समान नागरिक संहिता: संवैधानिक वादे को हकीकत में बदलने का समय

विज्ञापन
अशोक भान

सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में हुई एक सुनवाई के दौरान CJI की टिप्पणियों के बाद समान नागरिक संहिता (UCC) पर बहस फिर से चर्चा के केंद्र में आ गई है. उत्तराधिकार से जुड़े पर्सनल लॉ में कथित भेदभाव के मामलों की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि एक समान नागरिक संहिता मुस्लिम महिलाओं के साथ गैर बराबरी का असरदार हल हो सकता है.इन टिप्पणियों ने एक बार फिर उस मुद्दे को सामने ला दिया है जो संविधान बनने के समय से ही लंबित है. यह पर्सनल लॉ और समानता के प्रति संविधान की गारंटी के बीच चल रहे विरोधाभास को भी दिखाता है.

समान नागरिक संहिता का विचार नया नहीं है. संविधान बनाने वालों ने इसकी कल्पना की थी और इसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 44 में शामिल किया गया है. अनुच्छेद 44 राज्य को यह निर्देश देता है कि वह भारत के सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की कोशिश करे. हालांकि अनुच्छेद 44 राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों में आता है, इसलिए इसे अदालतें सीधे लागू नहीं कर सकतीं. फिर भी यह इस संवैधानिक सोच को दर्शाता है कि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण जैसे मामलों से जुड़े नागरिक कानूनों को अंततः धार्मिक आधार पर अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के बजाय एक सामान्य कानूनी ढांचे के तहत लाया जाना चाहिए.

UCC के समर्थन में तर्क

समान नागरिक संहिता के समर्थकों का मानना है कि धर्म के आधार पर बने पर्सनल लॉ “राष्ट्र की एकता के खिलाफ” हैं. उनका कहना है कि UCC अलग-अलग समुदायों को एक साझा कानूनी ढांचे में लाकर भारत की एकता को मजबूत करेगा. उनका यह भी तर्क है कि इसका उद्देश्य डॉ. बी. आर. अंबेडकर द्वारा सोचे गए कमजोर वर्गों की रक्षा करना है, जिनमें महिलाएं और धार्मिक अल्पसंख्यक शामिल हैं. साथ ही यह एकता के माध्यम से राष्ट्रीय भावना को भी मजबूत करेगा. अगर यह लागू होता है तो वर्तमान में अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं पर आधारित कानूनों को सरल बनाया जा सकेगा. जैसे हिंदू संहिता कानून, शरिया कानून और अन्य व्यक्तिगत कानून. यह संहिता विवाह, उत्तराधिकार, संपत्ति के हस्तांतरण और गोद लेने से जुड़े जटिल नियमों को सरल बनाकर सभी नागरिकों के लिए एक जैसा कर देगी. इसके बाद एक ही नागरिक कानून सभी लोगों पर लागू होगा, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो.

भारत की मौजूदा व्यक्तिगत कानून व्यवस्था औपनिवेशिक दौर की प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ी हुई है. उस समय अंग्रेजों ने परिवार से जुड़े धार्मिक रीति-रिवाजों में हस्तक्षेप न करने का फैसला किया था. इसलिए हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी और अन्य समुदाय पारिवारिक और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के तहत चलते रहे. शुरुआत में इस व्यवस्था को सांस्कृतिक स्वतंत्रता के नाम पर उचित ठहराया गया था. लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था संविधान द्वारा दी गई समानता की गारंटी से टकराने लगी, खासकर उन मामलों में जहां व्यक्तिगत कानूनों में महिलाओं के साथ भेदभाव करने वाले प्रावधान मौजूद हैं.


मुस्लिम पर्सनल लॉ क्या इस्लामी हैं?

विशेषज्ञों का कहना है कि मुस्लिम व्यक्तिगत कानून पूरी तरह इस्लामी नहीं हैं, बल्कि वे “एंग्लो-मोहम्मडन” कानूनों का मिश्रण हैं, जो औपनिवेशिक दौर में बने थे. दूसरी ओर कुछ हिंदू राष्ट्रवादी इस मुद्दे को अपने कानून की अवधारणा के संदर्भ में देखते हैं, जिसे वे धर्मनिरपेक्ष और महिलाओं-पुरुषों दोनों के लिए समान बताते हैं. 

