रघु राय: जिन्होंने अपने कैमरे में भारत की आत्मा को कैद किया

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विवेक शुक्ल

फोटोग्राफर रघु राय का रविवार को निधन हो गया. वो 83 साल के थे. लेकिन उनकी तस्वीरें अमर हैं. ये चित्र न सिर्फ इतिहास के पन्ने हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत भी.रघु राय ने अपने कैमरे से न सिर्फ घटनाओं को दर्ज किया, बल्कि पूरे राष्ट्र की भावनाओं, पीड़ाओं और आशाओं को अमर बना दिया. रघु राय के खान मार्केट के पीछे भारती नगर के ग्राउंड फ्लोर के फ्लैट की दीवारों पर उनकी दलाई लामा, बनारस में गंगा, पालम एयरपोर्ट के करीब के एक गांव के पास विमान के लैंडिंग करते हुए और चांदनी चौक के 1960 के दशक की ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें लगी हुई थीं. उनका विवरण रघु राय बड़े विस्तार से दिया करते थे.

कांग्रेस 1977 में लोक सभा का चुनाव हार गई थी. इंदिरा गांधी भी अपनी सीट नहीं बचा सकी थीं. तब सफदरजंग फ्लाईओवर के आसपास इंदिरा गांधी के फटे पड़े पोस्टर्स को रघु राय ने अपने कैमरे में कैद किया था. उस फोटो को अंग्रेजी अखबार 'स्टेट्समैन' ने छह कॉलम में छापा था. इसी के साथ रघु राय के रूप में देश और दुनिया को एक बेहतरीन फोटो जर्नलिस्ट मिल गया.

रघु राय के फोटो की विशेषता

रघु राय भारतीय फोटोग्राफी की उस परंपरा के प्रतिनिधि थे, जिन्होंने कैमरे को केवल दृश्य दर्ज करने का साधन नहीं, बल्कि समय, समाज और मानवीय संवेदनाओं को समझने का माध्यम बनाया. रघु राय का नाम आते ही भारत के विविध रंग, विरोधाभास और जीवन की जटिलताएं आंखों के सामने उभरने लगती हैं. उन्होंने अपने कैमरे के जरिए भारत को केवल दिखाया नहीं, बल्कि उसे महसूस करवाया. चाहे वह महानगरों की भाग-दौड़ हो, गांवों की सरलता, धार्मिक आस्था की गहराई या राजनीतिक घटनाओं का उथल-पुथल, राय की तस्वीरों में हर विषय एक गहरी मानवीय दृष्टि के साथ सामने आता है.

उनकी फोटोग्राफी की सबसे बड़ी विशेषता थी क्षण की पकड़. वे उस 'निर्णायक क्षण' को पहचानते थे, जब एक साधारण दृश्य असाधारण बन जाता है. उनकी तस्वीरें देखने पर लगता है कि समय कुछ पल के लिए ठहर गया है, ताकि दर्शक उस दृश्य को पूरी तरह आत्मसात कर सकें. यह गुण उन्हें विश्वस्तरीय फोटोग्राफरों की श्रेणी में स्थापित करता है.

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अपने चित्रों की एक प्रदर्शनी में बैठे फोटोग्राफर रघु राय.

रघु राय का करियर उस दौर में शुरू हुआ जब भारत कई सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों से गुजर रहा था. उन्होंने इन परिवर्तनों को नजदीक से देखा और अपने कैमरे में दर्ज किया. 1971 का बांग्लादेश युद्ध, इंदिरा गांधी का राजनीतिक जीवन और विशेष रूप से भोपाल गैस त्रासदी. इन सब घटनाओं की उनकी तस्वीरें इतिहास के दस्तावेज बन चुकी हैं. भोपाल गैस त्रासदी के बाद खींची गई उनकी तस्वीरें केवल एक घटना का रिकॉर्ड नहीं हैं, बल्कि वे मानवीय पीड़ा की ऐसी अभिव्यक्ति हैं, जो आज भी झकझोर देती हैं.

लेखक अरविंद मोहन के मुताबिक रघु राय की तस्वीरों में एक गहरा नैतिक बोध भी दिखाई देता है. वे केवल दृश्य के सौंदर्य तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उसके सामाजिक और मानवीय संदर्भ को भी उजागर करते हैं. यही कारण है कि उनकी फोटोग्राफी में संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता का अनूठा संतुलन मिलता है. वे न तो विषय का शोषण करते हैं और न ही उसे रोमांटिक बनाते हैं; वे उसे उसी सच्चाई के साथ प्रस्तुत करते हैं, जैसा वह है.

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रघु राय के कैमरे में भारत का अध्यात्म

रघु राय ने भारत के आध्यात्मिक जीवन को भी बड़े ही प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया. कुम्भ मेले की उनकी तस्वीरें इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण हैं. लाखों श्रद्धालुओं की भीड़, आस्था का समुद्र और उसमें छिपी व्यक्तिगत कहानियां! इन सबको उन्होंने जिस गहराई से कैद किया, वह अद्भुत है. उनकी तस्वीरें केवल दृश्य नहीं, बल्कि अनुभव बन जाती हैं.

