भारत रूस से अपने आपसी व्यापार को निकट भविष्य में सालाना 100 अरब डॉलर करना चाहता है. इस बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर भारत के रुख को स्पष्ट कर चुके हैं. इस बीच, दुनिया में भू-राजनीतिक तनाव और युद्ध के कारण व्यापार के रिश्ते तेजी से बदल रहे हैं. इसी बदलाव के बीच रूस भारतीय निर्यातकों के लिए एक साथ बड़ा मौका और एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है.
भू-राजनीतिक बदलाव और रूसी बाजार
पश्चिमी कंपनियां यूक्रेन युद्ध के बाद रूस से दूर हो गई हैं. इससे वहां मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाइयां, रसायन, कपड़ा, खाद्य उत्पाद, इंजीनियरिंग सामान और औद्योगिक उपकरणों की भारी कमी हो गई है. रूसी खरीदार अब भारतीय आपूर्तिकर्ताओं को सक्रिय रूप से बुला रहे हैं. कम प्रतिस्पर्धा, अच्छी मांग और ज्यादा मुनाफे की संभावना साफ नजर आ रही है. वाणिज्य मंत्रालय के जानकारों के मुताबिक, इस आकर्षण के पीछे एक गंभीर मसला भी छिपा है. प्रतिबंधों का जाल, भुगतान में आने वाली परेशानियां, छिपे हुए अंतिम उपयोगकर्ता और प्रतिष्ठा को लगने वाला लंबा नुकसान किसी भी निर्यातक को भारी पड़ सकता है. रूस भारतीय निर्यातकों के लिए दोनों चीजें एक साथ हैं- अवसर भी और चुनौती भी. सवाल यह है कि समझदारी और सावधानी के साथ फायदा उठाया जाए या जल्दबाजी में सब कुछ गंवा दिया जाए.
भारत-रूस व्यापार के आंकड़े
भारत-रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार वित्त वर्ष 2024-25 में रिकॉर्ड 68.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया. भारतीय निर्यात करीब 4.9 अरब डॉलर रहा, जबकि आयात जो मुख्य रूप से तेल, पेट्रोलियम उत्पाद, खाद और अन्य वस्तुओं से बना है- 63.8 अरब डॉलर रहा. दोनों देशों ने 2030 तक 100 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार लक्ष्य तय किया है.
भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने 23 मार्च 2026 को कहा था,''दोनों पक्ष वर्तमान वार्षिक व्यापार को 68.7 अरब डॉलर से बढ़ाकर 2030 तक 100 अरब डॉलर तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं, लेकिन संतुलित तरीके से.'' उन्होंने गैर-टैरिफ बाधाओं, नियामक अड़चनों को दूर करने, भारत की कुशल कार्यशक्ति का लाभ उठाने और भारत-यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन मुक्त व्यापार समझौते की प्रगति पर जोर दिया.
भारत-रूस व्यापार का लक्ष्य
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पांच दिसंबर 2025 को बहुत आशावादी स्वर में कहा था कि भारत और रूस को 2030 तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा. वे इससे पहले ही 100 अरब डॉलर के लक्ष्य को पार कर सकते हैं. उन्होंने रूस से ज्यादा निवेश आमंत्रित किया और दोनों देशों के आर्थिक संबंधों में चल रही तेज रफ्तार को रेखांकित किया.
रूस में भारत के राजदूत विनय कुमार ने भी भरोसा जताते हुए कहा था,''भारत और रूस 2030 तक 100 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहे हैं. 2030 तक यह लक्ष्य हासिल करना पूरी तरह संभव है.'' उन्होंने उर्वरक, कृषि, इंजीनियरिंग क्षेत्र में नई वस्तुओं के जरिए व्यापार को बढ़ाने और दोनों देशों की अपनी मुद्राओं के ज्यादा उपयोग पर जोर दिया.
