केरल से पंजाब तक कातिल क्यों बन रहीं मम्मियां, बीमारी मानसिक है या सामाजिक?

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श्वेता गुप्ता

केरल में एक मां ने प्रेमी संग मिलकर अपने 18 महीने के मासूम बच्चे की पसलियां तोड़ उसके शरीर पर 91 घाव दिए. गाजियाबाद में एक सौतेली मां ने दूध मांगने पर 3 साल की बेटी को मौत के घाट उतार दिया. आत्मा को झकझोर देने वाली इन घटनाओं के बारे में पढ़-सुनकर दिमाग ये सोचने पर मजबूर हो जाता है कि समाज आखिर किस ओर जा रहा है. 

मां एक ऐसा शब्द है जिसे सदियों से प्रेम, त्याग और समर्पण की मिसाल माना जाता है. ममता की मूरत कहा जाता है. जो अपने बच्चे की खातिर सबकुछ कुर्बान कर देती है. उसके आंचल में सिर्फ प्यार पनपता है. वह हर पल अपने बच्चे की ढाल बनकर खड़ी रहती है. शायद इसीलिए मां को भगवान के बराबर दर्जा दिया जाता है. हिंदी सिनेमा में भी मां की ममता भरी छवि को ही पर्दे पर दिखाया जाता रहा है. चाहे वह 1957 में आई नर्गिस की फिल्म मदर इंडिया हो या 1991 में आई जयाप्रदा और जितेंद्र की फिल्म मां. यां फिर 2017 के बदलते दौर में आई श्रीदेवी की फिल्म मॉम. सिनेमा का दौर बदला लेकिन मां की छवि कभी नहीं बदली.सभी फिल्मों में मां अपने बच्चे के प्यार में पागलपन की हद तक जाती नजर आई. बच्चे की खातिर वह पूरी दुनिया और कानून तक से लड़ गईं. लेकिन असल जिंदगी की कुछ कहानियां इन फिल्मी कहानियों से बिल्कुल अलग हैं.

आजकल सामने आ रही घटनाएं मां का बिल्कुल अलग ही चेहरा दिखा रही हैं. वो चेहरा जो बेरहम है, क्रूर है, हिंसक है और बेइंतिहा स्वार्थी भी है. केरल की अखिला, ओडिशा की रंजीता और पंजाब और आंध्र प्रदेश की भी कुछ महिलाओं या कहिए मम्मियों ने ऐसा ही चेहरा दिखाया है.

मैंने तो बचपन से मां को प्यार लुटाते ही देखा. अगर एक रोटी बची हो तो वह कहती कि भूख नहीं है. अपने हिस्से की वो रोटी भी वह मुझे दे देती. पापा की डांट और मार से बचाने से लेकर मेरी हर छोटी-बड़ी जिद पूरी करने तक, मां ने जो कुछ किया उसे देखकर कभी सवाल नहीं उठा कि उसे भगवान जैसा दर्जा क्यों न दूं. 

लेकिन बात केरल के तिरुवनंतपुरम में अखिला नाम की महिला की करें तो उसने अपने 18 महीने के बच्चे को इतनी बेरहमी से मारा कि सुनने वाले की रूह कांप उठे. बच्चे की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में 91 चोटों का जिक्र है. पुलिस का कहना है कि मां ने ही छाती पर पैर रखकर अपने मासूम बच्चे की पसलियां तोड़ दीं. 

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मैंने अपने पड़ोस की एक आंटी को अपने बच्चे की पढ़ाई की खातिर अपने सोने के गहने गिरवी रखते और अपनी छोटी-चोटी खुशियों को कुर्बान करते देखा. बेटी की शादी के लिए अपने पुराने गहने सुनार को देते देखा. तब कभी ये सोचा ही नहीं कि मां का एक रूप वैसा भी हो सकता है, जो आजकल देखने को मिल रहा है.

कोई प्यार की खातिर तो कोई स्वार्थ की खातिर अपने ही जिगर के टुकड़ों की बलि चढ़ा रहा है. आए दिन ऐसे मामले सुनकर रूह कांप उठती है. दिल और दिमाग बस यही सोचने को मजूर है कि समाज को ये हो क्या गया है. क्या मां ममता शब्द का वाकई कोई मतलब नहीं बचा. फिर अचानक मेरी आंखों के सामने मध्य प्रदेश के बरगी डैम हादसे की वो भावुक तस्वीर घूमने लगी, जहां मरीना मैसी पूरी दुनिया को ममता का पाठ फिर से पढ़ा गईं.

जब उसका अपने 4 साल के बेचे को सीने से चिपकाये शव पानी से मिला. ममता की एक मूरत उत्तराखंड के चमोली की कांता देवी भी थीं, जिनका अपने दो बच्चों को सीने से चिपकाए शव बादल फटने की घटना के बाद मलबे से मिला था. 

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ये हैं अपने ही कातिल बच्चों की माताएं

  • केरल की अखिला ने अपने 18 महीने के बच्चे की छाती पर पैर रखकर पसलियां तोड़ीं
  • बेंगलुरु में एक एआई कंपनी की सीईओ सूचना सेठ अपने 4 साल के बच्चे की हत्या के बाद लाश सूटकेश में लेकर घूमती रही
  • आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में एक मां ने प्रेम संबंधों की वजह से अपने 17 साल के बेटे की हत्या कर दी 
  • तेलंगाना में एक मां ने अपने 2 महीने के बच्चे को मुंह में कपड़ा ठूंसकर और पैर बांधकर सिर्फ इसलिए मार दिया क्यों कि वह बार-बार रो रहा था.
  • त्रिपुरा में एक मां ने अपने प्रेमी के साथ भागने के लिए अपने पांच महीने के बच्चे की हत्या कर दी
  • मध्य प्रदेश में एक मां ने अपने 25 दिन के नवजात की गला दबाकर हत्या कर दी
  • जम्मू-कश्मीर के राजौरी में एक महिला ने अपने पति से बदला लेने के लिए 8 दिन की नवजात बेटी की हत्या कर दी
  • गाजियाबाद में एक सौतेली मां ने दूध मांगने पर 3 साल की बेटी को मौत के घाट उतार दिया
  • राजस्थान के खैरथल तिजारा में मायके जाने की जिद में एक महिला ने 8 महीने की बेटी की जान ले ली.

बच्चों की कातिल मांओं के बारे में सुनते ही दिमाग ये सोचने पर मजबूर हो जाता है कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी रही होगी जो इन महिलाओं को अपनी ममता को मारना पड़ा. क्या ये कई मानसिक बीमारी है या फिर सामाजिक? सवाल बड़ा है लेकिन इसका जवाब तलाशना इस वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है.

(डिस्क्लेमर: श्वेता गुप्ता NDTV में चीफ सब एडिटर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी अनुभव हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना ज़रूरी नहीं है.)