ईरानी लड़कियों के सीने में जलती है एक आग

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प्रियदर्शन

ईरान में जो प्रदर्शन चल रहे हैं, उनमें ईरानी लड़कियों की भूमिका देखकर दुनिया हैरत में है. वे दमन और उत्पीड़न की परवाह किए बिना, अपने कटे होंठों से बहते लहू के साथ मोर्चे पर हैं- आगे बढ़ रही हैं, ईरान को बदलने की बात कर रही है. वैसे ईरान में लड़कियों की यह जुझारू भूमिका नई नहीं है. 2022 में  हिजाब विरोधी प्रदर्शनों के दौरान माहसा अमीनी की मौत के बाद जो चिनगारी भड़की, उसमें ईरानी लड़कियां बाक़ायदा अपने हिजाब की होली जलाती हुई उसके चारों ओर नाचती नज़र आई थीं. 

माहसा अमीनी

यह जज़्बा हमें इसलिए चौंकाता है कि अमूमन यह मान लिया जाता है कि इस्लामी दुनिया में औरतों पर बहुत सारी पाबंदियां होती हैं, उन्हें घर से निकलने की अमूमन इजाज़त नहीं होती. हालांकि यह सिर्फ़ इस्लामी दुनिया का नहीं, एशिया के बड़े हिस्से का सच है. बल्कि हिंदुस्तान से शुरू करें तो पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, अरब देशों, इराक-ईरान और यहां तक कि तुर्की और एशिया के बाहर मिस्र तक की जो पारंपरिक पारिवारिक संरचना है, वह पितृसत्तात्मकता की अवधारणा पर है जिनमें औरतें सिद्धांत और व्यवहार दोनों रूपों में अपने घर के पुरुषों पर आश्रित हैं. 

सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में महिलाएं खामेनेई की तस्वीरों को सिगरेट से जलाती दिख रही हैं.

लेकिन इसके समानांतर एक सच यह भी है कि इन पारंपरिक समाजों के भीतर भी स्त्रियों ने अपने संघर्ष से अपनी अलग जगह बनाई है- भारत के स्वाधीनता आंदोलन की बात करें या आज़ादी के बाद चलने वाले कई तरह के संघर्षों की- स्त्रियों की इनमें बड़ी भूमिका रही है. ईरान की लड़कियां भी अपने पारंपरिक दबावों से बाहर आकर सड़कों पर अपने हिस्से की लड़ाई लड़ती रही हैं, जिससे मानवीय संघर्षों के बहुत संवेदनशील दृश्य बनते हैं.

ईरान की लड़कियों के साथ एक और त्रासदी रही है. एक दौर में ईरान राजनीतिक-सामाजिक तौर पर बेहद खुला समाज रहा. खासकर जिसे पहलवी युग कहते हैं, उस समय वहां की लड़कियों ने बिल्कुल आधुनिक, बराबरी का जीवन जिया. शायद यह वह समय था, जब ईरानी लड़कियां एशिया के अन्य देशों की लड़कियों के मुक़ाबले ज़्यादा आधुनिक पोशाकों में दिखती थीं, पढ़ाई करती थीं और हर काम में अपने समाज के मर्दों के बराबर थीं. यह दरअसल ईरान को आधुनिक बनाए रखने की शाह रज़ा पहलवी की कोशिश का नतीजा था. 

ईरान की महिलाओं ने 2022 में अपने बाल काटकर और स्कार्फ जलाकर प्रदर्शन किया था

लेकिन शाह रज़ा पहलवी कुछ इस आधुनिकतापसंदगी और कुछ अमेरिकापरस्ती की वजह से धीरे-धीरे अलोकप्रिय होता चला गया. सत्तर के दशक में वहां की राजशाही के ख़िलाफ़ जो आंदोलन चला, उसमें तीन तरह की ताक़तें शामिल थीं- एक तरफ़ लोकतंत्र समर्थक और अमेरिका विरोधी ज़मातें थीं, दूसरी तऱफ़ कम्युनिस्ट थे और तीसरी तरफ़ इस्लामपरस्त घटक थे. 

हिंदी की वरिष्ठ लेखिका नासिरा शर्मा के उपन्यास 'सात नदियां एक समंदर' में- जो बाद में 'बहिश्ते ज़हरा' के नाम से छपा- ऐसी सात लड़कियां हैं, जो अलग-अलग विश्वासों के साथ इस आंदोलनकारी समय में हैं और इस लड़ाई में हिस्सेदार भी हैं. वह उपन्यास बताता है कि सत्तर के दशक तक वे लड़कियां कितनी आज़ादी भरा जीवन जी रही थीं.