यह बढ़ता व्यापार भारतीय निर्यातकों को स्वाभाविक रूप से आकर्षित कर रहा है. जब हम रूस से इतना ज्यादा सामान खरीद रहे हैं तो निर्यात बढ़ाकर संतुलन क्यों न बनाया जाए? लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना बहुत जरूरी है. जानकार मानते हैं कि 2022 के बाद रूस एक सामान्य बाजार नहीं रहा. सामान अक्सर सिविलियन उपयोग के नाम पर भेजा जाता है, लेकिन मध्यस्थों के जरिए उसे दूसरी दिशा दी जा सकती है. भुगतान घुमावदार रास्तों से होता है और अंतिम उपयोगकर्ता अक्सर छिपे रहते हैं.
अमेरिकी प्रतिबंध और भारतीय संसद की प्रतिक्रिया
30 अक्टूबर 2024 को अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (OFAC - Office of Foreign Assets Control) ने रूस-यूक्रेन युद्ध से जुड़े प्रतिबंधों के उल्लंघन के आरोप में 21 भारतीय संस्थाओं (19 कंपनियां और दो व्यक्तियों) पर प्रतिबंध लगा दिए. भारत सरकार ने इन घटनाओं पर गंभीरता से संज्ञान लिया. संसद में इस मुद्दे पर औपचारिक चर्चा हुई. 28 नवंबर 2024 को राज्यसभा में अनस्टार्ड प्रश्न संख्या 412 के जवाब में विदेश मंत्रालय के राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने पुष्टि की कि 21 भारतीय संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाए गए हैं. 20 दिसंबर 2024 को लोकसभा में अनस्टार्ड प्रश्न संख्या 4252 के तहत कांग्रेस के मनीष तिवारी के प्रश्न के जवाब में भी विदेश मंत्रालयने यह पूरी जानकारी दी थी. सितंबर 2025 में अमेरिकी उद्योग और सुरक्षा ब्यूरो ने एक भारतीय कंपनी को अपनी काली सूची में डाल दिया क्योंकि वह अमेरिकी मूल की वस्तुएं रूस भेज रही थी और अंतिम उपयोग की जांच में बाधा डाल रही थी. ये उदाहरण साफ बताते हैं कि भारतीय कंपनियों को सोच-समझकर रूस के साथ काम करना होगा.
इस बीच, कम जोखिम वाले उपभोक्ता सामान, कुछ दवाइयां और खाद्य उत्पाद सामान्य सावधानी के साथ भेजे जा सकते हैं. भारत एकतरफा प्रतिबंधों को मान्यता नहीं देता और अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देता है. जैसा कि राजदूत विनय कुमार ने 2025-26 में कहा था कि भारत अपने 1.4 अरब नागरिकों की सेवा के लिए जहां से बेहतर सौदा मिले, वहां से सामान खरीदेगा. जानकार कहते हैं कि निजी क्षेत्र के लिए संदेश बहुत स्पष्ट है. ड्यू डिलीजेंस सिर्फ इनवॉइस या बुनियादी रजिस्ट्रेशन जांच तक सीमित नहीं होनी चाहिए.
विदेश मंत्री जयशंकर कह चुके हैं कि भारत रूस के साथ गहरे और टिकाऊ संबंध चाहता है लेकिन लंबे समय के हितों से कभी समझौता नहीं करेगा. बहरहाल जो निर्यातक सख्त नियमों का पालन करेंगे, वे मौजूदा समय में भी फायदा उठा सकते हैं. जो बिना सोचे-समझे कदम उठाएंगे, वे खुद को नुकसान पहुंचा सकते हैं.
इस बीच, गंभीर भारतीय व्यवसायी रूस को अवसर और परीक्षा दोनों की तरह देखेंगे, जहां सुरक्षित हो वहां लाभ कमाएंगे और पूरे उद्यम को प्रतिबंधों के जाल से बचाकर रखेंगे. बढ़ी हुई जांच के इस दौर में सतर्कता कोई विकल्प नहीं, बल्कि टिकाऊ वैश्विक व्यापार की जरूरी शर्त है.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)














