बात 2011 की बात है, जब द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) को विधानसभा चुनाव में ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) ने बुरी तरह हरा दिया था. उस चुनाव में एमके स्टालिन ने अपनी पारंपरिक थाउजेंड लाइट सीट छोड़कर नई बनी कोलाथुर सीट से चुनाव लड़ा. उनके सामने एआईएडीएमके के साईदई दुरासामी थे.यह मुकाबला काफी कड़ा था और ईवीएम को लेकर विवाद के कारण वोटों की गिनती में कई बार देरी हुई. इस दौरान गोपालापुरम स्थित अपने घर में डीएमके प्रमुख एम करुणानिधि काफी चिंतित बैठे थे, क्योंकि अगर स्टालिन हार जाते, तो इसका मतलब होता कि पार्टी के अगले नेता को लोगों ने नकार दिया है. आखिरकार, स्टालिन करीब 27 सौ वोटों से किसी तरह जीत गए. इससे उनके पिता ने राहत की सांस ली, भले ही पार्टी सत्ता से बाहर हो गई थी.
करीब 15 साल बाद, कोलाथुर सीट ने स्टालिन को फिर से चिंता में डाल दिया. सोमवार को पूरे दिन वो गिनती को लेकर परेशान रहे, लेकिन इस बार अंत में कोई अच्छी खबर नहीं आई. स्टालिन अपनी ही सीट हार गए. यह एक मौजूदा मुख्यमंत्री के लिए बहुत बड़ी बात होती है. इससे पहले ऐसा एम भक्तवत्सलम के साथ 1967 और जे जयललिता के साथ 1996 के साथ भी हुआ था.
कितनी बड़ी है स्टालिन की हार
इस चुनाव में तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) के वीएस बाबू ने स्टालिन को 8795 वोटों से हरा दिया. दिलचस्प बात यह है कि बाबू पहले डीएमके में ही थे.वो 2006 में पेरासवक्कम से विधायक रह चुके हैं. स्टालिन का कोलाथुर में हारना केवल एक सीट हारना भर नहीं है. यह उनकी मजबूत नेता वाली छवि को बड़ा झटका है. चुनाव प्रचार के दौरान स्टालिन ने काली शर्ट पहनी, परिसीमन बिल की कॉपियां जलाईं और खुद को तमिलनाडु का एक योद्धा बताया, जो दिल्ली की मजबूत ताकत से लड़ रहा है. लेकिन उन्हें यह एहसास नहीं हुआ कि उनके अपने गढ़ कोलाथुर में ही उनकी जमीन खिसक रही थी.
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अब सवाल यह है कि डीएमके के साथ ऐसा क्या गलत हुआ, जबकि सिर्फ तीन महीने पहले आए कई सर्वे बता रहे थे कि स्टालिन फिर से मुख्यमंत्री बनेंगे और लगातार दूसरी बार जीत हासिल करेंगे. यह कारनामा उनके पिता करुणानिधि भी नहीं कर पाए थे.स्टालिन की इस हार का सबसे बड़ा कारण माना गया बेटे उदयनिधि स्टालिन को उपमुख्यमंत्री बनाना. इससे विरोधियों को परिवारवाद का आरोप लगाने का मौका मिल गया. यह कारण है कि जब डीएमके ने अभिनेता से नेता बने विजय पर हमला करने की जिम्मेदारी प्रकाश राज जैसे लोगों को दी, तो यह बात लोगों को पसंद नहीं आई. पार्टी की यह रणनीति असरदार नहीं रही. जब प्रकाश राज ने पूछा कि विजय ने सत्ता में आने के लिए क्या काम किया है, तो लोगों ने पलटकर सवाल किया उदयनिधि ने ऐसा क्या किया कि उन्हें सीधे दूसरे नंबर का पद दे दिया गया?
दूसरी बड़ी गलती एमके स्टालिन ने यह की कि उन्होंने विजय की लोकप्रियता को कम करके आंका. उन्होंने विजय को कमल हसन जैसा समझा, जिनकी अपील ज़्यादातर शहरों तक सीमित मानी जाती है. जब विजय की रैलियों में भारी भीड़ उमड़ने लगी, तो उसे सिर्फ फैंस की दीवानगी बताकर नजरअंदाज कर दिया गया. लेकिन जब तक डीएमके को समझ आया कि विजय की लोकप्रियता गांव-शहर, जाति, धर्म, महिला-पुरुष और आयु की सीमा से ऊपर जा चुकी है, तब तक पार्टी को काफी नुकसान हो चुका था.