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लेकिन 1979 की क्रांति हुई, राजशाही का तख़्तापलट हुआ और हुकूमत इस्लामवादी ताक़तों के हाथ में चली आई. इसकी सबसे पहली गाज़ ईरान की आधुनिकता, तरक़्क़ीपसंदगी और औरतों की हैसियत पर गिरी. उन पर तमाम तरह की पाबंदियां लाद दी गईं.

फिर भी ईरान की लड़कियों ने लड़ना नहीं छोड़ा. अपनी तरह से अपने रास्ते निकालती रहीं. 2003 में शांति का नोबेल पुरस्कार जीतने वाली ईरानी सामाजिक कार्यकर्ता शीरीं इबादी इसी की मिसाल हैं. साठ के दशक में उन्होंने तेहरान विश्वविद्यालय से लॉ की पढ़ाई पूरी की और 1969 में वहां जज बनीं. लेकिन 1979 के बाद वहां महिलाओं से जज होने का अधिकार छीन लिया गया. जिस कोर्ट में वे जज होती थीं, वहीं उन्हें क्लर्क बनने का प्रस्ताव दिया गया. बाद के वर्षों में शीरीं इबादी अपनी लड़ाई लड़ती रहीं. उन्होंने विश्वविद्यालय में लॉ पढ़ाना शुरू किया. उन्होंने सुधारवादी नेता मोहम्मद खातमी के चुनाव अभियान में भी हिस्सा लिया जो कई मामलों में उदार माने जाते थे. बाद में उन्होंने अदालतों में वकालत का हक़ भी हासिल किया और कई अहम मुक़दमे जीते. 

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तो ईरान में दबाई जाने वाली और न दबने वाली लड़कियों की एक रवायत रही है. ईरान समर्थक एजेंसियों का अब भी दावा है कि ईरानी लड़कियां पढ़ाई-लिखाई, सेहत या अन्य कई पैमानों पर दूसरे देशों की लड़कियों से बेहतर हैं, लेकिन यह सच है कि वहां लड़कियों के उत्पीड़न के मामले भी बेशुमार हैं. 2019 की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि वहां जो हत्याएं होती हैं, उनमें तीस फ़ीसदी हत्याएं झूठी शान के नाम पर लड़कियों और औरतों की होती हैं. 2022 में यह ख़बर आई कि बहुत सारी लड़कियों को ज़हर दे दिया गया ताकि वे स्कूल न जा सकें. 

एक दौर में ईरान की महिला खिलाड़ियों ने अलग-अलग खेलों में अपना परचम लहराया, लेकिन 1981 में उनका स्टेडियमों में जाना ही प्रतिबंधित कर दिया गया. हालांकि इसके ख़िलाफ़ भी अलग-अलग समय पर वे आंदोलन करती रही हैं. 2018 में तेहरान में दो क्लबों के बीच एक फुटबॉल मैच के दौरान 35 ईरानी लड़कियां स्टेडियम के बाहर पहुंच गईं और उन्होंने मांग की कि उनको स्टेडियम में दाख़िल होने दिया जाए. कई बार ये लड़कियां पुरुषों जैसे कपड़े पहन, दाढ़ी-मूंछ लगाकर भी खेल देखने पहुंचती रही हैं.

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अज़ार नफ़ीसी

ये ईरानी लड़कियों का जज़्बा है. इस जज़्बे की एक और गवाही अज़ार नफ़ीसी की किताब 'रीडिंग लोलिता इन तेहरान: अ मेमॉयर इन बुक्स' देती है. अज़ार नफ़ीसी ईरानी क्रांति के बाद 1987 तक ईरान में रहीं, हिजाब पहनने से इनकार करने पर उन्हें तेहरान विश्वविद्यालय में पढ़ाने से रोक दिया गया. फिर उन्होंने अपनी सात छात्राओं के साथ एक बुक क्लब बनाया जो हर हफ़्ते उनके घर जुटती थीं और पश्चिमी दुनिया की किताबें पढ़ती थीं. तो खिड़कियों के बाहर पाबंदी की घुटन थी और भीतर जेन ऑस्टिन से लेकर नाबोकोव तक के शब्द इन लड़कियों के भीतर एक उजाला भरते थे.

