हौसला, ईंधन, बदला: 'धुरंधर' के चश्‍मे से ईरान बनाम इजरायल-अमेरिका की जंग

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निलेश कुमार

सिनेमा के पर्दे पर जब 'धुरंधर' फिल्म का दूसरा पार्ट (Dhurandhar: The Revenge) रिलीज हुआ तो दर्शकों ने देखा कि ताकत सिर्फ हथियारों में नहीं, बल्कि सही वक्‍त पर सही चाल चलने में होती है. आज मिडिल ईस्‍ट यानी पश्चिम एशिया के रणक्षेत्र में जो आग (Middle East War) लगी है, उसे देखकर भी कुछ ऐसा ही लगता है. चाहे अमेरिका हो, इजरायल हो या फिर ईरान हो, यहां भी मामला सही वक्‍त पर सही चाल चलने का है. धुरंधर की तरह यहां भी पुरानी रंजिश, सस्‍पेंस और माइंड गेम्‍स की बिसात पर बिछी दिखाई देती है.

'धुरंधर- द रिवेंज' तो करीब 4 घंटे में खत्‍म हो गई, लेकिन मिडिल ईस्‍ट की आग, बुझने का नाम नहीं ले रही. जरा-सी उम्‍मीद दिखती भी है तो अगले ही पल कभी ट्रंप के बयान से तो कभी ईरान की धमकी से, ये आग फिर धधक उठती है. इसे देखकर लगता है कि मौजूदा समय का बेहद खतरनाक 'क्‍लाइमेक्‍स' चल रहा है.

धुरंधर 2 की स्‍क्रीन पर फिल्‍म की मशहूर लाइन 'हौसला, ईंधन, बदला' देखकर दिमाग इसे मिडिल ईस्‍ट वॉर से जोड़ता है. यहां भी तो आखिरकार जंग ईरान के लिए हौसले की है, अमेरिका के लिए ईंधन की और इजरायल के लिए बदले की. अगर हम इस युद्ध को 'धुरंधर' के चश्मे से देखें, तो कई सवाल उठते हैं. फिलहाल साफ-साफ नहीं दिख रहा कि इस जंग में असली धुरंधर कौन है? वो जो दहाड़ रहा है, या वो जो खामोशी से घेराबंदी कर रहा है?

हौसला: तकनीक बनाम संकल्प

फिल्म 'धुरंधर' में एक बेहद दमदार डायलॉग था- 'मैदान में उतरने से पहले कलेजा लोहे का करना पड़ता है.' मिडिल ईस्ट के रणक्षेत्र में भी ये सच्‍चाई है. ये हौसला केवल दुश्‍मन देशों से घिरे इजरायल पर फिट नहीं बैठता, बल्कि अमेरिका-इजरायल के साथ जंग में काफी कुछ गंवा चुके ईरान के लिए भी उतना ही सही है. ये जंग साबित कर रही है कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि उस 'हौसले' से लड़ा जाता है जो हार मानने को तैयार न हो.

इजरायल का हौसला उसकी 'आयरन डोम', 'डेविड्स स्लिंग' और 'लेजर डिफेंस' जैसी अविश्वसनीय तकनीक में छिपा है. 'धुरंधर' के उस नायक की तरह, जो अकेला ही सौ पर भारी पड़ता है, इजरायल ने अपने चारों ओर तकनीक की एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी है जिसे भेदना लगभग नामुमकिन लगता है. उसका आत्मविश्वास उसकी खुफिया एजेंसी मोसाद की उन सर्जिकल स्ट्राइक्स से आता है, जहां वे दुश्मन के घर के सबसे सुरक्षित कमरे में घुसकर उसे ढेर कर देते हैं. इजरायल के लिए तकनीक सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि उसका अस्तित्व है. वह जानता है कि उसके पास हारने की कोई गुंजाइश नहीं है, इसलिए उसका हौसला हर बार दुगनी मारक क्षमता के साथ पलटवार करता है.

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दूसरी ओर, ईरान का हौसला उसकी सहनशक्ति और 'स्ट्रेटेजिक डेप्थ' में नजर आता है. दशकों के कड़े आर्थिक प्रतिबंधों और अमेरिका जैसी महाशक्ति के भारी दबाव के बावजूद, ईरान का पीछे न हटना दुनिया को चौंका रहा है. धुरंधर के उस किरदार की तरह जिसके पास खोने को कुछ नहीं बचा होता. ईरान ने अपनी ताकत को प्रॉक्सी वॉर और मिसाइल प्रोग्राम के जरिए फैला रखा है. लगाता मिसाइलें दागना इस बात का ऐलान है कि ईरान अब केवल बचाव (Defense) नहीं करेगा, बल्कि वो चुनौती देने का दम रखता है. उसका हौसला उसकी उस विचारधारा में है, जो उसे झुकने के बजाय टूटने के लिए तैयार रखती है.

ईंधन: तेल की राजनीति ही युद्ध का असली ईंधन

सीनियर एनर्जी एक्‍सपर्ट नरेंद्र तनेजा (Narendra Taneja) इस जंग को दुनिया का पहला एनर्जी वॉर बता चुके हैं. ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच चल रहे इस टकराव में 'ईंधन' केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि वो बारूद है जो पूरे मिडिल ईस्ट की आग को हवा दे रहा है.

