मैं धार गया था. शुक्रवार को. पत्रकार के तौर पर... कंधे पर काम का वही पुराना बोझ था... बैटरी चेक, माइक, कॉल-टाइम की याद, और न्यूज़रूम का वह अनकहा नियम कि भीतर जमीन हिलती रहे, पर चेहरे पर स्थिरता बनी रहे. लेकिन कुछ जगहें आपको सिर्फ रिपोर्टर बने रहने नहीं देतीं. वे प्रेस-कार्ड से आगे निकलकर स्मृति के उस सबसे नर्म कोने को छू लेती हैं जहां आस्था रहती है, बचपन रहता है और यह विश्वास भी कि अगर बहुत धीमे से मांगा जाए तो देवी सुन सकती हैं.
धार में भोजशाला मंदिर-कमाल मौलाना मस्जिद परिसर यूँ खड़ा है जैसे कोई वाक्य जिस पर सदियों से बहस चल रही हो. 11वीं सदी का एएसआई-संरक्षित स्मारक, जिसे समय ने घिसकर चिकना कर दिया है और तर्क ने और भी खुरदुरा. हिंदू समुदाय के लिए यह भोजशाला है वाग्देवी माँ सरस्वती का मंदिर, विद्या का आसन, वाणी और विवेक का गर्भगृह. मुस्लिम समुदाय के लिए यह कमाल मौलाना मस्जिद है, दरगाह-सा एक ठिकाना, प्रार्थना और अपनापन. विवाद अदालतों में रहता है याचिकाओं, नक्शों, सर्वे नंबरों, आदेशों के बीच. 'आधिकारिक इतिहास' यहां बार-बार दाखिल होता है, बार-बार लौटता है.
पर जो मैं लिख रहा हूँ, वह आधिकारिक इतिहास नहीं. यह वो है, जो मैंने देखा. और वो भी, जो मैं अपने साथ लौटाकर ले आया.
सुबह 6 बजे ... जब पत्थर भी चुप्पी की साँस लेते हैं
छह बजे धार में एक ऐसी शांति थी जो 'मिली' नहीं लगती कमाई हुई लगती है. आसमान शहर पर एक फीकी-सी चादर की तरह तना था. हवा इतनी ठंडी कि नथुनों में हल्की चुभन हो और इतनी साफ़ कि आदमी को थोड़ी देर के लिए सच्चा बना दे... कोई ड्रामा नहीं, कोई प्रदर्शन नहीं ... बस साँसों की भाप, जो छोटे बादल बनकर उठती और मिट जाती.
सुप्रीम कोर्ट ने इस साल वसंत पंचमी के अवसर पर जुमे की नमाज और सरस्वती पूजा दोनों की इजाजत दी थी. Photo Credit: Anurag Dwary
परिसर तक पहुंचने वाली सड़क पहले से सुरक्षित थी. बैरिकेड ऐसे गड़े थे जैसे वाक्य में विराम-चिह्न. पुलिस के जूते पत्थर पर हल्के से रगड़ खाते... खुरदुरी, स्थिर आवाज़ ...जब सिपाही अपना वजन बदलते, डंडा ठीक करते, कोनों को देखते. कहीं किसी गेट के खुलने और फिर से बंद होने की हल्की-सी आवाज़ ... जैसे मेटल पर टकराने की टिन-टिन और उस सुबह में हर छोटी आवाज़ बहुत करीब सुनाई देती थी, जैसे सन्नाटा आवाज़ों को बढ़ा देता हो.
भीतर हवन की तैयारी चल रही थी. लकड़ियाँ बड़ी सुघड़ता से सजी थीं जैसे किसी छात्र ने कॉपी में सुंदर हैंडराइटिंग के लिए लाइनें तान दी हों. पीतल के पात्र ऐसे बैठे थे जैसे धैर्यवान चाँद चुपचाप, उज्ज्वल, इंतज़ार में. किसी ने धूप जला दी थी धुएँ की पहली पतली रेखा ऊपर उठी, कपूर और घी की गंध लिए और उसमें कोई पुरानी गंध भी थी, जो स्कूल की प्रार्थना सभाओं और ठंडी सुबहों की याद दिलाती है. गेंदा ढेरों में रखा था उसका नारंगी इतना तेज़ कि ठंड के बीच भी गर्म लगता.
