भारत और यूरोपीय संघ के बीच मंगलवार को हुआ मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) न केवल वैश्विक आर्थिक संबंधों की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है, बल्कि यह भारत की वैश्विक व्यापार रणनीति का भी स्पष्ट संकेत देता है. करीब दो दशक की लंबी बातचीत के बाद हुआ यह समझौता ऐसे समय में सामने आया है जब विश्व अर्थव्यवस्था संरक्षणवाद,भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति-श्रृंखला में अस्थिरता के दौर से गुजर रही है. इस समझौते के तहत दोनों पक्षों ने 95 फीसदी व्यापार को मुक्त व्यापार के दायरे में लाकर विश्व व्यापार के इतिहास में नया अध्याय जोड़ दिया है.जहां यूरोपियन संघ ने अपने सभी 155 सब-सेक्टर में से 144 को भारत के लिए खोल दिया है, वहीं भारत ने संघ के लिए 102 सब-सेक्टर के दरवाजे खोल दिए हैं. इस समझौते की व्यापकता को देखते हुए नेगोशिएटर्स, डिप्लोमैट्स और आर्थिक रणनीतिकारों ने इसे 'मदर ऑफ आल ट्रेड डील्स'बताया है. यह केवल एक द्विपक्षीय वाणिज्यिक समझौता ही नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थयवस्था में ढांचागत बदलाव का सूत्रधार भी साबित हो सकता है, जिसमें बाजार विस्तारीकरण, रेगुलेटरी इंटीग्रेशन, निवेश में बढ़ोत्तरी, वस्तुओं, सेवाओं और उभरते तकनीकी क्षेत्र में रणनीतिक सहयोग शामिल हैं.
शुरुआती बातचीत से ऐतिहासिक समझौते तक
भारत और यूरोपीय संघ (European Union or EU) के बीच औपचारिक कूटनीतिक संबंध 1962 में स्थापित हुए थे. साल 2007 में दोनों पक्षों ने ब्रॉड-बेस्ड ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट एग्रीमेंट (BTIA) के तहत मुक्त व्यापार समझौते पर वार्ता शुरू की. हालांकि, कृषि, ऑटोमोबाइल, बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR), सेवाओं के मुक्त प्रवाह और श्रम-पर्यावरण मानकों जैसे मुद्दों पर मतभेद के कारण 2013 में वार्ता ठप हो गई.कोविड-19 महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध और वैश्विक आपूर्ति-श्रृंखला संकट के बाद 2022 में वार्ता एक बार फिर शुरू हुई. अंत में 2025-26 में यह ऐतिहासिक व्यापक समझौते के रूप में सामने है.
वर्तमान में यूरोपीय संघ, जो कि पूरी दुनिया के जीडीपी का करीब 17 फीसदी प्रतिनिधित्व करता है.ईयू भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. हालिया आर्थिक आंकड़ों के अनुसार 2024-25 में भारत-यूरोपीय संघ द्विपक्षीय व्यापार करीब 120 अरब यूरो (₹10.5 लाख करोड़) तक पहुंच चुका है. ईयू और भारत मिलकर कुल वैश्विक व्यापार में 20 फीसदी का योगदान करते हैं. अभी भारत में करीब छह हजार यूरोपीय कंपनियां काम कर रही हैं. आंकड़ों के मुताबिक, पिछले दस सालों में ईयू और भारत के बीच सामान का व्यापार करीब 90 फीसदी बढ़ा है.साल 2024 में 48.8 अरब यूरो का सामान एक्सपोर्ट किया गया. यह समझौता व्यापार संबंधों में विविधता लाने और अमेरिका और चीन पर निर्भरता कम करने में मदद करेगा. इससे हर साल ड्यूटी में चार अरब यूरो की बचत होगी, क्योंकि भारत यूरोप से आयात होने वाले करीब 97 फीसदी सामान पर टैरिफ कम करने और कुछ मामलों में खत्म करने पर सहमत हो गया है. भारत वर्तमान में अमेरिकी व्यापार नीति के तहत ऊंचे टैरिफ भुगतान प्रावधान जनित समस्या का सामना कर रहा है. ऐसे में यह समझौता अस्थिर भू-राजनीतिक परिदृश्य और अमेरिका द्वारा अनिश्चित व अनियंत्रित व्यापार प्रणाली के बीच भारत के लिए केवल निर्यात बढ़ाने का साधन नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक संतुलन में अपनी स्थिति और भी ज्यादा मजबूत करने का अवसर प्रदान करता है. कहा जा सकता है कि यह समझौता विश्व व्यापार में उथल-पुथल के बीच दोनों साझेदारों के लिए बीमा कवच का काम करेगा.