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ईरान के पास दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस भंडार और चौथा सबसे बड़ा तेल भंडार है. अगर ये जंग नहीं थमती है तो होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) आगे भी बंद रह सकता है और पूरी दुनिया का तेल सप्‍लाई चेन बर्बाद हो सकता है.

इस संघर्ष का दूसरा पहलू एनर्जी इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर को निशाना बनाना है. इजरायल और अमेरिका की रणनीति ईरान की आर्थिक 'कमर' यानी उसके ऑयल टर्मिनल्स और रिफाइनरियों को पंगु बनाने की रही है, ताकि 'ईंधन' के बिना उसकी युद्ध मशीनरी और अर्थव्यवस्था दोनों थम जाएं.

दूसरी ओर, ईरान अपने प्रॉक्सीज के जरिए लाल सागर और खाड़ी देशों के तेल टैंकरों को निशाना बनाकर ये संदेश दे रहा है कि यदि उसका ईंधन नहीं बिका, तो दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा भी खतरे में रहेगी. यहां ईंधन ही वो 'करेंसी' है, जिससे युद्ध की कीमत तय की जा रही है.

अंततः, यह जंग 'भविष्य के ईंधन' और प्रभुत्व की भी है. 'धुरंधर' के चश्मे से देखें तो ये एक ऐसा युद्ध है, जहां टैंकों को चलाने के लिए भी ईंधन चाहिए और दुश्मन को घुटनों पर लाने के लिए उसके ईंधन के सोतों को सुखाना भी एक सबसे बड़ा हथियार है.

बदला: 'धुरंधर' का असली क्लाइमेक्स

इस बार फिल्‍म का टाइटल ही 'धुरंधर 2: द रिवेंज'  रखा गया और फिल्‍म का मोटिव भी यही था- बदला. इस जंग में भी यही दिख रहा. ईरान और इजरायल के बीच दुश्‍मनी सदियों पुरानी है. जंग के दौरान, जब दमिश्क में ईरानी दूतावास पर हमला हुआ, तो ईरान ने 'बदले' का नाम लेकर मिसाइलें दागीं. अमेरिका ने इस जंग में कूदकर जो बवाल खड़ा किया, उसके बाद तीनों ही देशों के लिए ये जंग, बदले की आग में बदल चुकी है.

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'जंग जीतना और जंग को अंजाम तक पहुंचाना, दो अलग बातें हैं.' इजरायल-अमेरिका की जोड़ी के पास बेहिसाब मारक क्षमता है. अमेरिका का 'फ्यूल' (संसाधन और पैसा) इजरायल की मशीनों को चला रहा है. लेकिन ईरान ने इस जंग को एक 'साइकल' बना दिया है- एक ऐसा चक्रव्यूह जिसमें फंसकर अमेरिका भी अब बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ रहा है.

कौन होगा असली 'धुरंधर'?

ईरान और इजरायल-अमेरिका की इस जंग का अंत फिलहाल नजर नहीं आता. ये जंग अब संसाधनों से आगे निकलकर 'अहंकार' की लड़ाई बनती दिख रही है. इजरायल-अमेरिका अपनी ताकत के नशे में धुरंधर दिख रहे हैं, तो ईरान अपनी जिद्द में.

अगर धुरंधर का पैमाना 'एक्शन' और 'इम्पैक्ट' है, तो इजरायल इस जमीनी जंग का हीरो माना जा सकता है, जिसकी स्ट्राइक और तकनीकी श्रेष्ठता उसे अपराजेय दिखाती है. अमेरिका इस जंग में फिलहाल रिटायर्ड धुरंधर दिख रहा, जो अब सीधे लड़ने के बजाय अपनी साख बचाने की कोशिश कर रहा है. वहीं अगर धुरंधर का पैमाना 'धैर्य' और 'बिसात बिछाना' है, तो ईरान एक मंझा हुआ खिलाड़ी है. उसने पूरे क्षेत्र में ऐसा जाल बुना है कि अमेरिका चाहकर भी उसे पूरी तरह खत्म नहीं कर पा रहा.

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फिल्म में तो धुरंधर वही निकलता है जो आखिरी शॉट तक मैदान में टिका रहा. इस जंग में असली 'धुरंधर' वो नहीं, जो सिर्फ हमला कर रहा, बल्कि वो हो सकता है जो ये तय करे कि जंग कब और कहां खत्म होगी. फिलहाल तो अमेरिका क्‍या, कोई देश इस‍ स्थिति में नहीं.

इतिहास में दर्ज हो रहे इस फिल्म का डायरेक्टर कोई इंसान नहीं, बल्कि 'वक्त' है. और वक्त का मिजाज कब बदल जाए, यह बड़े से बड़ा धुरंधर भी नहीं समझ पाता.  इस जंग में जो 'हौसला' दिखाएगा, वही बचेगा, जो 'ईंधन' जलाएगा, वो राख होगा; और जो सिर्फ 'बदला' लेगा, वो खुद के लिए भी तबाही लेकर आएगा.

(डिस्क्लेमर: लेखक NDTV इंडिया में कार्यरत हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का वैचारिक तौर पर सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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