लोग एक-दो करके आए. भीड़ की तरह नहीं, भक्तों की तरह. सिर ढँके, हाथ जुड़े, आँखें नीची, कदम धीमे जैसे वे स्मारक की प्राचीन नींद को जगाना नहीं चाहते. एक स्त्री की चूड़ियाँ एक बार खनकीं और फिर चुप हो गईं. पुजारी ने धीमे से कुछ निर्देश दिए. किसी ने एक नाम फुसफुसाया शायद किसी बच्चे का, शायद किसी परीक्षा का, शायद किसी ऐसी चिंता का जो बोलने से पहले ही शर्मिंदा हो जाती है.
मैंने भी अपने हिस्से का प्रणाम किया क्योंकि मुझे नहीं आता कि मैं न करूँ. पत्रकार होते हुए भी, कहानी के एंगल मेरे मन में कैमरा-फ्रेम की तरह चमकते हुए भी, मैं उस देहरी पर झुक गया जहाँ सदियों की आस्था टिककर रही है.
वाग्देवी की मूर्ति यहाँ नहीं है कहते हैं, लंदन के म्यूज़ियम में है. पत्थर को काँच, रोशनी और लेबल में पहुँचा दिया गया है. सरकारें उसे वापस लाने के दावे करती रहीं. लेकिन श्रद्धा सरकारों का इंतज़ार नहीं करती. यहाँ लोग कटआउट को पूजते हैं कार्डबोर्ड की एक सपाट छवि, जो हजार साल की श्रद्धा का प्रतिनिधि बनी खड़ी है.
वसंत पंचमी पर धार की भोजशाला में यज्ञ की तैयारी करते लोग.Photo Credit: Anurag Dwary
और वहीं खड़े-खड़े मुझे एक बात भीतर तक चुभ गई धीमे से, पर गहरे... भक्त के लिए 'असली' मूर्ति हमेशा पत्थर में नहीं होती... कभी-कभी असली मूर्ति मन में गढ़ी जाती है.
सुबह 8 बजे... जब दिन अपना चेहरा बदलने लगता है
आठ बजे तक परिसर भरने लगा. अचानक नहीं... धीरे-धीरे, जैसे पुल के नीचे नदी का पानी चढ़ता है. हवा गरम हुई... धूप से नहीं, शरीरों के आने से. वॉलंटियर तेज़ी से चल रहे थे, निर्देश भीड़ को चीरते हुए जा रहे थे. पुलिस की मौजूदगी अब ज्यादा दिखने लगी हेलमेट, ढालें, और वॉकी-टॉकी, जिन पर कोडेड शब्द खड़खड़ाते थे.
और तब मेरी नज़र एक ऐसी चीज़ पर पड़ी जिसने भीतर का मौसम बदल दिया.
बगल की कमाल मौलाना दरगाह जो पिछली शाम तक दिख रही थी अब टीन की चादरों और सफ़ेद कपड़े से ढकी थी.एक दिन पहले उसकी आकृति दिखती थी उस सुबह वह लिपटी हुई, छुपी हुई थी, जैसे किसी ने इतिहास को कंबल में लपेटकर किनारे रख दिया हो.
सफ़ेद कपड़ा हवा में हल्का-सा सरसराता था नर्म, लगभग स्नेहिल और फिर भी उस सरसराहट में कुछ ऐसा था जो कपड़े से भारी था. टीन की चादरें सुबह की रोशनी में कठोर दिखती थीं सूरज को इस तरह लौटाती हुई जैसे चेतावनी हो.
हो सकता है सुरक्षा हो. हो सकता है एहतियात हो. पर दिल 'हो सकता है' को उस तरह नहीं मानता जैसे दिमाग मान लेता है.