उनकी शैली में एक खास तरह की लय और संरचना दिखाई देती है. वे प्रकाश और छाया का अत्यंत प्रभावी उपयोग करते थे. इससे उनकी तस्वीरों में एक नाटकीयता और गहराई आती थी. इसके साथ ही, वे फ्रेम में मौजूद हर तत्व का सटीक उपयोग करते थे. इससे तस्वीरें संतुलित और अर्थपूर्ण बनती थीं. उनकी रचनात्मक दृष्टि उन्हें केवल एक दस्तावेजी फोटोग्राफर नहीं, बल्कि एक कलाकार के रूप में स्थापित करती है.

रघु राय का योगदान केवल उनकी तस्वीरों तक सीमित नहीं था. उन्होंने भारतीय फोटोग्राफी को एक पहचान दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनके काम ने यह साबित किया कि भारत की कहानियां वैश्विक स्तर पर भी उतनी ही प्रासंगिक और प्रभावशाली हैं. उनकी तस्वीरें कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और प्रदर्शनियों में शामिल हुईं, जिससे भारतीय फोटोग्राफी को वैश्विक मान्यता मिली.

नए फोटो ग्राफरों के प्रेरणास्रोत

उनका जीवन और काम नए फोटोग्राफरों के लिए एक प्रेरणा स्रोत है. उन्होंने यह सिखाया कि फोटोग्राफी केवल तकनीक का खेल नहीं है, बल्कि यह देखने की कला है. उनके काम से यह भी स्पष्ट होता है कि एक फोटोग्राफर को अपने समय और समाज के प्रति सजग और संवेदनशील होना चाहिए.

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रघु राय यह अवश्य बताया करते थे कि वे अपने भाई एस पॉल के मार्गदर्शन में ही फोटोजर्नलिस्ट बने. एस पॉल भी बेजोड़ फोटोजर्नलिस्ट थे. राय के काम में पंजाब हमेशा विशेष स्थान रखता था.'द सिख्स' किताब में उन्होंने सिखों की संस्कृति, गुरुद्वारों की आस्था, विवाह और ग्रामीण नृत्यों को जीवंत रूप दिया. इसमें उन्होंने  खुशवंत सिंह के साथ मिलकर काम किया था.

1984 के ऑपरेशन ब्लू स्टार से ठीक पहले उन्होंने जरनैल सिंह भिंडरावाले की लाजवाब तस्वीरें खींचीं. अकाल तख्त पर भिंडरावाले को 'पाजी' कहकर पुकारते हुए राय ने उनके व्यक्तित्व की जटिलता को दर्शाया. उनकी ब्लू स्टार के बाद की तस्वीरें पंजाब की उथल-पुथल को बयां करती हैं.

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भोपाल गैस त्रासदी की सबसे मारक फोटो

रघु राय का सबसे प्रभावशाली काम 1984 की भोपाल गैस त्रासदी पर है. यूनियन कार्बाइड प्लांट से निकली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस ने हजारों जिंदगियां निगल लीं. राय ने अपनी तस्वीरों से पीड़ितों की कहानियां दुनिया तक पहुंचाई. उनकी प्रसिद्ध तस्वीर 'ब्यूरियल ऑफ अननोन चाइल्ड' देखकर सारा देश रोया था. एक बच्चे का मिट्टी में दवा शव और उसकी खुली आंखें द्योगिक आपदाओं का प्रतीक बन गया. वर्षों बाद भी उन्होंने भोपाल की विषैली मिट्टी और जीवित पीड़ितों की तस्वीरें लीं, जो आज भी न्याय की मांग करती हैं.

दलाई लामा के साथ रघु राय का रिश्ता दशकों तक चला. साल 1975 से 1993 तक उन्होंने दलाई लामा के कई पोर्ट्रेट खींचे.'तिब्बत इन एक्जाइल' पुस्तक में दलाई लामा की शांति, करुणा और निर्वासन की पीड़ा को उन्होंने भावपूर्ण तरीके से उतारा. एक तस्वीर में छत पर खड़े दलाई लामा की छवि आध्यात्मिक नेता की आंतरिक शक्ति दर्शाती है.रघु राय ने उन्हें 'गॉड इन एक्जाइल' कहकर संबोधित किया. इन चित्रों में राजनीति से ऊपर उठकर मानवीय गरिमा झलकती है.

राय के कैमरे ने सिर्फ संकट ही नहीं, भारत की विविधता को भी कैद किया. उन्होंने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद के दृश्य,मदर टेरेसा की सेवा और सत्यजीत रे के विभिन्न चेहरों को भी अमर बना दिया. उनकी हर तस्वीर लाजवाब होती थी.रघु राय ने साबित किया कि फोटोग्राफी सिर्फ कला नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवीय संवेदना का हथियार है. उनके कैमरे ने भारत की आत्मा को कैद किया.

रघु राय का निधन निश्चित रूप से एक बड़ी क्षति है, लेकिन उनका काम हमेशा जीवित रहेगा. उनकी तस्वीरें हमें न केवल अतीत की याद दिलाती हैं, बल्कि वर्तमान को समझने और भविष्य के बारे में सोचने के लिए भी प्रेरित करती हैं. वे हमें यह याद दिलाती हैं कि कला का सबसे बड़ा उद्देश्य मानवता को समझना और उसे बेहतर बनाना है. रघु राय केवल एक फोटोग्राफर नहीं थे, बल्कि वे  ऐसे कथाकार थे, जिन्होंने शब्दों के बिना कहानियां सुनाईं और उन कहानियों को समय की धारा में अमर कर दिया.

(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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