मुक्त-व्यापार समझौता की शर्तें व संभावनाएं
यह समझौता जरूरी आर्थिक-राजनीतिक परिणाम सुनीश्चित करता है.भारत और ईयू साथ मिलकर करीब दो अरब उपभोक्ता बाजार और वैश्विक जीडीपी के करीब एक चौथाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं, ऐसे में यह समझौता ऐसी आर्थिक व्यवस्था का सृजन करेगा जिसका मुकाबला सिर्फ दुनिया के बड़े ट्रेड ब्लॉक्स ही कर सकते हैं. यह समझौता पारंपरिक टैरिफ कटौती से कहीं आगे का मार्ग तय करता है. प्रगति की संभावनाओं की बात करें तो सेवा क्षेत्र,विशेषकर सूचना प्रौद्योगिकी और व्यावसायिक सेवाओं में भारत की ताकत को भी यह समझौता नई उड़ान दे सकता है. इसके साथ ही, निवेश सुरक्षा और नियामकीय स्पष्टता के प्रावधान यूरोपीय निवेशकों को भारत की ओर आकर्षित करेंगे.
समझौते के बाद खुशी जताते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, यूरोपीय संघ के प्रमुख एंटोनियो लुइस सैंटोस दा कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन.
साल 2000 के बाद से भारत में आने वाले कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में ईयू की हिस्सेदारी 17–18 फीसदी रही है. यह ऐतिहासिक समझौता आर्थिक और भू-राजनीतिक विकास के ऐसे अहम मोड़ पर आया है जब भारत के लिए मांग में विविधता लाना, ग्लोबल वैल्यू चेन में भागीदारी को बढ़ाना और अमेरिका जैसे पारंपरिक बाजारों से पैदा होने वाली अनिश्चितताओं से बचाव करना बेहद महत्वपूर्ण प्रतीत हो रहा है. वहीं दूसरी तरफ यूरोपीय संघ के लिए यह मुक्त व्यापार समझौता विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ दो दशकों के कूटनीतिक संबंध और आर्थिक बातचीत का नतीजा है.
टैरिफ उदारीकरण और मार्केट एक्सेस
इस समझौते की तय शर्तों के तहत यूरोपीय संघ भारत से आयात किए जाने वाले करीब 99 फीसदी उत्पादों पर शुल्क में छूट देगा, जबकि भारत ईयू से आयात होने वाले करीब 96 फीसदी उत्पादों पर चरणबद्ध रूप से शुल्क में कटौती करेगा. उदाहरण के लिए, यूरोपियन ऑटोमेकर्स द्वारा भारत को किए जाने वाले कारों के एक्सपोर्ट पर इंपोर्ट ड्यूटी 110 फीसदी से घटकर करीब 10 फीसदी पर आ जाएगी. भारत भी,अपनी तरफ से, टेक्सटाइल, जेम्स और ज्वेलरी, दवाइयां, रासायनिक उत्पाद और समुद्री उत्पाद जैसे सेक्टर्स में ईयू मार्केट में अपने कूल निर्यात में से 99 फीसदी वस्तुओं पर तरजीह (प्रेफरेंशियल एक्सेस) देने की तरफ देख रहा है. प्रावधानों के मुताबिक़ भारत द्वारा कुल निर्यात के 90.7 फीसदी जिनमें कपड़े, चमड़ा उत्पाद, चाय, कॉफी, ज्वेलरी शामिल हैं, उनपर टैरिफ बिलकुल शून्य कर दिया गया है, जबकि अगले तीन से पांच साल में अतिरिक्त 2.9 फीसदी निर्यात को भी शून्य टैरिफ के दायरे में लाया जाएगा.इसके अलावा पोल्ट्री और स्टील उत्पाद सहित छह फीसदी निर्यात उत्पादों पर लगने वाले शुल्क में विशेष रियायत का प्रावधान रखा गया है. कुछ कृषि उत्पादों और संवेदनशील उत्पाद श्रेणियों, जैसे डेयरी और मुख्य फसलें समझौते के दायरे से बाहर रहेंगी या धीरे-धीरे रियायतों के अधीन रहेंगी, जो दोनों तरफ की घरेलू राजनीतिक संवेदनशीलता को प्रदर्शित करती हैं.वहीं भारत की ओर से यूरोपीय संघ के 49.6 फीसदी निर्यातों पर शून्य टैरिफ लगाए जाने के प्रावधान के साथ उसके 39.5 फीसदी निर्यातों पर पांच, सात और 10 सालों में चरणबद्ध तरीके से टैरिफ लाइन बिल्कुल शून्य किए जाने पर सहमति है. आपसी टैरिफ उदारीकरण का यह स्तर दो प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बीच बाजार पहुंच के निहितार्थ सबसे महत्वपूर्ण विस्तारों में से एक है.