मैं कपड़े की लहर देख रहा था, और मन में एक सुई-सा विचार चुभ गया... कुछ चीज़ें हटाई नहीं जातीं, उन्हें बस दिखाई देना बंद कर दिया जाता है.
और तभी नारे उठे...'जय श्रीराम', बसंत पंचमी के दिन. सरस्वती के आँगन में.
नारा अपने आप में नया नहीं था. मैंने उसे कई जगह सुना है कभी स्नेह से, कभी विजय से.. पर यहाँ यह नारा प्रार्थना जैसा नहीं लगा... यह ऐलान जैसा लगा.
और तभी, अचानक, मेरा बचपन मेरे सामने आ खड़ा हुआ... एक तस्वीर की तरह...
वसंत पंचमी और जुमा इस बार एक ही दिन पड़ा. इसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू समुदाय को सूर्योदय से सूर्यास्त तक पूजा करने और मुस्लिम समुदाय को दोपहर एक बजे से तीन बजे तक नमाज अदा करने की इजाजत दी थी.
Photo Credit: Anurag Dwary
हमारे मोहल्ले की सरस्वती पूजा... बच्चों की बनाई हुई दुनिया
हम सरस्वती पूजा से पहले बेर नहीं खाते थे. यही नियम था. हमारे छोटे ब्रह्मांड में वह किसी शास्त्र से कम नहीं था. हम इंतज़ार करते बच्चों वाली अनुशासन-भक्ति के साथ.
हम सब दोस्त, मोहल्ले के लड़के, थोड़े बड़े भैया एक रात में आयोजक बन जाते. हम माँ की साड़ियाँ 'चुरा' नहीं लेते थे हम उन्हें खुशी की जल्दी में उधार ले लेते थे. वे साड़ियाँ, जो रोजमर्रा की जिंदगी से नरम होती थीं जिनमें घर और साबुन की हल्की खुशबू होती थी उससे हमारी मंदिर की दीवारें बन जातीं. बाँस के खंभों पर उन्हें बाँधकर हम पंडाल खड़ा कर देते घरेलू कपड़े और बचकानी गंभीरता से सिला हुआ एक छोटा-सा देवालय.
फिर चंदा. हम छोटे मंत्री बन जाते पूरा आत्मविश्वास लेकर. हम अंकल-आंटी से बहस करते जैसे देश का बजट तय हो रहा हो. 'दस रुपये लगेंगे, पांच में नहीं होगा!'
कुछ हँसते, कुछ डाँटते, कुछ मोलभाव करते जैसे हम सब्ज़ी बेच रहे हों.
और हम रसीद भी काटते थे. हाँ... रसीद. हमने मां सरस्वती के नाम पर अपनी पूरी अर्थव्यवस्था बना रखी थी.
मोहल्ले के बच्चे बैंक भी थे, कलेक्शन एजेंट भी, सजावट करने वाले भी, आयोजक भी... कभी-कभी पुजारी भी. सब कुछ हम ही करते... समय-सारिणी, प्रसाद, व्यवस्था, भीड़-मैनेजमेंट. हमारे माता-पिता ज्यादा हस्तक्षेप नहीं करते थे. उनका काम बस शाम को आना था, रोशनी से चमकता पंडाल देखना और मुस्कुरा देना... चुपचाप गर्व से, जैसे उन्होंने अपने बच्चों को एक छोटा संसार बनाते देख लिया हो.
हम कभी धर्म नहीं पूछते थे. जाति नहीं पूछते थे. हमें वह विचार ही नहीं आता था. हमारी पहचानें सरल थीं विद्यार्थी, दोस्त, पड़ोसी, बच्चा. हमारी श्रद्धा भी सरल थी साबित करने से ज्यादा, माँगने वाली.
दुर्गा माँ बड़ी माँ थीं शक्तिशाली, रक्षक, अजेय. सरस्वती माँ हमारे लिए 'मौसी' थीं... नर्म, समझाने योग्य, जिन्हें आप तब मनाते हैं जब अपनी माँ परीक्षा की बात सुन-सुनकर थक जाती है.
