैं. महाराष्ट्र में पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे और अशोक चव्हाण जैसे नेता हैं. वहीं बंगाल में सुवेंदु अधिकारी विपक्ष का नेतृत्व कर रहे हैं, जबकि मुकुल रॉय भी टीएमसी से बीजेपी में आए थे. इसके अलावा चंपई सोरेन, विजय बहुगुणा, सतपाल महाराज, बैजयंत पांडा, कैप्टन अमरिंदर सिंह और सुनील जाखड़ जैसे कई नेता भी दूसरी पार्टियों से बीजेपी में शामिल हुए हैं.

कैडर आधारित पार्टी से चुनावी मशीन तक

ऐसे नेताओं को पार्टी में शामिल किया गया जिनकी जीतने की क्षमता हो, राज्य में पकड़ हो, अपनी जाति या समुदाय में प्रभाव हो और प्रदेश में नेतृत्व करने की क्षमता हो. ऐसे नेताओं को पार्टी प्राथमिकता देती है. विपक्ष का आरोप है कि जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप होते हैं, वे बीजेपी में शामिल होने के बाद 'वॉशिंग मशीन' में धुले हुए माने जाते हैं. हालांकि बीजेपी का तर्क है कि पार्टी ऐसे नेताओं को प्राथमिकता देती है जो चुनाव जीतने में सक्षम हों, चाहे वे पुराने कार्यकर्ता हों या नए शामिल हुए चेहरे.

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पहले बीजेपी को एक कैडर-आधारित पार्टी माना जाता था, जहां संगठन और विचारधारा सर्वोपरि थे.'चाल, चरित्र और चेहरा' इसका वैचारिक आधार रहा है, लेकिन अब इस नारे की चर्चा कम होती है. 2014 के बाद पार्टी एक व्यापक चुनावी मशीन के रूप में विकसित हुई, जहां रणनीति, संसाधन और प्रभावशाली चेहरों का संयोजन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

क्यों होती है बीजेपी की आलोचना

इस रणनीति के कुछ नकारात्मक पहलू भी हैं. केंद्र में मजबूत नेतृत्व के कारण पार्टी ऊंचाई पर है, लेकिन भविष्य में नेतृत्व की निरंतरता पर सवाल भी उठते हैं. पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा हो सकता है, खासकर तब जब नए आए नेताओं को तुरंत बड़े पद मिल जाते हैं. इसके अलावा अवसरवाद के आरोप भी लगते हैं और कुछ नेता समय-समय पर पार्टी छोड़ भी देते हैं, जो पार्टी के लिए किरकिरी भी साबित होते हैं. मसलन सत्यपाल मलिक, यशवंत सिन्हा, सुब्रमण्यम स्वामी, शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद ने बीजेपी पर लगातार निशाना साधा है.

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बीजेपी में बाहरी नेताओं का बढ़ता प्रभाव किसी एक कारण का परिणाम नहीं है, बल्कि यह विस्तार, सामाजिक समीकरण, विपक्ष को कमजोर करने और चुनावी सफलता सुनिश्चित करने की बहुस्तरीय रणनीति का हिस्सा है. लेकिन साथ ही यह सवाल भी बना रहता है कि क्या इस प्रक्रिया में विचारधारा और संगठनात्मक संतुलन से समझौता तो नहीं हो रहा.

(डिस्क्लेमर: लेखक राजनैतिक और चुनाव विश्लेषक हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं. उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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