सेवा और निवेश में रियायत
टैरिफ उपायों के अलावा, इस मुक्त व्यापार समझौते में सर्विसेज ट्रेड और इन्वेस्टमेंट के नियम भी शामिल हैं.यह खास तौर पर इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, टेलीकम्युनिकेशन और प्रोफेशनल सर्विसेज जैसे सर्विस सेक्टर में भारत की ताकत के लिए खास है. इस समझौते का मकसद मार्केट एक्सेस प्रोटोकॉल को आसान बनाना और नियामक पारदर्शिता (रेगुलेटरी ट्रांसपेरेंसी) को बढ़ाना है. ये ऐसे उपाय हैं जो यूरोपियन मार्केट में भारतीय सर्विसेज के एक्सपोर्ट को काफी बढ़ा सकते हैं. सर्विसेज के अलावा, इस समझौते में इन्वेस्टमेंट प्रोटेक्शन फ्रेमवर्क भी शामिल हैं, जिन्हें भारत में काम कर रहे यूरोपियन इन्वेस्टर्स के लिए कानूनी तौर पर सही होने की संभावना बढ़ाने के लिए डिजाइन किया गया है. इसका उल्टा भी यह सीमा पार पूंजी प्रवाह (क्रॉस-बॉर्डर कैपिटल फ्लो) को बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम है.
इससे फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (एफडीआई) बढ़ने की उम्मीद है, क्योंकि ईयू भारत के एफडीआई के सबसे बड़े सोर्स में से एक है, जिसमें यूरोपियन कंपनियां निर्माण, तकनिकी, दवाइयां और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्रों में निवेश कर रही हैं. FTA का निवेश सुरक्षा प्रावधान (इन्वेस्टमेंट प्रोटेक्शन प्रोविज़न) नियामक स्पष्टता व निश्चितता और कानूनी सुरक्षा उपाय देने के लिए बनाया गया है, जिससे भारत के ग्रोथ सेक्टर, खासकर क्लीन एनर्जी और उच्च तकनिकी निर्माण (हाई-टेक्नोलॉजी मैन्युफैक्चरिंग) में ज़्यादा यूरोपियन कैपिटल आ सके. हालांकि, बढ़ते व्यापार संबंधों से भारतीय कंपनियों को ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और प्रोसेस्ड फूड जैसे सेक्टर में खासकर यूरोपियन मल्टीनेशनल कंपनियों से बढ़ते कॉम्पिटिशन का सामना करना पड़ रहा है.घरेलू उत्पादकों को प्रतियोगी (कॉम्पिटिटिव) बने रहने के लिए उत्पादकता,गुणवत्ता स्तर और नियमों की अनुपालन क्षमता (कम्प्लायंस कैपेसिटी) बढ़ानी होगी. कॉम्पिटिशन का यह दबाव भारतीय औद्योगिक नीतियों में ढांचागत सुधारों के लिए उत्प्रेरक (कैटलिस्ट) का काम कर सकता है, इससे ग्लोबल वैल्यू चेन और नवाचार संचालित विकास रणनीति (इनोवेशन-ड्रिवन ग्रोथ स्ट्रेटेजीज) में समन्वय को बढ़ावा मिलेगा.
समझौते की चुनौतियां और भविष्य की संभावनाएं
इस बहुप्रतीक्षित समझौते के ऐतिहासिक होने के बावजूद, चुनौतियों से इनकार नहीं किया जा सकता. इसे लागू करने के लिए भारत को व्यापार समझौता के रेगुलेटरी स्टैंडर्ड्स के साथ तालमेल बिठाना होगा, कस्टम्स और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मॉडर्न बनाना होगा, नॉन-टैरिफ रुकावटों को दूर करना होगा, और विशेष व्यापर क्षेत्र खासकर एग्रीकल्चर और ऑटोमोटिव नीतियों में संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए नीतिगत कदम बढ़ाना होगा. इसके अलावा,जैसे-जैसे ईयू कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) जैसी क्लाइमेट पॉलिसीज को लागू करेगा, भारतीय एक्सपोर्टर्स को एनवायरनमेंटल कम्प्लायंस स्टैंडर्ड्स के हिसाब से ढलना होगा जो कार्बन-इंटेंसिव सेक्टर्स में कॉम्पिटिटिवनेस पर असर डाल सकते हैं.यही नहीं ऑटोमोबाइल और प्रोसेस्ड फूड जैसे क्षेत्रों में यूरोपीय कंपनियों से प्रतिस्पर्धा घरेलू उद्योगों के लिए चेतावनी भी है.यह स्पष्ट है कि केवल टैरिफ संरक्षण के सहारे भारतीय उद्योग आगे नहीं बढ़ सकते; उन्हें तकनीक,उत्पादकता और गुणवत्ता में निवेश करना ही होगा. फिर भी, देखा जाए तो यह समझौता वैश्विक पटल के साथ-साथ दोनों आर्थिक शक्तियों के आतंरिक जरूरतों की पूर्ति में महत्वपूर्ण बदलाव सुनिश्चित करता है, जो ग्लोबल ट्रेड में भारत की स्थिति को मजबूत करता है. यह एक ऐसी रणनीतिक साझेदारी को सुनिश्चित करता है जो 21वीं सदी के मध्य तक दोनों साझेदारों के आर्थिक प्रगति को काफी हद तक दिशा प्रदान करता रहेगा.
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