डीएमके के काम न आईं विकास की योजनाएं
स्टालिन को लगा कि उनकी सरकार की योजनाएं (वेलफेयर मॉडल) ही काफी हैं और लोग चौथी बार डीएमके को वोट देंगे. लेकिन इस बार हालात अलग थे. पहली बार एक नई राजनीतिक ताकत मैदान में थी,जो न पैसे देकर वोट ले रही थी, न भीड़ जुटाने के लिए पैसा, शराब या खाना बांट रही थी. खासकर युवाओं को फ्री वाली चीजें पसंद नहीं आईं. उन्हें एआई मंत्रालय, बिना गारंटी के एजुकेशन लोन, नशे के खिलाफ सख्त कार्रवाई और स्टार्टअप के लिए मदद जैसे वादे ज्यादा आकर्षक लगे. जेन जी ने विजय के 'सशक्तिकरण' वाले वादों को पसंद किया और स्टालिन की योजनाओं को ठुकरा दिया.
विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद रोत डीएमके और एमके स्टालिन के समर्थक.
महिलाओं का वोट भी डीएमके से दूर गया, क्योंकि उन्हें लगा कि कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब हो रही है. खासकर ड्रग्स से जुड़े अपराध बढ़ना डीएमके की सबसे बड़ी कमजोरी बन गया. जब स्टालिन ने 'डी-स्टॉक' की बात की, जो पार्टी की द्रविड़ विचारधारा को दर्शाता है, तो आलोचकों ने इसका मजाक उड़ाया. उनके मुताबिक 'D' का मतलब ड्रग कल्चर हो गया था, जो हर जगह फैलता दिख रहा था. लेकिन इन समस्याओं को दुरुस्त करने की बजाय डीएमके सरकार ने खबरों को दबाने की कोशिश की. मीडिया मैनेजमेंट के जरिए नकारात्मक खबरों को दबाने की कोशिश हुई,जिससे वो खबरें मुख्यधारा या सोशल मीडिया तक न पहुंचें. अब जब डीएमके हार गई है, तो पत्रकार राहत महसूस कर रहे हैं कि अब सरकार की आलोचना करने पर उन्हें डर नहीं लगेगा. यह बाकी राज्यों की सरकारों के लिए भी एक बड़ा सबक है.
रणनीति के मामले में डीएमके ने वही पुराना तरीका अपनाया, जो पहले चुनावों में काम करता रहा था. पार्टी बार-बार मतदाताओं को यह कहकर डराने की कोशिश करती रही कि अगर एआईएडीएमके और बीजेपी साथ आए, तो चेन्नई पर दिल्ली का नियंत्रण हो जाएगा. लेकिन इस बार यह बात लोगों को प्रभावित नहीं कर पाई, क्योंकि वोटर अब डीएमके-एआईएडीएमके के पारंपरिक मुकाबले से आगे बढ़ चुका था और नई पार्टी को भी विकल्प के रूप में देखने लगा था.
क्या डीएमके ने उम्मीदवारों के चयन में गलती की
एमके स्टालिन ने 20 से ज्यादा पार्टियों को अपने गठबंधन में शामिल किया. इसे एक उदार नेता की छवि के रूप में पेश किया गया, लेकिन असल में यह एक तरह की सुरक्षा नीति थी. आखिर में ये सहयोगी ज्यादा असर नहीं दिखा पाए. उम्मीदवारों का चयन भी एक बड़ी गलती रहा. उदाहरण के तौर पर कटपड़ी सीट पर डीएमके ने 87 साल के दुरई मुरुगन को फिर से टिकट दिया, जो हार गए.वहीं टीवीके ने उनके खिलाफ डॉक्टर एम सुधाकर को उतारा, जो एक नया विकल्प बनकर सामने आए. डीएमके के समर्थकों ने विजय के समर्थकों को 'थरकुरी' (यानी बेवकूफ) कहा, लेकिन हकीकत यह रही कि टीवीके से कई पढ़े-लिखे और प्रोफेशनल लोग जीतकर आए.
एम के स्टालिन को कोलाथुर में मिली हार से उनकी बड़े नेता वाली छवि को धक्का लगा है.
तमिलनाडु की राजनीति में हार-जीत नई बात नहीं है. स्टालिन इसके आदी भी हैं. लेकिन 2026 की हार ऐसे समय पर आई है जब वे सत्ता में वापस आकर अपने बेटे उदयनिधि स्टालिन को आगे बढ़ाना चाहते थे. अब स्थिति यह बनती दिख रही है कि विधानसभा में एक तरफ मुख्यमंत्री विजय होंगे और दूसरी तरफ विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन.आखिर में, एक बात बहुत साफ है, तमिलनाडु की राजनीति में सिनेमा का असर बहुत गहरा है. यहां राजनीति और फिल्में एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं.
तमिलनाडु एक सिनेमा है.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है. )