हम अपनी माँ से बोलते... ''माँ, बस पास करवा दो.'' और अगर माँ नहीं सुनती तो हम मौसी के पास चले जाते ... सरस्वती माँ, प्लीज़… बस इस बार.
मेरे लिए बसंत पंचमी यही थी... बच्चों का त्योहार. विद्यार्थियों का त्योहार. ज्ञान से एक निजी बातचीत.
मध्य प्रदेश के धार के भोजशाला परिसर में ही वाग्देवी माँ सरस्वती का मंदिर और कमाल मौलाना मस्जिद स्थित है.
Photo Credit: Anurag Dwary
और फिर धार के पोस्टर बोलने लगे ...
पर उस दिन धार की दीवारें पोस्टरों से भरी थीं ऐसे पोस्टर जो साफ कहते थे कि यह आयोजन बच्चों या छात्रों के लिए नहीं. शहर की दीवारों की शब्दावली अलग थी दावा, अधिकार, रेखाएँ खींचना. उन शब्दों में धूप-धूप की गंध नहीं थी, कॉपी-किताब की गंध नहीं थी. उनमें सत्ता की गंध थी.
और जब मैं परिसर के भीतर आगे बढ़ा, तो मुझे एक अजीब-सा दुख हुआ. न गुस्सा, न डर बस दुख. जैसे आप अपने बचपन के घर लौटें और देखें कि कमरे किसी अजनबी के लिए फिर से सजाए जा चुके हैं.
मेरे कानों में श्लोक जिद्दी लोरी की तरह चलता रहा...
'या कुन्देन्दु तुषार-हार-धवला या शुभ्र-वस्त्रान्विता
या वीणा-वर-दंड-मंडित-करा या श्वेत-पद्मासन.
या ब्रह्मच्युत शंकर प्रभृतिभिः देवैः सदा वंदिता.
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेष जाड्या पहा.'
और उसका अर्थ मन में उजला होकर उभरता रहा ...
पूजा के स्वर
जिनकी कांति हिम, मुक्ताहार, कपूर तथा चंद्रमा की आभा के समान धवल है, जो परम सुंदरी हैं और चिन्मय शुभ-वस्त्र धारण किए हुए हैं, जिनके एक हाथ में वीणा है और दूसरे में पुस्तक. जो सर्वोत्तम रत्नों से जड़ित दिव्य आभूषण पहने श्वेत पद्मासन पर अवस्थित हैं. जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव प्रभृति प्रधान देवताओं और सुरगणों से सुपूजित हैं, सब श्रेष्ठ मुनि जिनके चरणों में मस्तक झुकाते हैं. ऐसी भगवती सरस्वती का मैं भक्तिपूर्वक चिंतन एवं ध्यान करता हूँ. उन्हें प्रणाम करता हूँ. वे सर्वदा मेरी रक्षा करें और मेरी बुद्धि की जड़ता इत्यादि दोषों को सर्वथा दूर करें.
पंडाल में एक छोटा टेप रिकॉर्डर रहता था, डेक भी कहते थे ... जो कभी-कभी कैसेट को “खा” जाता था, चल जाता तो अनूप जलोटा की आवाज़ सर्दी की रातों में कमरे भर देती थी ...
“हे शारदे माँ… अज्ञानता से हमें तार दे माँ…”
वह स्वर विनम्र था ... जैसे पूजा का असली स्वर होता है.