देश में समान नागरिक संहिता की मांग को धार्मिक नेताओं और समाज के कुछ धर्मनिरपेक्ष वर्गों द्वारा पहचान की राजनीति से जुड़ा हुआ मुद्दा मानकर नकारात्मक रूप से भी देखा जाता है. यही वह तनाव है जिसे सर्वोच्च न्यायालय कई दशकों से बार-बार सामने लाता रहा है. अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम जैसे ऐतिहासिक फैसले से लेकर सरला मुद्गल बनाम भारत संघ और शायरा बानो बनाम भारत संघ जैसे बाद के मामलों तक अदालत ने लगातार कहा है कि लैंगिक न्याय और संवैधानिक समानता सुनिश्चित करने के लिए व्यक्तिगत कानूनों में सुधार जरूरी है. इसलिए मुख्य न्यायाधीश की हाल की टिप्पणियां उसी न्यायिक परंपरा का हिस्सा हैं, जिसमें अदालत विधायिका से कहती रही है कि वह व्यापक कानून बनाकर इस मुद्दे को हल करे.

Advertisement

महिलाओं के साथ गैरबराबरी

समान नागरिक संहिता के पक्ष में सबसे मजबूत तर्कों में से एक लैंगिक समानता का सवाल है. कई व्यक्तिगत कानूनों में अभी भी ऐसे प्रावधान हैं जो विरासत, तलाक या भरण-पोषण के मामलों में महिलाओं को नुकसान पहुंचाते हैं. कई मामलों में महिलाओं को संपत्ति में कम हिस्सा मिलता है, तलाक लेने में कठिन प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है या उन्हें बराबर अभिभावक अधिकार नहीं मिलते. ये असमानताएं भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 15 के तहत दिए गए मौलिक अधिकारों के खिलाफ जाती हैं, जो धर्म, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को रोकते हैं.

न्यायालय की हाल की टिप्पणियां इसी विरोधाभास को उजागर करती हैं. एक ऐसा संवैधानिक लोकतंत्र जो समानता के सिद्धांत पर चलता है, वह अनिश्चित समय तक ऐसी कानूनी व्यवस्थाओं को नहीं बनाए रख सकता जो धार्मिक पहचान के आधार पर नागरिकों के साथ अलग-अलग बर्ताव करती हों. एक समान नागरिक संहिता ऐसा ढांचा दे सकती है जिसमें पारिवारिक मामलों में नागरिकों के अधिकार धार्मिक नियमों के बजाय संवैधानिक सिद्धांतों से तय हों.

Advertisement

राष्ट्रीय एकता का सवाल

लैंगिक न्याय के अलावा, समान नागरिक संहिता राष्ट्रीय एकता को भी मजबूत कर सकती है. भारत की कानूनी व्यवस्था पहले से इस सिद्धांत पर चलती है कि आपराधिक कानून सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होता है, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो. लेकिन पारिवारिक मामलों में नागरिक कानून अभी भी अलग-अलग समुदायों के आधार पर बंटा हुआ है.

एक समान संहिता यह सुनिश्चित करके साझा नागरिकता के विचार को मजबूत करेगी कि सभी लोगों पर समान नागरिक नियम लागू हों. इससे कानून के सामने समानता की संवैधानिक सोच और मजबूत होगी और विविध समाज में साझा नागरिक पहचान को बढ़ावा मिलेगा.

Advertisement

कानूनी जटिलता कम होगी

समान नागरिक संहिता का एक और फायदा कानूनी प्रक्रियाओं का सरल होना है. कई अलग-अलग व्यक्तिगत कानून होने के कारण अक्सर मुकदमों में जटिलताएं पैदा हो जाती हैं, खासकर अंतर-धार्मिक विवाह या उत्तराधिकार विवादों से जुड़े मामलों में. अदालतों को कई बार अलग-अलग कानूनी परंपराओं की व्याख्या करनी पड़ती है और उन्हें एक-दूसरे के साथ संतुलित करना पड़ता है. इससे मुकदमे लंबे चलते हैं और कई बार फैसलों में एकरूपता नहीं रहती. अगर एक स्पष्ट नागरिक कानून ढांचा होगा तो ऐसी उलझनें कम होंगी और कानूनी स्पष्टता बढ़ेगी.


