रूस जाकर धोखे का शिकार बनते युवाओं के सपने, कौन सी लालच उन्हें युद्ध में धकेल रही

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विवेक शुक्ला

राजधानी के डिफेंस कॉलोनी के पार्क में आजकल भारतीय सेना के रिटायर अफसर रूस-यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध में शहीद होने वाले भारतीयों की मीडिया में आने वाली खबरों पर चर्चा जरूर करते हैं. केंद्र सरकार ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इस संघर्ष में रूसी सेना के साथ जुड़े करीब 217 भारतीय युवाओं में से 49 की मौत हो चुकी है और छह अभी भी लापता हैं. विदेश मंत्रालय के प्रयासों से 139 युवाओं को वापस लाया गया है, लेकिन बाकी की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है. संसद में भी यह मुद्दा उठ चुका है.

दरअसल यह समस्या सिर्फ युद्ध की नहीं, बल्कि बेरोजगारी, लालच और मानव तस्करी की मिली-जुली कहानी है. ज्यादातर प्रभावित युवा पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और गुजरात जैसे राज्यों से हैं.अधिकतर 20 से 35 साल के नौजवान हैं, जो बेहतर भविष्य की तलाश में विदेश गए, लेकिन वहां पहुंचकर फंस गए.

कैसे शुरू हुआ रूस जाकर फंस जाने का सिलसिला

रूस-यूक्रेन युद्ध फरवरी 2022 में शुरू हुआ था. शुरुआती दिनों में भारतीय छात्र यूक्रेन में फंस गए थे, जिन्हें भारत सरकार ने ऑपरेशन गंगा के तहत सुरक्षित निकाला था. लेकिन धीरे-धीरे कहानी उलट गई. रूसी सेना को सैनिकों की कमी महसूस होने लगी. ऐसे में कुछ एजेंटों ने भारत में सक्रिय नेटवर्क के जरिए युवाओं को रूस बुलाना शुरू किया.

पिछले दिनों चंडीगढ़ में मेरी मुलाकात पंजाब मानवाधिकार आयोग के मेंबर जितेंद्र सिंह शंटी से हुई. उन्होंन मुझे बताया था कि ये एजेंट सोशल मीडिया, व्हाट्सएप ग्रुपों और लोकल कांटेक्ट्स के जरिए संपर्क करते थे. युवाओं को अच्छी तनख्वाह, कम काम और बाद में रूसी नागरिकता का लालच दिया जाता था. ज्यादातर युवा छात्र वीजा या पर्यटक वीजा पर रूस पहुंचे. वहां पहुंचने के बाद उन्हें बताया जाता है कि उन्हें सुरक्षा गार्ड या हेल्पर की नौकरी मिलेगी. लेकिन अनुबंध रूसी भाषा में होते थे, जिसे ये युवा नहीं समझ पाते थे. एक बार अनुबंध साइन हो जाने के बाद उन्हें सीधे ट्रेनिंग कैंप और फिर यूक्रेन सीमा पर भेज दिया जाता था. कई परिवारों ने बताया कि उनके बेटों को जबरन भर्ती किया गया. कुछ मामलों में ड्रग्स या फर्जी केस का डर दिखाकर ब्लैकमेल भी किया गया. अंग्रेजी अखबार 'द हिंदू' और अन्य समाचार पत्रों ने ऐसी कई कहानियों का खुलासा किया है, जहां युवा निर्माण कार्य या क्लर्क की नौकरी के लिए गए थे, लेकिन जंग के मैदान में भेज दिए गए. 

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किस लालच में युवा जा रहे हैं रूस

पंजाब के जलंधर का एक युवक मंदीप यूरोप जाने की तैयारी कर रहा था, लेकिन एजेंट ने उसे रूस भेज दिया. परिवार को महीनों बाद पता चला कि वह युद्ध में शामिल है. इसी तरह उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ और अन्य जिलों के कई परिवार रो रहे हैं. एक युवक के परिजनों ने मुझे बताया था कि उनका 38 साल का बेटा बढ़ई का काम करता था, उसे मलेशिया में नौकरी दिलाने का झांसा दिया गया, लेकिन उसे रूस भेजकर रूसी सेना में धकेल दिया गया.