सनातन परंपरा में वाग्देवी माँ सरस्वती ज्ञान, विद्या, वाणी, संगीत, कला और विवेक की अधिष्ठात्री हैं. वाक् यानी वाणी, देवी यानी दिव्य शक्ति तो वाग्देवी वह चेतना हैं जो शब्द को अर्थ देती हैं और अर्थ को संस्कार. उनका श्वेत स्वरूप शुद्धता और निर्मल ज्ञान का प्रतीक है ... कमल पर बैठना संसार में रहते हुए निर्लिप्तता का संकेत. वीणा सृजन और लय है, पुस्तक शास्त्र और अध्ययन, माला साधना और अनुशासन, और हंस विवेक ... दूध-पानी अलग करने की क्षमता, यानी सत्य को शोर से छाँटने की शक्ति. वेदों में सरस्वती नदी भी हैं, वाणी भी, बुद्धि भी. उपनिषदों में वे प्रज्ञा और बोध की प्रतीक सृष्टि में ज्ञान-प्रवाह की जननी. और सबसे जरूरी वे विवेकपूर्ण वाणी की देवी हैं ... शब्द शस्त्र भी बन सकता है और औषधि भी, इसलिए संयम, सत्य और करुणा अनिवार्य हैं. बसंत पंचमी नए आरंभ का दिन है विद्यारंभ, कला-साधना, और ज्ञान के आलोक में आगे बढ़ने का संकल्प. माँ का संदेश साफ है ... ज्ञान बिना अहंकार, वाणी बिना कटुता, कला बिना विकृति. जहाँ विवेक है, वहाँ सरस्वती हैं ... और जहाँ सरस्वती हैं, वहाँ संस्कृति जीवित रहती है.
पर उस दिन भजनों की जगह नारे थे... और कुछ युवकों के हाथ में गदा ... जैसे सरस्वती के आँगन में किसी और देवता की भाषा बोल दी गई हो.
मैंने पूछा... “भाई, सरस्वती पूजा में गदा क्यों? कलम-किताब क्यों नहीं?”
उन्होंने जवाब नहीं दिया. नारे और तेज़ हो गए...'जय जय श्रीराम!'
और फिर एक पंक्ति, जो बातचीत बंद कर देती है ... ''सारे देवी-देवता एक हैं.''
भोजशाला के एक गुंबद पर की गई नक्काशी.
Photo Credit: Anurag Dwary
सनातन धर्म के रास्ते
सनातन धर्म में यह सवाल बहुत स्वाभाविक है कि जब सत्य एक है तो देवी-देवता अलग-अलग क्यों हैं और उनकी पूजा तथा जयकार भी अलग क्यों होती है. इसका उत्तर सनातन की उसी दर्शनात्मक गहराई में है जो एक को अनेक में देखती है... मूल सूत्र है 'एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति', अर्थात सत्य एक है, ज्ञानी उसे अनेक नामों और रूपों से पुकारते हैं, इसलिए देवी-देवता किसी अलग-अलग प्रतिस्पर्धी सत्ता की तरह नहीं बल्कि एक ही ब्रह्म-चेतना के विविध आयाम हैं, शक्ति जब सृजन करती है तो ब्रह्मा का रूप, जब संरक्षण करती है तो विष्णु का, जब परिवर्तन करती है तो महेश का... वही चेतना जब ज्ञान बनती है तो सरस्वती, जब ऊर्जा और संरक्षण बनती है तो दुर्गा, और जब समृद्धि बनती है तो लक्ष्मी... यह विभाजन टकराव नहीं बल्कि जीवन के कार्यों का एक तरह का कार्य-विभाजन है. फिर हर मनुष्य एक जैसा नहीं होता कोई ज्ञान से जुड़ता है, कोई शक्ति से, कोई करुणा से, कोई भक्ति से. इसलिए सनातन धर्म किसी पर एक ही रास्ता नहीं थोपता, बल्कि हर स्वभाव को उसके अनुरूप ईश्वर से जोड़ने की जगह देता है. विद्यार्थी सरस्वती को, योद्धा दुर्गा या हनुमान को, गृहस्थ लक्ष्मी...नारायण को, और वैरागी शिव को.