तो ईरान की ये औरतें कई मामलों में ख़ुदमुख्तार हैं. वे लिखती रही हैं, लड़ती रही हैं, फिल्में बनाती रही हैं. समीरा मखमलबाफ़, पेगा अहंगरानी, बाबर इब्राहिम, नाहिद हसनज़ेदा जैसी कई फिल्मकार हैं जिन्होंने ईरान की लड़कियों की तकलीफ़ को फिल्मों और डॉक्युमेंट्री में ढाला है. याद कर सकते हैं कि ईरान का सिनेमा दुनिया के महानतम सिनेमा में गिना जाता है. 

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ईरान की यही औरतें वहां की लड़ाई में हमेशा अगुवा रही हैं. दुर्भाग्य से फिलहाल वहां जो असंतोष है, उसकी वजह वहां के आर्थिक हालत भी है जिसके लिए अमेरिकी पाबंदियां ज़िम्मेदार हैं. लेकिन वही अमेरिका अब इन आंदोलनकारियों का मसीहा दिखने की कोशिश कर रहा है. यह एक लोकतांत्रिक आंदोलन को एक तरह से अवैध बना डालना है. दूसरी तरफ़ पुरानी राजशाही लपक कर इस आंदोलन को शाह-समर्थक साबित करने में लगी हुई है. जबकि सच यह है कि ईरान का असंतोष अमेरिकी पाबंदियों और ईरानी बंदिशों से पैदा हुआ है और जो लोकतांत्रिक हवा इस जकड़न को तोड़ सकती है, उसे प्रदूषित होने से बचाना है तो अमेरिका और शाह की संततियों- दोनों को इससे दूर रहना होगा.

ईरान का मौजूदा हाल इसलिए भी मायूस करता है कि वह एक बड़ी सांस्कृतिक धरोहर वाला देश रहा है. ईरान और इराक के आंगन से- दजला-फुरात के मैदानों से- दुनिया की महान कहानियां निकली हैं. वहां रूमी हुए, राबिया हुईं, फिरदौसी हुए, सादी और उमर खय्याम हुए- कई और बड़े कवि हुए. लेकिन ईरानी औरत के जज़्बे को सबसे ख़ूबसूरती और ज़िंदादिली से बयान करती है सीमीं बेहबहानी की कविता. 2014 में गुज़र गई इस कवयित्री को ईरान की शेरनी कहा जाता था. उनकी एक कविता है- 

‘मेरे देश, मैं तुम्हें फिर से बनाऊंगी 
ज़रूरत पड़ी तो अपनी जिंदगी से बनी ईंटों से 
मैं तुम्हारी छत को सहारा देने के लिए खंबे बनाऊंगी 
अगर ज़रूरत पड़ी तो अपनी हड्डियों से 
मैं फिर से तुम्हारे फूलों की वह खुशबू अपने भीतर उतारूंगी 
जिसे तुम्हारे नौजवान पसंद करते हैं 
मैं फिर तुम्हारे जिस्म से लहू धोऊंगी 
अपने आंसुओं की धार से 
एक बार फिर अंधेरा इस घर से दूर होगा 
मैं हमारे आकाश के नीले रंग से रंग दूंगी अपनी कविताएं 
‘पुरानी हड्डियों' को फिर से जिलाने वाला 
मुझे बख़्शेगा इनाम में 
अपने इम्तिहानों की इस ज़मीन पर एक पहाड़ की भव्यता 
भले ही मैं बूढ़ी हो जाऊं 
लेकिन मौक़ा मिलते ही सीखूंगी 
अपनी संततियों के साथ शुरू करूंगी अपनी दूसरी तरुणाई 
मैं ‘मोहब्बत और मुल्क' की हदीथ का पाठ करूंगी 
इस तीव्रता से कि हर शब्द ज़िंदा हो उठे 
मेरे सीने में अब भी जलती है एक आग 
जो उस भाईचारे की गर्माहट कम नहीं होने देती 
जो मैं अपने लोगों के लिए महसूस करती हूं 
एक बार फिर मुझे तुमसे ताक़त मिलेगी 
हालांकि मेरी कविताएं लहू में बस चुकी हैं 
एक बार फिर मैं तुम्हें बनाऊंगी अपना जीवन देकर 
भले ही ये मेरे साधनों के बाहर हो.'

यह कविता सीमीं बेहबहानी ने ‘फ़ारसी क़िस्सागोई की पहचान' सीमीं दानेश्वर को समर्पित की है- लेकिन जैसे इसमें ईरानी लड़कियों का जज़्बा बोलता है.

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