रूस में फंसे ज्यादातर युवा मध्य वर्ग या गरीब परिवारों से हैं. विदेश में अच्छी कमाई का सपना उन्हें एजेंटों के जाल में फंसाता है. रूस में ये युवा सबसे आगे की पंक्ति में लड़ने को मजबूर होते हैं, जहां खतरा सबसे ज्यादा होता है. उन्हें 'कैनन फॉडर' की तरह इस्तेमाल किया जाता है. कई ने वीडियो कॉल पर अपने परिवार को बताया है कि उन्हें वापस आने की इजाजत नहीं है. वहीं सरकार का कहना है कि कई युवा स्वेच्छा से गए थे, लेकिन ज्यादातर मामलों में धोखाधड़ी साफ दिखती है.विदेश मंत्रालय ने कई बार चेतावनी जारी की है कि रूसी सेना में भर्ती के ऑफर खतरनाक हैं, लेकिन लालच और बेरोजगारी के आगे ये चेतावनियां कमजोर पड़ जाती हैं.

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विदेश भेजने वाले एजेंटों पर कार्रवाई क्यों नहीं करती है सरकार

इस पूरे मामले में सरकार पर सवाल उठ रहे हैं. संसद में विपक्ष ने पूछा कि एजेंटों पर क्यों कार्रवाई नहीं हो रही है. विदेश मंत्री एस जयशंकर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से इस मुद्दे पर बात की है. कूटनीतिक स्तर पर भारतीय दूतावास लगातार प्रयास कर रहा है. मृतकों के शव वापस लाने और लापता युवाओं की तलाश जारी है. लेकिन समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए और ज्यादा कदम उठाने की जरूरत है. सबसे पहले उन एजेंटों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, जो मानव तस्करी के धंधे में है. विदेश मंत्रालय को ऐसे नेटवर्क की पूरी लिस्ट बनाकर पुलिस को सौंपनी चाहिए.
दूसरा, युवाओं में जागरूकता फैलानी होगी. स्कूल-कॉलेजों और गांवों में कैंप लगाकर बताया जाए कि विदेश जाने से पहले विदेश मंत्रालय की वेबसाइट चेक करें, एंबेसी से संपर्क करें और फर्जी विज्ञापनों से बचें. विदेश मंत्रालय की हेल्पलाइन को और प्रभावी बनाना चाहिए.

तीसरा, देश के अंदर रोजगार के अवसर बढ़ाने होंगे. स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और युवाओं के लिए विशेष योजनाएं पंजाब-यूपी जैसे राज्यों में और तेज की जाएं, ताकि युवा विदेश जाने को मजबूर न हों.चौथा, वीजा प्रक्रिया में सख्ती बरती जाए. रूस या युद्ध प्रभावित क्षेत्रों के लिए छात्र वीजा और पर्यटक वीजा पर विशेष निगरानी हो.मृतकों के परिवारों को तुरंत आर्थिक मदद, नौकरी और मानसिक सहायता दी जाए.

समाज को भी होना होगा जागरूक

भारत-रूस के संबंध लंबे समय से काफी अच्छे हैं. दोनों देशों के बीच रक्षा, ऊर्जा और व्यापार के मजबूत संबंध बने हुए हैं. लेकिन भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को किसी भी कीमत पर सुनिश्चित करना चाहिए. रूस से अपील की जा रही है कि भारतीय युवाओं की भर्ती तुरंत बंद की जाए और फंसे हुए सभी को वापस भेजा जाए.

यह मुद्दा सिर्फ कुछ परिवारों का नहीं है. यह पूरे देश के युवाओं के भविष्य से जुड़ा है. अगर समय रहते एजेंटों पर लगाम न लगाई गई तो और कई परिवार बिखर सकते हैं. मीडिया ने इस समस्या को लगातार उजागर किया है, जिससे जागरूकता बढ़ी है. अब सरकार, समाज और युवाओं को मिलकर काम करना होगा. इसके साथ ही युवाओं को भी विदेश जाने से पहले दो बार सोचें, थोड़ी जांच-पड़ताल करें और सही सलाह लें. परिवारों को भी बच्चों पर निगरानी रखनी चाहिए. सरकार को बेरोजगारी कम करने और धोखाधड़ी रोकने के लिए ठोस नीतियां बनानी होंगी. तभी ऐसे दर्दनाक हादसे रुक सकेंगे.

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(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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