इसी तरह अलग पूजा-दिवस भी इसलिए हैं क्योंकि हर देवता प्रकृति के किसी विशेष तत्व और काल-चक्र से जुड़ा है. बसंत पंचमी ज्ञान और नवसृजन के लिए, नवरात्रि शक्ति-जागरण के लिए, महाशिवरात्रि तप और आत्मबोध के लिए, दीपावली प्रकाश और समृद्धि के लिए ताकि मानव-चेतना समय-समय पर जीवन के हर आयाम को याद करती रहे... और अलग जयकार इसलिए कि जयकार किसी देवता की नहीं, उस गुण की होती है जिनके वो प्रतीक हैं.'जय श्रीराम' मर्यादा और धर्म का आह्वान है, 'हर हर महादेव' सत्य और वैराग्य का, 'जय माता दी' शक्ति और संरक्षण का, 'जय सरस्वती' ज्ञान और विवेक का यह अपने भीतर सोई हुई संभावनाओं को जगाने का मंत्र है. यही सनातन की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह कहता है...जिस रूप में तुम ईश्वर को समझ पाते हो, वही तुम्हारा मार्ग है, वह एकता को बलपूर्वक नहीं, स्वीकृति से जोड़ता है, इसलिए यहां विविधता है और वही इसकी ताकत है... सार यही कि देवता अलग नहीं, भूमिकाएं अलग हैं. पूजा अलग नहीं, चेतना के चरण अलग हैं. जयकार अलग नहीं, गुणों का आह्वान अलग है.
सच एक है, पर साधना एक जैसी नहीं होती. सनातन धर्म की गहराई ही यही है कि वह एक सत्य को अनेक रूपों से देखने देता है अनेक स्वभावों के लिए अनेक रास्ते. पर मेरे लाइव के दौरान मैं उसे क्या समझाता? कैमरा एक साउंडबाइट माँगता है, दर्शनशास्त्र का व्याख्यान नहीं. और वह भीड़ सीखने नहीं आई थी वह कुछ और करने आई थी.
तो मैं चुप रहा.
और रिपोर्टिंग में लौट आया.
लेकिन भीतर कहीं कुछ दुखने लगा था.
वह छोटा गेट, वह बड़ा उफान और हवा का गायब हो जाना
हिंदू श्रद्धालुओं के लिए चार गेट बने थे. एक छोटा गेट पुलिस चौकी के पास संकरा, कसा हुआ. हम मीडियाकर्मी वहीं जमा थे, क्योंकि हमें लगा कि एक से तीन के बीच मुस्लिम श्रद्धालुओं को नमाज के लिए उसी रास्ते से अंदर ले जाया जाएगा.
दो से ढाई बजे के बीच हवा फिर बदल गई.
करीब 300 लोग आ गए, ज्यादातर युवा. कुछ काली जैकेट में, कुछ काला चश्मा लगाए एक अजीब-सा 'संगठित उग्रपन.' उनके हाथ में वाग्देवी की फ्रेम वाली तस्वीर थी ऊपर उठी हुई, जैसे सबूत. और वे उसी गेट से अंदर जाने की ज़िद करने लगे.
पुलिस लाइन कसी. अब जूतों की रगड़ पत्थर पर हल्की नहीं रही कठोर हो गई. वॉकी-टॉकी की खड़खड़ाहट बेचैन हो गई. हवा में पसीने, धूल और धूप की मिली-जुली गंध थी और कहीं भीतर से धूप-धूप की मीठी गंध अभी भी बची थी, जो अब तनाव के साथ मिलकर अजीब-सी लग रही थी.
भीड़ आगे धकियाने लगी. गुस्सा उठने लगा. धक्का-मुक्की होने लगी.
मैं और मेरा कैमरापर्सन चबूतरे की ओट में खड़े हो गए. पर भीड़ इतनी बढ़ी कि खुली हवा में सांस लेना भी मुश्किल लगने लगा जैसे आसमान सिकुड़ गया हो. शरीरों की गर्मी भट्टी की तरह उठती थी. सूरज का महत्व नहीं रहा भीड़ ने अपना मौसम बना लिया था.
मैं कूदकर नीचे उतरा, पुलिस वालों के पास पहुंचा. रिज़वान भाई भी नीचे आए कैमरा संभाला और डटे रहे. हम सिर्फ घटना नहीं रिकॉर्ड कर रहे थे हम उस अदृश्य तनाव को भी रिकॉर्ड कर रहे थे जो घटनाओं के भीतर छिपा रहता है.