धार्मिक विविधता का सवाल

हालांकि समान नागरिक संहिता को केवल कानूनी सुधार के नजरिए से नहीं देखा जा सकता. यह भारत की सामाजिक और राजनीतिक वास्तविकताओं से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है. इसके आलोचकों का कहना है कि अगर एक समान ढांचा लागू किया गया तो इससे भारतीय समाज की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता कमजोर हो सकती है. उनका तर्क है कि व्यक्तिगत कानून समुदाय की पहचान और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े हुए हैं, जिन्हें संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत सुरक्षा दी गई है.

Advertisement

इन चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. भारत का संवैधानिक ढांचा बहुलवाद यानी विविधता के महत्व को स्वीकार करता है और समानता तथा सांस्कृतिक विविधता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है. इसलिए असली चुनौती यह है कि समानता की कोशिश करते समय वैध सांस्कृतिक परंपराओं को खत्म न किया जाए.

सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस नाजुक संतुलन को स्वीकार किया है. अदालत ने कई बार कहा है कि समान नागरिक संहिता लागू करना न्यायपालिका का काम नहीं बल्कि विधायिका की जिम्मेदारी है. अदालत केवल दिक्कतों की ओर ध्यान दिला सकती है या उन प्रथाओं को रद्द कर सकती है जो मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती हैं. लेकिन एक व्यापक नागरिक संहिता बनाने के लिए राजनीतिक सहमति, विधायी प्रक्रिया और सभी पक्षों के साथ व्यापक चर्चा जरूरी होती है.

तो हल क्या है

समान नागरिक संहिता की दिशा में कदम धीरे-धीरे और संवाद के साथ उठाए जाने चाहिए. इसे अचानक लागू करने के बजाय व्यक्तिगत कानूनों को धीरे-धीरे संविधान के मूल्यों के साथ तालमेल में लाया जा सकता है. पिछले कुछ वर्षों में कई सुधार इस दिशा में हुए भी हैं. जैसे तत्काल तीन तलाक की प्रथा का खत्म होना, हिंदू कानूनों में महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकारों का विस्तार और भरण-पोषण कानूनों की प्रगतिशील व्याख्या. ये उदाहरण दिखाते हैं कि व्यक्तिगत कानूनों में सुधार संभव भी है और जरूरी भी.

अंतिम लक्ष्य केवल एकरूपता लाना नहीं होना चाहिए. उद्देश्य यह होना चाहिए कि ऐसा नागरिक कानून ढांचा बने जो लैंगिक समानता और संवैधानिक सिद्धांतों को ध्यान में रखे. यह ढांचा सभी नागरिकों को समान अधिकार दे और साथ ही वैध सांस्कृतिक विविधता का सम्मान भी करे. गोवा जैसे राज्यों का अनुभव, जहां पारिवारिक मामलों के लिए एक समान नागरिक कानून लागू है, यह दिखाता है कि भारत जैसे बहुलवादी समाज में भी ऐसी व्यवस्था काम कर सकती है.

मुख्य न्यायाधीश की हाल की टिप्पणियों ने एक बार फिर देश को याद दिलाया है कि अनुच्छेद 44 का वादा अभी तक पूरा नहीं हुआ है. संविधान लागू होने के सात दशक से ज्यादा समय बीत चुका है. अब सवाल यह नहीं है कि सुधार जरूरी है या नहीं. असली सवाल यह है कि इसे किस तरह लागू किया जाए. नीति-निर्माताओं के सामने चुनौती यह है कि वे ऐसा कानूनी ढांचा तैयार करें जिस पर व्यापक सहमति बन सके और जो समानता तथा विविधता के बीच संतुलन स्थापित करे.

न्याय, स्वतंत्रता और समानता के आदर्शों पर आधारित संवैधानिक लोकतंत्र में नागरिक कानूनों को अंततः समुदायों की सीमाओं के बजाय व्यक्तियों के अधिकारों को प्राथमिकता देनी चाहिए. अगर समान नागरिक संहिता को संवेदनशीलता और समावेशिता के साथ तैयार किया जाए तो यह इस संवैधानिक आकांक्षा को वास्तविकता में बदल सकती है. इसलिए सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियों को एक और अनसुलझी बहस बनने देने के बजाय उन्हें जानकारीपूर्ण चर्चा और ठोस विधायी कार्रवाई की दिशा में एक अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए.

(डिस्क्लेमर: लेखक सर्वोच्च न्यायालय के एक प्रतिष्ठित वरिष्ठ अधिवक्ता हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

Topics mentioned in this article