मुझे उनकी ज़िद समझ नहीं आई. इसी गेट से क्यों? इसी वक्त क्यों?
क्या उन्हें आभास था कि मुस्लिम नमाज़ के लिए यहीं से आ-जा सकते हैं? या यह बस हर रास्ते पर अधिकार जमा लेने की इच्छा थी भौतिक भी,नैतिक भी? और तभी खबर आई मुस्लिम श्रद्धालुओं को पुलिस वैन में नमाज़ के लिए अंदर ले जाया गया है. कैसे, कहाँ से हमें पता नहीं चला.
गेट वहीं रहा. भीड़ वहीं रही. पर मेरे भीतर कुछ चुपचाप ढह गया.
Photo Credit: Anurag Dwary
अफसोस... जैसे धुएँ की तरह भीतर भरता हुआ
एक अफसोस धीरे-धीरे भीतर भर गया धुएँ की तरह. अपने ही देश में, क्या हम 15–20 भाइयों को खुले मन से उस परिसर में स्वागत नहीं दे सकते, जहाँ जाने की अनुमति सर्वोच्च अदालत ने दी? क्या हजारों पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में उन्हें सुरक्षा नहीं दी जा सकती थी? क्या दोनों धर्मों की भक्ति साथ होती अलग-अलग स्थानों पर, अलग-अलग तरीकों से तो सद्भाव में कमी आ जाती?
बाद में आरोप आए... डमी नमाज़, कब्रिस्तान की ज़मीन, अवमानना याचिकाएँ. कानून की भाषा ठंडी धार की तरह लौट आई. कागज़ लौट आया. श्रद्धा फिर मुकदमे में बदल गई.
और हवा भारी हो गई.
मैं मौसम की ठंडक खोजता रहा. बेर की खुशबू खोजता रहा. उस बचपन वाली शांति को खोजता रहा जिसमें सरस्वती पूजा एक निजी बातचीत होती थी ब्रह्मांड से, खुद से, माँ से. पर मुझे वह नहीं मिली.
मैं लौट आया फुटेज के साथ, बयान के साथ, दिन की स्टोरी के साथ. पर साथ में मैं एक सवाल भी लौटा लाया ऐसा सवाल जिसे न्यूज़रूम नहीं पूछता, पर आत्मा छोड़ती नहीं.
जब नमाज़ी पुलिस वैन में जाए, तो वह नमाज़ क्या रह जाती है? जब पूजा 'प्रूफ' बन जाए, तो पूजा किसके लिए रह जाती है? और जब कलम की जगह गदा आ जाए, तो सरस्वती कहाँ बैठती हैं?
बसंत पंचमी फिर आएगी. कैलेंडर फिर पलटेगा. देवी फिर हमारे मन के कमल पर विराजेंगी.
लेकिन मेरे भीतर का वह बच्चा जो माँ की साड़ी से पंडाल बनाता था, जो रसीद काटता था, जो जाति-धर्म नहीं पूछता था, जो बस नंबर माँगता था वह बच्चा हर साल थोड़ा और दूर चला जाता है, जैसे किसी दूर कमरे से आती हुई धुन धीरे-धीरे फीकी पड़ती जाए.
और धार उस दिन बच्चों और छात्रों का त्योहार नहीं था पोस्टरों ने यह साफ कर दिया था.
जब मैं परिसर से बाहर निकला, तो आख़िरी दृश्य वही था कमाल मौलाना दरगाह की बाहरी दीवारों पर पड़ा सफ़ेद कपड़ा. शाम की हवा चली. कपड़ा हल्के से सरसराया जैसे कोई पन्ना पलट रहा हो. नीचे पत्थर चुप थे हज़ार साल पुराने, किसी नारे से बड़े, किसी बहस से गहरे अपनी प्राचीन साँस थामे हुए.
और एक लंबी, जमी हुई सेकंड के लिए मुझे लगा ... जैसे दरगाह कुछ कहना चाहती है…
और वह सफ़ेद कपड़ा उसे गायब होना सिखा रहा है.
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